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अहसान और एहसास – एक बच्ची की मां के हौसले और संघर्ष की कहानी


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oi-Oneindia Staff

साबुन। पानी। और फिर वही कहानी।

वो चाय का कप गंदा नहीं था। बस उस छोटी, घुटन भरी रसोई में वही एक चीज़ थी जिसके सहारे वह खुद को किसी न किसी काम में उलझाए रख सकती थी। टूटे हुए एग्जॉस्ट फैन की आवाज़ में एक अजीब सी टेढी थी… एक थकी हुई, बेसुरी भनभनाहट जो कभी बंद ही नहीं होती थी। खिड़की के बाहर की दुनिया अपने ही अंदाज़ में शोर से भरी थी, जिसमें शामिल थे लोगों के कदमों की चाप, स्कूटरों की घरघराहट और एक-दूसरे को पुकारती आवाज़ें। उसने अपना ध्यान उसी कप पर टिकाए रखने की कोशिश की।

लेकिन उसका दिमाग बार-बार उसी एक वाक्य पर लौट आता था, मानो वह उसकी खोपड़ी के भीतर गहराई तक छाप दिया गया हो।

Soap-Rinse-Again

“आपका बच्चा किसी स्पेशल स्कूल के ही लायक है।”

उम्मीद की सांस अंदर खीचना, और दुत्कार बाहर छोड़ देना। यही उसकी जिंदगी की लय बन चुकी थी।

उसे याद भी नहीं था कि वे कितने स्कूलों के दरवाज़ों तक गए थे। कितनी बार उसने दरवाज़े पर खड़े होकर अपना दुपट्टा ठीक किया था, अपनी आवाज़ को संयमित किया था, और मन ही मन अपनी अर्ज़ी का इस तरह रियाज़ किया था जैसे कोई ऐसी प्रार्थना हो जिसे गलत बोलने का जोखिम वह नहीं उठा सकती थी।

हर मुलाकात एक खामोश हिम्मत के साथ शुरू होती थी… और एक बेहद विनम्र इनकार के साथ खत्म हो जाती थी।

किसी के सामने गिड़गिड़ाने का यह उसका पहला मौका नहीं था। और शायद आखिरी भी नहीं होने वाला था।

“मैम… मेरी बच्ची दूसरों से अलग है, लेकिन वह बहुत जल्दी सीखती है,” वह अपनी सफाई में कहती। हालाँकि उसे कोई सफाई देनी ही नहीं चाहिए थी।

“मैंने इसे घर पर ही वर्णमाला सिखाई है। इसे बस एक ऐसे शिक्षक की ज़रूरत है जो इसे सब्र और प्यार से पढ़ा सके। कृपया इसे एडमिशन दे दीजिए। मैं वादा करती हूँ कि मैं भी यहीं रहूँगी। इसे बस एक मौका दीजिए। इसका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।”

वह झूठ नहीं बोल रही थी।

आरू जब दो साल की थी, तब उसके आसपास पसरी खामोशी अचानक बहुत गहरी और भयावह हो गई थी। नाम पुकारे जाने पर भी वह मुड़कर नहीं देखती थी। उसके मुंह से शब्द नहीं निकलते थे। चलने में भी उसने बहुत समय लिया। एक माँ बाकी बच्चों को अपनी माताओं की तरफ भागते, तुतलाते, आंचल खींचते और खाने की चीजें मांगते देखती और कोशिश करती कि वह तुलना न करे, घबराए नहीं, और डर को ही अपनी इकलौती भाषा न बनने दे।

महीनों तक वो परिवार से कहती रही… पहले बहुत धीमे से और फिर थोड़ा सा ज़ोर देकर, “कुछ तो अलग है।”

और परिवार कहता रहा, “हमारी बच्ची को कुछ नहीं हुआ है। कभी-कभी बच्चे वक्त के साथ खुद ही ठीक हो जाते हैं।”

जब इस बात को नकारना मुश्किल हो गया, तो कहानी बदल गई। और सारा इल्ज़ाम अपने ठिकाने पर जा पहुँचा।

“तुम एक अच्छी माँ नहीं हो।”

“तुम्हारे ही पापों का श्राप इस बच्ची को मिला है।”

“तुम्हें दूसरा बच्चा कर लेना चाहिए। यह तो उम्र भर का बोझ बनकर रह जाएगी।”

आरू को किस चीज़ की ज़रूरत है, यह किसी ने नहीं पूछा। माँ ने क्या गलत किया है, इस पर हर किसी की अपनी राय थी।

