वित्त मंत्रालय ने आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी घटाने से जुड़े कानूनी और विधायी घटनाक्रम पर उठ रहे सवालों के बीच शनिवार को स्पष्टीकरण जारी किया। मंत्रालय ने कहा कि 2003 में आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम को लेकर हुई संसदीय चर्चा के दौरान सरकार की हिस्सेदारी में कमी को सीमित करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया था। यह संशोधन अंततः लागू कानून का हिस्सा नहीं बना।
यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है, जब आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने आईडीबीआई बैंक लिमिटेड के रणनीतिक पुनर्गठन को मंजूरी दी है। साथ ही, बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की एक सहायक कंपनी को 52,878.08 करोड़ रुपये में बेचने का फैसला किया गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का दिया हवाला
वित्त मंत्रालय ने कहा कि इस मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया आईडीबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में 17 दिसंबर 2018 को फैसला दिया था। अदालत ने एसोसिएशन की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 पर संसद में हुई चर्चा के दौरान दिए गए बयान केंद्र सरकार को बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने से नहीं रोकते। फैसले के पैराग्राफ 41 में अदालत ने कहा था, ”सदन के समक्ष दिए गए बयान संसद द्वारा बनाए गए कानून का स्थान नहीं ले सकते और न ही उसे बदल सकते हैं।”
अदालत ने यह भी कहा था कि इस मामले में प्रॉमिसरी एस्टॉपल यानी वचन के आधार पर किसी पक्ष को कानूनी रूप से बाध्य करने का सिद्धांत लागू नहीं होता। संसद में हुई चर्चा के दौरान दिए गए बयानों को कर्मचारियों के प्रति ऐसे आश्वासन के रूप में नहीं माना जा सकता, जिनके आधार पर उन्होंने कोई कदम उठाया हो और उन्हें नुकसान हुआ हो।
कानून में हिस्सेदारी घटाने पर रोक नहीं
वित्त मंत्रालय ने हाईकोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 42 का भी उल्लेख किया। इसमें अदालत ने कहा था, ”आईडीबीआई निरसन अधिनियम, 2003 की भाषा में कोई अस्पष्टता नहीं है। इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान जोड़कर पढ़ने की गुंजाइश नहीं है, जो सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी घटाने या उससे पूरी तरह बाहर निकलने से रोकता हो।”
मंत्रालय के मुताबिक, अदालत ने सरकार की हिस्सेदारी घटाने के फैसले को चुनौती देने के लिए इस्तेमाल किए गए प्रॉमिसरी एस्टॉपल के सिद्धांत पर भी स्पष्ट रुख रखा था। इस सिद्धांत के आधार पर सरकार को बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करने या बेचने से नहीं रोका जा सकता।
बजट भाषणों में भी हिस्सेदारी घटाने का जिक्र
वित्त मंत्रालय ने अपने स्पष्टीकरण में लगातार पेश किए गए केंद्रीय बजट भाषणों का भी हवाला दिया। मंत्रालय ने कहा कि विधायी इतिहास, दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले और अलग-अलग वर्षों के बजट भाषणों से आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश को लेकर सरकार की नीति में आए बदलाव स्पष्ट होते हैं।
वित्त वर्ष 2016-17 के बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि आईडीबीआई बैंक में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उन्होंने कहा था कि सरकार इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी और बैंक में अपनी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से नीचे लाने के विकल्प पर विचार करेगी। वित्त वर्ष 2021-22 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही थी।
सीतारमण ने संसद में दिया था क्या बयान?
उन्होंने कहा था, ”कोविड-19 के बावजूद हमने रणनीतिक विनिवेश की दिशा में काम जारी रखा है। बीपीसीएल, एयर इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल, पवन हंस और नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड समेत कई सौदे वित्त वर्ष 2021-22 में पूरे किए जाने थे।”
सीतारमण ने यह भी कहा था कि आईडीबीआई बैंक के अलावा सरकार वित्त वर्ष 2021-22 में दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव रखती है। इसके लिए विधायी संशोधनों की जरूरत होगी और इन्हें उसी सत्र में पेश करने का प्रस्ताव था।
वित्त मंत्रालय ने कहा कि 2003 के कानून का विधायी इतिहास, दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला और लगातार पेश किए गए बजट भाषण मिलकर आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश के प्रति सरकार की नीति के विकास को स्पष्ट करते हैं।