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oi-Siddharth Purohit
US Iran War: अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग को 25 दिन हो गए हैं, लेकिन इसमें ट्विस्ट 24वें दिन आया जब ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका की ईरान से 2 दिनों से प्रोडक्टिव बातचीत हो रही है, जिसके बद 5 दिनों तक ईरान की एनर्जी फेसिलिटी पर हमले नहीं होंगे। लेकिन ईरान ने अमेरिका की इस बात को सिरे से नाकारते हुए कहा कि ऐसी कोई बात हमारी अमेरिका से नहीं हुई है। वहीं, इन सब के बीच पाकिस्तान की तरफ से खबर आई कि उनसे अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता को लेकर बात कराई है। जिसको लेकर कुछ लोग पाकिस्तान का मजाक बना रहे हैं तो कुछ उसे तरजीह भी दे रहे हैं। ऐसे में ये समझना जरूरी हो जाता है कि ईरान-अमेरिका के बीच मध्यस्थता के इस खेल कौन-सा देश कितना बड़ा किरदार निभा रहा है।
समझौता नहीं सहयोगियों के दबाव में बदला रुख
एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने अपना रुख इसलिए बदला क्योंकि अमेरिका के सहयोगी देशों और खाड़ी देशों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि अगर ईरानी इंफ्रास्ट्रक्चर को ज्यादा नुकसान पहुंचा, तो भविष्य में यह क्षेत्र पूरी तरह अस्थिर हो सकता है। इससे युद्ध के बाद भी हालात संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसके बाद ही ट्रंप ने समझौते जैसी बात करना शुरू किया था।

मध्यस्थता मे पाकिस्तान समेत कितने देश?
मीडियो रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और ओमान जैसे देश अमेरिका और ईरान के बीच शांति स्थापित कराने की कोशिश कर रहे हैं। इन देशों का मकसद है कि दोनों देशों के बीच युद्धविराम हो और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही फिर शुरू हो सके।
तुर्की ने जताई मध्यस्थता की इच्छा
तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने कई बार कहा है कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी चिंता जताई कि इस जंग में शामिल इजरायल इसे लंबा खींचना चाहता है।
कूटनीतिक बातचीत तेज
तुर्की के Hakan Fidan ने सोमवार को नॉर्वे के Espen Barth Eide और मिस्र के Badr Abdelatty से फोन पर बात की। इन बातचीतों में युद्ध को रोकने की कोशिशों पर चर्चा हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्की और ओमान के बीच ईरान को लेकर कई संदेशों का आदान-प्रदान हुआ, जबकि सऊदी अरब और भारत के जरिए भी बातचीत के संकेत भेजे गए।
व्हाइट हाउस और ईरान के बीच इन डायरेक्ट डायलोग्स
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने व्हाइट हाउस के दूत Steve Witkoff और ईरानी विदेश मंत्री Abbas Araghchi के साथ अलग-अलग बातचीत की। इसका मकसद दोनों देशों के बीच किसी तरह का समझौता कराना
क्रेडिट बटोरने की फिराक में शहबाज-मुनीर
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पूरे मामले में पाकिस्तान अहम भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख Asim Munir ने रविवार को ट्रंप से फोन पर बात की, जबकि प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने सोमवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से बातचीत की। लेकिन, एक्सपर्ट्स पाक की कोशिशों को कोशिश कम और क्रेडिट लेने की होड़ ज्यादा बता रही है।
कूटनीति के बीच समय का खास महत्व
इन सभी बातचीतों का समय बेहद अहम है, क्योंकि ये ठीक उसी समय हुईं जब ट्रंप ने अपनी धमकी को वापस लेते हुए हमलों को रोकने का ऐलान किया। इससे यह संकेत मिलता है कि कूटनीतिक दबाव ने बड़ा रोल निभाया।
पाकिस्तान की और कोशिशें जारी
पाकिस्तान के विदेश मंत्री Ishaq Dar ने भी ईरान के Abbas Araghchi से बात की और शांति व स्थिरता के लिए बातचीत पर जोर दिया। पाकिस्तान ने यह भी संकेत दिया है कि वह अमेरिका-ईरान बातचीत की इच्छा जताई है। हालांकि, अमेरिका ने मुनीर की इस इच्छा पर पानी फेरते हुए साफ इनकार दिया।
पाकिस्तान का बयान: “हम तैयार हैं”
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Tahir Andrabi ने कहा कि अगर दोनों देश चाहें, तो इस्लामाबाद बातचीत की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान हमेशा शांति और कूटनीति का समर्थन करता है। वो बात अलग है कि पाकिस्तान का अपना इतिहास आतंकवादियों को पालने और विश्व शांति भंग करने का रहा है।
व्हाइट हाउस का सावधान जवाब
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने कहा कि यह स्थिति लगातार बदल रही है और जब तक आधिकारिक घोषणा न हो, तब तक किसी भी बातचीत को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए।
पाकिस्तान क्यों घुसना चाहता?
विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तान इस मामले में इसलिए अहम है क्योंकि ईरान के बाद यहां शिया मुस्लिमों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। साथ ही, इसके खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्ते हैं, जिसमें सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता भी शामिल है।
ट्रंप और मुनीर के संबंध
पाकिस्तान के सेना प्रमुख Asim Munir और Donald Trump के बीच हाल की दिनों में संबंध बेहतर हुए हैं। ट्रंप ने पहले मुनीर को “मेरे पसंदीदा फील्ड मार्शल” और “एक असाधारण इंसान” तक कहा है। जिसके बाद मुनीर इस तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। लेकिन मुनीर का जंग रुकवाने के पीछे का मकसद पाकिस्तान के बदतर होते हाल को सुधारना पहले है। क्योंकि अगर ये जंग जारी रही तो पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम बेकाबू हो सकते हैं जो पाकिस्तानी रुपए के टूटने का बड़ा कारण बनेगा।
भारत क्या कर रहा?
भारत ने पाकिस्तान से एक कदम आगे जाकर अमेरिका वो सहयोगी जो इस युद्ध में हमले झेल रहे हैं (सऊदी अरब, बहरीन, यूएई, कतर, ओमान, कुवैत, जोर्डर) से बात की। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के यूरोपीय सहयोगी जैसे फ्रांस आदि को भी भरोसे में लेकर ट्रंप से युद्ध रोकने के लिए जोर डालते हुए बात की। इसका अलावा जहां पाकिस्तान नहीं पहुंच सका, यानी कि इजरायल, वहां भी भारत ने सीधी बात कर जंग रोकने पर लंबी बात कर माहौल को हल्का किया।
इसके अलावा भारत ने सीधी ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकिया और विदेश मंत्री अब्बास अराघची से भी बात कर खाड़ी देशों के एनर्जी फेसिलिटी को निशाना न बनाने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने पर चर्चा की। जबकि पाकिस्तान की बातचीत सिर्फ खाड़ी देशों और अमेरिका तक सीमित थीं। न इसमें ईरान था, न यूरोपीय देश और न इजरायल जो इस युद्ध में एक अहम किरदार है। अब देखना होगा जंग रुकने का तमगा किसे मिलता है।
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