भारत पर अमेरिकी टैरिफ का नया दबाव सिर्फ एक व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि देश की निर्यात रणनीति की बड़ी परीक्षा बन सकता है। अमेरिका भारतीय वस्तुओं का सबसे बड़ा खरीदार है। इंजीनियरिंग सामान, दवा, रत्न-आभूषण, टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स तक उद्योगों की कमाई का बड़ा हिस्सा यहीं से आता है। सबसे बड़ा खतरा केवल अतिरिक्त टैरिफ नहीं, बल्कि अनिश्चितता है। उद्योग संगठनों व निर्यातकों की नजर अब सरकारी रणनीति पर टिकी है।
टैरिफ से निपटने के 5 बड़े हथियार
- नए एफटीए और बाजार विविधीकरण
- अमेरिका के साथ लगातार व्यापारिक वार्ता
- लॉजिस्टिक्स और बंदरगाह लागत में कमी
- इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और इंजीनियरिंग में मजबूत बढ़त
- चीन प्लस वन रणनीति से निवेश आकर्षित करना
क्या एफटीए बनेंगे सुरक्षा कवच?
यही वह सवाल है जिस पर उद्योग जगत सबसे ज्यादा भरोसा जता रहा है। हाल में भारत ने यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ व्यापार समझौतों का दायरा बढ़ाया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च के अजय श्रीवास्तव ने कहा, दुनिया की सबसे बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का विकल्प तुरंत खोजना मुमिकन नहीं, लेकिन जोखिम बांटना संभव है। हालांकि ट्रंप आसानी से ऐसा कोई रास्ता नहीं छोड़ेेगे, जिसके जरिये दूसरे देशों से रियायतें हासिल की जा सकें।
किन क्षेत्रों में दिखेगा सबसे ज्यादा असर?
सबसे अधिक चिंता इंजीनियरिंग और ऑटो कल-पुर्जों को लेकर है। अमेरिका भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात का सबसे बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञ नीलकांत मिश्र ने कहा, यदि भारत पर शुल्क बढ़ता है तो खरीदार वियतनाम, मेक्सिको जैसे देशों का रुख कर सकते हैं। टेक्सटाइल और गारमेंट उद्योग भी संवेदनशील स्थिति में है। यह क्षेत्र पहले से ही बांग्लादेश, वियतनाम और अन्य एशियाई देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है।
रत्न एवं आभूषण उद्योग भी अहम है। इस क्षेत्र में मांग में मामूली कमी भी निर्यात और रोजगार पर असर डाल सकती है। फार्मा क्षेत्र की हालत बेहतर है। भारतीय जेनेरिक दवाओं की वहां मजबूत पकड़ है। फिर भी कीमतों को लेकर दबाव बढ़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स की स्थिति दिलचस्प है। यदि भारत प्रतिस्पर्धी लागत बनाए रखता है तो चुनौती अवसर में बदल सकती है।
भारत को अब क्या करना होगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, देश को अब उत्पादन लागत घटाने, लॉजिस्टिक्स सुधारने और निर्यात प्रक्रियाओं को आसान बनाने की दिशा में भी तेजी से काम करना होगा। ऊर्जा लागत, बंदरगाहों की दक्षता, कंटेनर उपलब्धता जैसे मुद्दे भारतीय कंपनियों की स्थिति तय करेंगे। यदि इन मोर्चों पर सुधार हुआ तो टैरिफ का असर काफी हद तक कम किया जा सकता है।
चीन प्लस वन रणनीति क्या है?
वैश्विक कंपनियों की चीन प्लस वन रणनीति भी भारत के लिए बड़ा अवसर है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां सप्लाई चेन को चीन से बाहर ले जाना चाहती हैं। अगर भारत नीति स्थिरता और बेहतर बुनियादी ढांचा उपलब्ध करा पाता है तो वह इन निवेशों का बड़ा हिस्सा आकर्षित कर सकता है। नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने के लिए आक्रामक रणनीति अपनानी होगी।