डॉक्टरों ने आरू को एक नाम दे दिया – एक ऐसी बीमारी का नाम जिसके शब्द माँ को पूरी तरह समझ भले न आए हों, लेकिन उनका दर्द उसने अपने वजूद में महसूस किया था। डॉक्टरों ने थेरेपी, दिनचर्या, थेरेपिस्ट के हस्तक्षेप और मूड को संभालने की दवाएं दी।

हर शब्द किसी भारी-भरकम बिल की तरह आ गिरा।

वह पैसा, जो उनके पास था ही नहीं।

वह वक्त, जो वे उठा नहीं सकते थे।

और एक ऐसा भविष्य, जो अचानक जीने के लिए नहीं, बल्कि किसी तरह संभालने के लिए लगने लगा था।

धीरे-धीरे, आरू का पालन-पोषण एक ऐसा कर्ज़ महसूस होने लगा जिसे चुकाना बाकी था।

अहसान

एक ऐसा “फ़र्ज़” जिसकी लोग दूर से तो तारीफ करते हैं और फिर आपको अकेला छोड़कर चले जाते हैं।

और फिर भी वह माँ उन बातों को नोटिस करती रहती जो बाकी किसी को नज़र नहीं आती थीं।

जब आरू खिलखिलाकर हंसती थी, तो कितनी खूबसूरत लगती थीमानो अचानक कोई खिड़की खुल गई हो और रोशनी छनकर आ गई हो।

वह छोटी-छोटी चीज़ों में कितनी गहराई से डूब जाती थी। पानी में उठती लहरें, पंखे का घूमना, या स्टील के बर्तन पर चम्मच टकराने की आवाज़।

वह एक ही पल में, उसी दुनिया से हैरान भी हो सकती थी और सहम भी सकती थी।

हर किसी को उसकी अक्षमता दिखती थी। उस बच्ची को कोई नहीं देख पाता था।

माँ ने एक अलग जिंदगी के सपने देखे थे। इसलिए नहीं कि उसे कोई परफेक्शन चाहिए था, बल्कि इसलिए कि उसे एक रास्ते की तलाश थी। एक ऐसी जिंदगी जो साधारण दिखे और सुरक्षित हो। उसने अपनी बेटी के लिए भी वैसा ही भविष्य सोचा था। स्कूल, कॉलेज, नौकरी, शादी – एक ऐसा रास्ता जो उन सभी उतार-चढ़ावों से भरा हो जिनका वादा जिंदगी हर किसी से करती है।

फिर उसने आरू की तरफ देखा, और एक ऐसे भविष्य के खौफनाक खालीपन को महसूस किया जिसकी वह कल्पना तक नहीं कर सकती थी।

वह दिन भी कुछ अलग नहीं था।

वे एक और इनकार सहकर घर लौटे थे।

उसने चूल्हे पर पानी चढ़ाया, क्योंकि कुछ काम ऐसे होते हैं जिनकी उम्मीद आपका घर आपसे करता है, भले ही आपका दिल कितना भी भारी क्यों न हो। उसने दो कपों में चाय ढाली। उसका पति कंधे अकड़ाए बैठा था – चेहरे पर एक ऐसा तनाव जो साफ बता रहा था कि उसका सब्र अब जवाब दे चुका है।

कमरे के कोने से आरू के रोने की आवाज़ आने लगी। वह कोई धीमी रोहट नहीं थी। एक तीखी, छटपटाहट भरी पुकार थी।

वह कुछ चाहती थी और उसके पास उसे मांगने के लिए शब्द नहीं थे। उस आवाज़ ने उनके बीच की बची-खुची जगह को भर दिया, रसोई के हर कोने को झकझोर दिया।

उसके पति ने पहले कोशिश की, “चुप करो!” मानो तेज़ आवाज़ से मामला सुलझ जाएगा। उसने हाथ बढ़ाया, फिर झुंझलाकर पीछे खींच लिया। आरू का रोना और तेज़ हो गया। और फिर वह गुस्सा, जिसके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी, उसे सबसे आसान ठिकाना मिल गया।

“इसे यहाँ से दूर भेजो। यह बच्ची एक अभिशाप है। इसे किसी ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ लोग इसे संभाल सकें।”

माँ ने जवाब देने के लिए मुँह खोला, बचाव करने, समझाने, एक बार फिर गिड़गिड़ाने के लिएलेकिन शब्द इतनी तेज़ी से बाहर नहीं आ सके।

