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oi-Siddharth Purohit
US Stuck In War: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के बार-बार बदलते बयान से अब अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ऊब गई है। उनके बयानों से ऐसा लग रहा है कि इस जंग की शुरुआत कर के बुरे फंस गए और अब बस निकलना चाहते हैं। अपने बयानों में कभी वह कहते हैं कि अमेरिका जंग जीत चुका है, तो कभी कहते हैं कि अभी ऑपरेशन खत्म नहीं हुआ है।
इसके पीछे व्हाइट हाउस के अंदर चल रही एक राजनीतिक खींचतान बताई जा रही है। जिसके चक्कर में ट्रंप का ही खेमा दो धड़ों में बंटा दिख रहा है। असल में ट्रंप के कई सलाहकार और राजनीतिक सहयोगी इस बात पर अलग-अलग राय दे रहे हैं कि जंग में जीत का शंखनाद कब और कैसे बजाया जाए। वहीं दूसरी तरफ यह जंग का ये रायता सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहा और इसने पूरे मिडिल ईस्ट को लपेटे में ले लिया है।

ट्रंप के सलाहकारों में भयंकर मतभेद
ट्रंप के एक सलाहकार और इस मामले से जुड़े अन्य लोगों के मुताबिक व्हाइट हाउस के अंदर इस युद्ध को लेकर काफी मतभेद हैं। कुछ अधिकारी राष्ट्रपति को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों की वजह से गैसोलीन की कीमतें बढ़ जाती हैं, तो इसका घरेलू राजनीति पर बड़ा निगेटिव असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ कुछ कट्टरपंथी नेता चाहते हैं कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और ज्यादा तेज की जाए ताकि उसे पूरी तरह कमजोर किया जा सके।
व्हाइट हाउस से बाहर आने लगी बातें
समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप प्रशासन के अंदर हो रही इन चर्चाओं की पहले कभी इतनी खुलकर रिपोर्टिंग नहीं हुई थी। यह स्थिति खास इसलिए भी है क्योंकि यह अभियान 2003 के Iraq War के बाद अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अभियान माना जा रहा है। यानी अमेरिका के भीतर ही इस युद्ध को लेकर स्पष्ट रणनीति पर पूरी तरह सहमति नहीं बन पाई है।
ट्रंप के लिए राजनीतिक दांव बहुत बड़ा
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि इस युद्ध में ट्रंप के लिए राजनीतिक दांव बहुत ऊंचे हैं। उन्होंने पिछले साल चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि अमेरिका को मूर्खतापूर्ण मिलिट्री दखलों से दूर रखा जाएगा। यहां ट्रंप बाइडेन के कार्यकाल में छिड़े रूस-यूक्रेन और इजरायल-हमास युद्ध की ओर इशारा कर रहे थे। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा, सत्ता संभालने के लगभग दो हफ्ते बाद ही अमेरिका एक ऐसे युद्ध में शामिल हो गया जिसने वैश्विक वित्तीय बाजारों को हिला दिया और अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार को भी प्रभावित कर दिया।
युद्ध के नए नाम खोजने की कोशिशें
जब 28 फरवरी को युद्ध शुरू हुआ था, तब इसके लक्ष्य काफी बड़े बताए गए थे। लेकिन हाल के दिनों में ट्रंप इस संघर्ष को एक “सीमित सैन्य अभियान” यानी लिमिटेड मिलिट्री ऑपरेशन्स के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस ऑपरेशन के अधिकांश लक्ष्य पहले ही पूरे हो चुके हैं। इस बदलाव से साफ दिखता है कि व्हाइट हाउस के अंदर रणनीति को लेकर लगातार मंथन चल रहा है।
तेल-गैस के बाजारों में भी दिख रहा असर
ट्रंप के बदलते बयानों का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। तेल और गैस के बाजार भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। तेल और गैस की कीमतें उनके बयानों के बाद कभी तेजी से ऊपर जाती हैं तो कभी नीचे गिर जाती हैं। यानी निवेशकों और बाजार को भी साफ संकेत नहीं मिल पा रहा कि युद्ध कितने समय तक चलेगा।
कभी हां- कभी ना
हाल ही में केंटकी में एक चुनावी रैली के दौरान ट्रंप ने पहले कहा कि “हमने युद्ध जीत लिया है। लेकिन कुछ ही देर बाद उन्होंने अपना बयान बदलते हुए कहा कि “हम जल्दी बाहर नहीं निकलना चाहते। हमें काम पूरा करना होगा।” इस तरह के बयान यह दिखाते हैं कि ट्रंप अभी तक स्पष्ट रूप से यह तय नहीं कर पाए हैं कि इस युद्ध को अपनी जनता के सामने कैसे परोसें, फिर दुनिया का तो भूल ही जाइए।
सलाहकार दे रहे ट्रंप को चेतावनी
अमेरिका के आर्थिक सलाहकारों और अधिकारियों- जिनमें ट्रेजरी डिपार्टमेंट और नेशनल इकॉनोमिक काउंसिलर के सदस्य शामिल हैं, इन सब लोगों ने ट्रंप को चेतावनी दी है। उनका कहना है कि अगर तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं और गैसोलीन महंगा होता है, तो जनता का युद्ध के प्रति समर्थन तेजी से कम हो सकता है। इन चर्चाओं की जानकारी नाम न छापने की शर्त पर एक सलाहकार और दो अन्य सूत्रों ने दी।
राजनीतिक टीम की चिंता
