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Share Market Watch: पश्चिम एशिया में तनाव से बाजार में उथल-पुथल, ऐसे मौकों पर इतिहास में क्या हुआ जानिए


ईरान पर अमेरिका-इस्राइल के हमले ने जहां एक और भू-राजनीतिक का तनाव को अपने चरम पर पहुंचा दिया है, वहीं निवेशकों की बैचन किर दिया है। भारत जो कि भौगोलिक रूप से इन देशों से दूर है, लेकिन आर्थिक रूप से भारत की कुछ हद तक निर्भरता पश्चिम एशिया देशों पर है, क्योंकि भारत यहां से अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। सवाल यह उठता है कि निकट भविष्य में यह उतार-चढ़ाव बढ़ेगा या नहीं और क्या ऐसी घटनाएं देश के दीर्घकालिक निवेश के रास्ते में कोई विशेष बदलाव लाएंगी।

एक्सिस एसेट्स मैनेजमेंट की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध और भू-राजनीतिक तनावों ने आम तौर पर छोटी अवधि के लिए बाजार में उतार-चढाव बनाया, लेकिन भारतीय बाजार ने बार-बार लचीलापन दिखाया और बाहरी झटकों को झेलकर थोड़े समय के लिए जोखिम को रीप्राइस करते हुए अच्छा प्रदर्शन किया। विश्व स्तर पर होने वाले युद्धों का असर भारत पर अप्रत्यक्ष रूप से देखा गया है, जो कुछ सेक्टर पर होता है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत को कैसे खतरा?

एक्सिस म्यूचुअल फंड के सीआईओ आशीष गुप्ता बताते हैं कि भारत पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर जल्द दिख सकता है, क्योंकि भारत अपनी जरूरतों का 80 प्रतिशत कच्चा तेल पश्चिम एशिया के देशों से आयात करता है। इसलिए इस तरह की अस्थिरिता कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि ला सकती है और इससे इनपुट कॉस्ट यानी लागत बढ़ती है। साथ ही चालू खाता घाटा और महंगाई बढ़ती है। इक्विटी बाजार पर इसका असर विशेषकर एविएशन सेक्टर, पेंट, सीमेंट और केमिकल जैसे संवेदनशील सेक्टर पर होता है।  

क्यों बढ़ रहे हैं तेल और गैस के दाम?

रिपोर्ट बताती है कि ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते को रोकना या बंद करना कच्चा तेल, रिफाइंड उत्पाद और नेचुरल गैस (एलएनजी) की कीमतों के लिए खतरा है। यह ग्लोबल एनर्जी कारोबार के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है, जो कच्चे तेल के आवक का 20 प्रतिशत और एलएनजी कारोबार का 30 प्रतिशत है। भारत का 50 प्रतिशत या उससे अधिक एनर्जी आयात इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए थोड़ी या कुछ समय की रुकावट भी भारत के एनर्जी सुरक्षा, महंगाई और बाहरी संतुलन पर असर डाल सकती है।

भारतीय बाजार पर क्या असर पड़ सकता है?

रिपोर्ट के अनुसार साल 2022 में रूस-यूक्रन युद्ध के दौरान कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चले गए थे , बावजूद इसके शुरुआती बिकवाली के बाद भी निफ्टी-50 ने साल के अंत में सकारात्मक जोन में रहा। इसका मतलब यह है कि कच्चे तेल के दामों की वजह से भारतीय इक्विटी बाजार पटरी से नहीं उतरा, जब तक कि ग्रोथ और मॉनेटरी स्थिरता को नुकसान पहुंचाने के लिए काफी लंबे समय तक न रहे।  






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