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West Asia Crisis: क्या भारत में महंगे हो जाएंगे कंडोम? 7000 करोड़ रुपये के कारोबार पर संकट क्यों, जानिए सबकुछ


अमेरिका-इस्राइल-ईरान के बीच जारी संकट पहले एलपीजी के रूप में रसोई पर भारी पड़ा, अब इसके दूसरे असर भी सामने आने लगे हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब सिर्फ पारंपरिक तेल और ऊर्जा क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बेडरूम तक पहुंच गया है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के चलते भारत के कंडोम उद्योग को कच्चे माल की भारी कमी और सप्लाई चेन की बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। आइए पांच सवालों के जरिए समझते हैं कि यह पूरा संकट क्या है और इसका आपकी जेब व समाज पर क्या असर पड़ेगा।

भारत में कंडोम का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और 2023 में इसका कुल कारोबार लगभग 861.3 मिलियन डॉलर यानी करीब 7,000 करोड़ रुपये से अधिक था। यह बाजार 2030 तक 11% की दर से बढ़कर लगभग 1.8 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

कंडोम उद्योग पर अचानक यह संकट क्यों मंडरा रहा है?

पश्चिम एशिया में तनाव के कारण पूरी दुनिया की आपूर्ति शृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। लॉजिस्टिक्स के मार्चे पर आई रुकावटों और प्रमुख उत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने उत्पादन को मुश्किल बना दिया है। इसके अलावा, सरकार अहम क्षेत्रों के लिए पेट्रोकेमिकल संसाधनों को प्राथमिकता दे रही है, जिससे कंडोम जैसे उद्योगों के लिए पेट्रोकेमिकल आवंटन में 35 फीसदी तक की कटौती हो सकती है और सप्लाई आगे और सिकुड़ सकती है।

आखिर किन चीजों की कमी हुई है जो कंडोम बनाने के लिए जरूरी हैं?

कंडोम बनाने के लिए मुख्य रूप से दो चीजें बहुत जरूरी हैं- सिलिकॉन तेल (जिसका इस्तेमाल लुब्रिकेंट के लिए होता है) और अमोनिया (जो लेटेक्स को स्थिर करने के लिए अहम है)। वर्तमान में कंपनियों को सिलिकॉन तेल की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, अमोनिया की कीमतों में 40 से 50 प्रतिशत तक का भारी उछाल आने की उम्मीद है। इसके साथ ही पीवीसी और एल्युमीनियम फॉयल जैसी पैकेजिंग सामग्री भी महंगी हो गई है, जिससे कंपनियों पर लागत का भारी दबाव आ गया है।

संकट से भारत की कौन सी बड़ी कंपनियां जूझ रही हैं?

इस सप्लाई चेन के झटके का असर भारत की प्रमुख कंडोम निर्माता कंपनियों पर सीधा पड़ रहा है। इनमें सरकारी कंपनी एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड शामिल है, जो हर साल लगभग 221 करोड़ कंडोम बनाती है। इसके अलावा, मैनकाइंड फार्मा लिमिटेड और क्यूपिड लिमिटेड जैसी बड़ी कंपनियां भी इस संकट से प्रभावित हैं। कर्नाटक ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के जतिश एन. शेठ ने कहा है, “हर पेट्रोकेमिकल्स वाला उत्पाद वर्तमान में प्रभावित है। असर तो है, लेकिन अभी असर की गहराई का आकलन किया जा रहा है।”

क्या बाजार में कंडोम के दाम बढ़ने वाले हैं?

इसकी पूरी आशंका बनी हुई है। भारत का कंडोम बाजार ‘कम लागत और अधिक बिक्री’ के मॉडल पर चलता है ताकि यह आम लोगों की पहुंच में रहे। लेकिन उत्पादन लागत में भारी बढ़ोतरी से कंपनियों के मुनाफे (बॉटम लाइन) पर सीधा दबाव पड़ रहा है। उद्योग के जानकारों का मानना है कि मजबूरन कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जिससे राजस्व तो बढ़ सकता है लेकिन बिक्री के आंकड़ों में गिरावट आने की संभावना है।

इसका आम लोगों और समाज पर क्या असर पड़ेगा?

उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि यह केवल एक कारोबारी संकट नहीं, बल्कि एक संभावित सामाजिक जोखिम भी है। कंडोम परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण का एक अहम हिस्सा है। अगर कीमतें बढ़ती हैं और इसके इस्तेमाल में थोड़ी सी भी कमी आती है, तो इसके दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं। भारत के कंडोम उद्योग पर पड़ा यह दबाव बताता है कि कैसे दुनिया के किसी कोने में हो रहे वैश्विक संघर्ष रोजमर्रा के लिए जरूरी उत्पादों और उनकी आपूर्ति शृंखला को प्रभावित कर रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि आने वाले समय में कंपनियां इस लागत वृद्धि को कैसे संभालती हैं।





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