ट्रंप की राजनीतिक टीम भी इसी तरह की चिंता जता रही है। इनमें चीफ ऑफ स्टाफ Susie Wiles और डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ James Blair शामिल हैं। इन नेताओं का मानना है कि ट्रंप को जीत की परिभाषा सीमित रखनी चाहिए। जैसे कि यह कहना कि सेना के ईरान में चल रहे ऑपरेशन लगभग खत्म होने वाला है। न कि जीत का दावा करना चाहिए।
कट्टरपंथी नेताओं का दबाव
लेकिन दूसरी तरफ कुछ रिपब्लिकन नेता चाहते हैं कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव जारी रखा जाए। इस समूह में अमेरिकी सीनेटर Lindsey Graham और Tom Cotton शामिल हैं। इसके अलावा मीडिया कमेंटेटर भी इसी तरह की राय रखते हैं। उन नेताओं का तर्क भी जान लेते हैं। इन नेताओं का कहना है कि अमेरिका को ईरान को न्यूक्लियर हथियार हासिल करने से रोकना चाहिए। साथ ही ये भी कि अमेरिकी सैनिकों और शिपिंग पर हुए हमलों का मजबूत और सख्त जवाब देना जरूरी है।
ट्रंप के समर्थकों का भी दबाव
एक तीसरा गुट भी है, ट्रंप का कट्टर समर्थकों का गुट। इनें आप ट्रंप के अंधभक्त भी कह सकते हैं। इसमें रणनीतिकार Steve Bannon और टीवी होस्ट Tucker Carlson जैसे लोग शामिल हैं। ये लोग ट्रंप से कह रहे हैं कि अमेरिका को मिडिल ईस्ट के एक और लंबे युद्ध में नहीं फंसना चाहिए। ये इशारा कुछ हद तक 1955 से लेकर 1975 तक चले अमेरिका-वियतनाम युद्ध की तरफ है, जहां अमेरिका ने 20 सालों तक जंग लड़ी लेकिन अंत में सिर्फ ठेंगा हाथ लगा।
तीन अलग-अलग संदेश देने की रणनीति
ट्रंप के एक सलाहकार के मुताबिक राष्ट्रपति एक तरह से तीन अलग-अलग संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। कट्टरपंथी नेताओं को लगता है कि सैन्य अभियान जारी रहेगा। बाजार को यह संकेत दिया जा रहा है कि युद्ध जल्दी खत्म हो सकता है। और उनके समर्थकों को बताया जा रहा है कि संघर्ष ज्यादा नहीं फैलेगा। और यही ट्रंप की सबसे बड़ी गलती है कि ट्रंप तीनों पक्षों को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं।
व्हाइट हाउस अलग रास्ते पर
जब इस रिपोर्ट पर टिप्पणी मांगी गई तो व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने इसे गुमनाम सोर्सेस की अटकलें बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति कई लोगों की राय सुनते हैं लेकिन अंतिम फैसला वही लेते हैं। मतलब जवाब वो भी नहीं दे पाईं।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी बना एपिक सिरदर्द
लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति की पूरी टीम का ध्यान “Operation Epic Fury” के मकसद को पूरा करने पर है। यानी प्रशासन का आधिकारिक संदेश यही है कि अभियान अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ठीक से देखें तो लेविट एक चौथी बात कह कर चली गईं।
भाईजान भूल गए ‘मकसद’
जब अमेरिका ने यह युद्ध शुरू किया था तब उसके मकसद पूरी तरह साफ नहीं थे। कभी कहा गया कि यह ईरान के संभावित हमले को रोकने के लिए है, कभी कहा गया कि उसका न्यूक्लियर कार्यक्रम खत्म करना है, और कभी यह भी कहा गया कि ईरान की रिजीम चेंज करना है।
बाजारों को संभाल रहे ट्रंप
अब जब युद्ध लंबा खिंचता दिख रहा है, ट्रंप के आर्थिक सलाहकार बाजारों को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं। वे यह संदेश दे रहे हैं कि युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलेगा और तेल-गैस की कीमतों में बढ़ोतरी अस्थायी है।
हार को जीत बताने की जिम्मेदारी
सूत्रों के मुताबिक कुछ सहयोगियों ने ट्रंप को सलाह दी है कि युद्ध को ऐसी स्थिति में खत्म किया जाए जिसे सैन्य जीत कहा जा सके। फिर चाहे, ईरान की लीडरशिप पूरी तरह खत्म न हो और उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम भी पूरी तरह से बर्बाद न हुआ हो। याद रहे, ऐसी ही जीत का दावा अमेरिका पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने वियतनाम में पीठ दिखाकर लौटते वक्त किया था। फिलहाल अमेरिका के इस युद्ध में 7 सैनिक मारे जा चुके हैं और 4 और सैनिक हाल ही में हुई KC-135 एयरक्राफ्ट की घटना में हताहत होने की खबर आ गई है।
अमेरिकी राजनीति में ट्रंप की फजीहत
अगर इस वजह से अमेरिका में गैस की कीमतें बढ़ती हैं तो नवंबर के मिड टर्म इलेक्शन में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। इसी से ट्रंप की फजीहत भी हो सकती है। ट्रंप के कुछ करीबियों ने उन्हें वेनेजुएला की तर्ज पर जीत का भरोसा दिलाया था पर ऐसा दूर-दूर तक नहीं हो रहा है।
लंबा चला युद्ध तो अमेरिका का नुकसान
वहीं एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर युद्ध लंबा चला, अमेरिकी सैनिकों की मौत बढ़ी और आर्थिक लागत ज्यादा हुई, तो ट्रंप के समर्थकों का समर्थन भी धीरे-धीरे कम हो सकता है। जो इतिहास में ट्रंप को आबाद के नाम पर बर्बाद करने वाले राष्ट्रपति के तौर पर याद रखवा सकता है।
इस एनालिसिस पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।
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