पति के हाथ का झटका कप से लग गया।

गरम चाय छिटककर माँ के गाल और गर्दन पर आ गिरी।

पहले जलन महसूस हुई। फिर अपमान। और फिर वही इल्ज़ाम का जाना-पहचाना कड़वा स्वाद। उसने गाली दी, अपनी कुर्सी पीछे धकेली, और दरवाज़ा खुला छोड़कर गुस्से में बाहर निकल गया।

वह वहीं सुन्न खड़ी रही… चाय रिस्ते हुए, चमड़ी जलते हुए, आरू के रोने के अलावा कमरा अचानक बहुत शांत हो गया था।

माँ ज़मीन पर बैठ गई, दीवार से पीठ टिका ली, और आँसुओं को बहने दिया। वे आँसू जिन्हें वह सालों से रोककर बैठी थी… एक बेहद बुरे पल के लिए, उसके मन में एक ऐसा ख्याल आया जिससे उसे खुद से ही नफरत हो गई।

‘मैं यह अब और नहीं कर सकती।’

इसलिए नहीं कि वह अपनी बच्ची से प्यार नहीं करती थी।

बल्कि इसलिए कि वह उस दुनिया से लड़ते-लड़ते थक चुकी थी जो बार-बार उससे यही कह रही थी कि आरू के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है।

तभी एक छोटी सी बात हुई।

आरू घिसटती हुई उसके पास आई और उसके बगल में बैठ गई, मानो यह दुनिया की सबसे स्वाभाविक बात हो। उसने ज़मीन से एक खाली गिलास उठाया और अपनी माँ के हाथों में थमा दिया। ठीक वैसे ही जैसे जब वह रोती थी तो माँ उसके लिए किया करती थी।

फिर उसने अपनी माँ के हाथ पकड़े और उनसे ताली बजवाई… थप, थप। ठीक वैसे ही जैसे माँ उसे शांत कराने के लिए किया करती थी।

यह कोई चमत्कार नहीं था। यह कोई इलाज नहीं था। यह एक बच्ची थी, जो प्यार को याद रख रही थी, अपनी उस इकलौती भाषा में जो वह जानती थी।

माँ की सांसें धीमी पड़ीं। त्वचा पर जलन अब भी थी, लेकिन उसके भीतर कुछ ढीला पड़ा एक गाँठ जो एक धागे से सुलझ रही थी। उसने आरू की तरफ देखा और उस दिन पहली बार एक ऐसी दुनिया देखी जहाँ सिर्फ एक ही बात मायने रखती थी, “क्या मैं तुम्हारे साथ सुरक्षित हूँ?”

आरू की दुनिया में, ढांढस बँधाने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। प्यार बहुत सादा था। साथ होना ही सब कुछ था।

एहसास

माँ ने अपने दुपट्टे के कोने से अपना चेहरा पोंछा। उसके हाथों का कांपना बंद हो गया था। ‘अगर कोई ईश्वर है जो मुझे इस तरह के बच्चे को पालने के योग्य समझता है,’ उसने सोचा, ‘तो मैं भी उसके काबिल बनने की पूरी कोशिश करूँगी।’ वह अचानक बेखौफ नहीं हो गई थी। लेकिन उसके विचार एकदम साफ हो चुके थे। वह आरू का हाथ थामकर धीरे से खड़ी हुई और अपना फोन उठाया। उसने अपने नोट्स ऐप को खोला और एक लाइन टाइप की।

कल एक और स्कूल। एक और बात।

लेकिन इस बार, मैं भीख नहीं माँगूँगी। मैं अपने बच्ची के अधिकार की बात करूँगी।

आरू उसकी टांग से सटकर खड़ी हो गई, अब वह शांत थी, मानो उस बदलाव को महसूस कर सकती हो। और उस शांत कमरे में उस दुनिया के लिए दरवाज़ा अब भी खुला था जो उन्हें समझ नहीं पाती थी। हालांकि माँ एक बात पूरे यकीन के साथ जानती थी, अगर इस दुनिया में आरू के लिए कोई जगह नहीं है, तो वह खुद उसके लिए एक जगह बनाएगी। और बिना कुछ सोचे, वह वापस सिंक की तरफ मुड़ गई। कप अब भी उसके हाथ में था।

साबुन। पानी। और फिर वही कहानी।

(वनइंडिया एक्स्क्लूसिव, ‘बचपन मनाओ’ की प्रस्तुति)



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