बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों को मनोबल लगातार गिरा है। इससे भारतीय शेयर बाजारों में लगातार बिकवाली का दबाव बना रहा। इस सप्ताह बाजार में भारी उतरा-चढ़ाव और गिरावट देखने को मिला।
निफ्टी-50 सप्ताहवार में 5.3% की गिरावट के साथ 23,151 पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स सप्ताहवार 5.5 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,564 पर स्थिर रहा। आगामी सप्ताह में बाजार की दिशा में भारी उतार-चढ़ाव रहने की संभावना है। इसकी मुख्य वजह पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से जुड़े घटनाक्रम होंगे। कच्चे तेल की कीमतों के रुझान, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और मुद्रा बाजार की अस्थिरता को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
बाजार में गिरावट कोई आश्चर्य की बात नहीं
इनक्रेड वेल्थ के सीईओ नितिन राव ने बताया कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से जुड़े भू-राजनीतिक कारकों ने बाजारों को प्रभावित किया है। यह एक अप्रत्याशित घटना थी और उम्मीदों के विपरीत, यह एक लंबा संघर्ष बन गया है,जिसके समाप्त होने के कोई आसार नहीं हैं। इस घटना ने पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है और अब ऊर्जा अवसंरचना भी इससे प्रभावित हो रही है। भारत पहले से ही अपनी आर्थिक विकास दर में मंदी और भारतीय आईटी पर एआई के प्रभाव से जूझ रहा था, और इस संघर्ष ने एक प्रमुख आर्थिक कारक तेल पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। इसलिए बाजार में गिरावट कोई आश्चर्य की बात नहीं है और संघर्ष के परिणाम के आधार पर और गिरावट की संभावना है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में आई बाधा से जोखिम बढ़ा
एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर कहते है, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के कारण सप्ताह के दौरान शेयरों में भारी गिरावट देखी गई। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा, जिस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, उसमें गंभीर व्यवधान उत्पन्न होने से चिंताएं और भी बढ़ गईं हैं। सुरक्षा जोखिमों में वृद्धि और युद्ध के जोखिमों से बीमा प्रीमियम में उछाल के कारण कई शिपिंग ऑपरेटरों ने इस रास्ते से आवाजाही बंद कर दी है। इससे टैंकरों का आनाजाना प्रभावी रूप से बाधित हो रहा है और आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान की आशंका बढ़ गई। इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न अनिश्चितता ने कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया और वैश्विक बाजारों में एक नया भू-राजनीतिक जोखिम पैदा कर दिया है।
मैक्रोइकॉनॉमिक पर दबाव
वे कहते हैं कि पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए बढ़ते संघर्ष ने आपूर्ति में निरंतर व्यवधान, मुद्रास्फीति के दबाव और व्यापक मैक्रोइकॉनॉमिक अस्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक भारत के लिए, ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों ने तत्काल मैक्रोइकॉनॉमिक दबाव बढ़ा दिया है। इससे रिफाइनर, तेल विपणन कंपनियों, परिवहन, बिजली, सीमेंट और अन्य ऊर्जा-संवेदनशील उद्योगों के लिए इनपुट लागत बढ़ गई है।



