Uttar Pradesh
oi-Pallavi Kumari
Gopal krishna Agarwal News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर बड़े चेहरों और रैलियों की चर्चा होती है, लेकिन सत्ता की असली चाभी उस ‘साइलेंट काम’ में छिपी होती है जो जमीन पर लोगों की जिंदगी बदल दे। इन दिनों दिल्ली से सटे नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) की गलियों में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद सिपहसालार और बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने एक ऐसा ‘मिशन-मोर्चा’ संभाल रखा है, जो न केवल जनता के बीच सरकार की पैठ बढ़ा रहा है, बल्कि 2027 के रण के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राह भी बेहद आसान कर रहा है।

ड्राइंग रूम की राजनीति छोड़, पसीने की सियासत
आमतौर पर गोपाल कृष्ण अग्रवाल को हम नेशनल टीवी चैनलों पर जटिल आर्थिक आंकड़े पेश करते या चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर अपनी बुद्धि का लोहा मनवाते देखते हैं। लेकिन नोएडा के सेक्टर 44 और आसपास के इलाकों में उनकी पहचान अब ‘मोदी के योद्धा’ के रूप में हो रही है। ‘गोपाल नमो सेवा केंद्र’ के जरिए उन्होंने राजनीति को ड्राइंग रूम से निकालकर उस रेहड़ी-पटरी वाले और दिहाड़ी मजदूर तक पहुंचा दिया है, जिसके लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर काटना किसी सजा से कम नहीं होता।
हाल ही में उनके द्वारा आयोजित 28वें शिविर में जिस तरह की भीड़ उमड़ी, उसने साफ कर दिया कि जनता को भाषणों से ज्यादा अपने अधिकारों की चिंता है। यहां महज कागजी खानापूर्ति नहीं हो रही, बल्कि ई-श्रम और आयुष्मान कार्ड जैसे ‘सुरक्षा कवच’ हाथों-हाथ बांटे जा रहे हैं।
ई-श्रम और आयुष्मान: योगी की जीत का ‘साइलेंट’ फॉर्मूला
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यूपी में योगी आदित्यनाथ की मजबूत पकड़ के पीछे एक बड़ा कारण ‘लाभार्थी वर्ग’ है। गोपाल कृष्ण अग्रवाल इसी वर्ग को और मजबूत कर रहे हैं। शिविर के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि ई-श्रम कार्ड केवल एक आईडी नहीं है, बल्कि यह 18 अलग-अलग श्रेणियों के छोटे कारीगरों के लिए सरकारी खजाने का द्वार है। इसमें ₹10,000 का प्रशिक्षण भत्ता, ₹15,000 की टूलकिट सब्सिडी और ₹1 लाख तक का सस्ता कर्ज शामिल है। अब तक 27 कैंपों में लगभग 8,261 लोगों का पंजीकरण किया जा चुका है
जब एक 70 साल की बुजुर्ग महिला, जिसकी आंखों में मोतियाबिंद की धुंध और भविष्य की चिंता हो, उसे आयुष्मान कार्ड के रूप में ₹5 लाख का मुफ्त इलाज मिलता है, तो वह केवल एक कार्ड नहीं लेती, बल्कि वह सत्ताधारी दल के लिए एक अटूट ‘वोट बैंक’ में बदल जाती है। यही वह एंगल है जो विपक्ष के लिए उत्तर प्रदेश में बड़ी चुनौती पैदा कर रहा है।
गौ सेवा से लेकर जल संरक्षण तक: एक बहुआयामी योद्धा
गोपाल कृष्ण अग्रवाल का यह मॉडल सिर्फ कार्ड बांटने तक सीमित नहीं है। उनकी प्रोफाइल एक ऐसे नेता की उभरती है जो ‘सस्टेनेबल पॉलिटिक्स’ (सतत राजनीति) में विश्वास रखता है। आधिकारिक आंकड़ों और उनके कार्यों पर नजर डालें तो वे 1990 से नोएडा में सक्रिय हैं। वे यहाँ एक विशाल गौशाला का संचालन कर रहे हैं जिसमें 1700 से अधिक लावारिस गौवंश की सेवा की जाती है।
इतना ही नहीं, ‘जलाधिकार फाउंडेशन’ के जरिए वे हरियाणा, दिल्ली और यूपी में तालाबों के पुनरुद्धार का काम कर रहे हैं। अनुभवी पत्रकार के नजरिए से देखें तो यह ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और ‘विकास’ का एक ऐसा कॉकटेल है, जो बीजेपी के कोर एजेंडे को सीधे जमीन पर उतारता है। जब वे 140 महिलाओं को सिलाई की ट्रेनिंग देते हैं या कंप्यूटर सेंटर चलाते हैं, तो वे समाज के उस हिस्से को आत्मनिर्भर बना रहे होते हैं जो अक्सर चुनावी वादों में पीछे छूट जाता है।
क्यों अहम है यह ‘नोएडा मॉडल’?
गोपाल कृष्ण अग्रवाल खुद कहते हैं, “मोदी जी का आह्वान है कि हर कार्यकर्ता लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़े।” यह रणनीति बेहद गहरी है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में प्रशासन हर दरवाजे तक नहीं पहुंच सकता। ऐसे में जब गोपाल कृष्ण अग्रवाल जैसे अनुभवी नेता, जो खुद एक सीए हैं, मजदूरों के कागजात खुद चेक करते हैं और ओटीपी की समस्याओं को सुलझाते हैं, तो जनता का सिस्टम पर भरोसा लौटता है।
यह ‘जनसेवा का मॉडल’ नोएडा से निकलकर पूरे यूपी में एक मिसाल बन सकता है। राजनीति में कहा जाता है कि जो जनता के सुख-दुख का साथी बनता है, जीत उसी की पक्की होती है। अगर इसी तरह के प्रयास हर जिले में होने लगें, तो सीएम योगी के लिए अगली चुनावी वैतरणी पार करना और भी आसान हो जाएगा।
गोपाल कृष्ण अग्रवाल की यह सक्रियता यह संदेश देती है कि राजनीति अब केवल चुनाव लड़ने का माध्यम नहीं रही। यह 24/7 जनसेवा की जिम्मेदारी है। नोएडा में जो ‘बीज’ वे बो रहे हैं, उसकी फसल लखनऊ के विधानसभा चुनावों में दिखेगी। मोदी के इस योद्धा ने यह साबित कर दिया है कि अगर योजनाएं सही हाथों से जनता तक पहुंचें, तो जीत केवल एक औपचारिकता रह जाती है।
विपक्ष के लिए अब चुनौती यह नहीं है कि वे क्या वादा करते हैं, बल्कि चुनौती यह है कि वे जमीन पर मौजूद इस ‘योद्धा’ के सेवा भाव का मुकाबला कैसे करेंगे?
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