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आयात में उछाल से और बढ़ा व्यापार घाटा: जून में 59% की भारी बढ़ोतरी, क्या भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ेगा दबाव?


भारत के विदेशी व्यापार के मोर्चे से एक प्रतिकूल खबर है। चालू वित्त वर्ष के जून महीने में देश का व्यापार घाटा उम्मीद से कहीं अधिक बढ़ गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत का मर्चेंडाइज (माल) व्यापार घाटा सालाना आधार पर 59% बढ़कर 30.43 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। आयात में आई तेजी और निर्यात की धीमी रफ्तार के कारण पैदा हुई यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी मोर्चे पर चुनौतियों को दर्शाती है। हालांकि, मजबूत सेवा निर्यात और नई वैश्विक साझेदारियां इस दबाव को संभालने में मददगार साबित हो रही हैं।

जून के व्यापार आंकड़ों में ऐसा क्या हुआ जिसने सबको चौंकाया?

जून में व्यापार घाटे का 30.43 अरब डॉलर पर पहुंचना विश्लेषकों के अनुमानों से काफी अधिक रहा। रॉयटर्स के एक पोल के अनुसार, अर्थशास्त्रियों ने जून में व्यापार घाटा 26.63 अरब डॉलर रहने की उम्मीद जताई थी। लेकिन यह आंकड़ा न केवल अनुमानों से ऊपर गया, बल्कि पिछले महीने यानी मई के 28.21 अरब डॉलर के घाटे को भी पार कर गया है। पिछले साल जून में यह घाटा महज 19.10 अरब डॉलर था। 

आंकड़ों के मुताबिक, जहां जून में देश का माल निर्यात 40.41 अरब डॉलर रहा, वहीं सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) ने इस मोर्चे पर बड़ी राहत दी है। जून में देश का अनुमानित सेवा निर्यात 33.03 अरब डॉलर और सेवा आयात 17.92 अरब डॉलर रहने की उम्मीद है, जिससे सेवाओं के मोर्चे पर 15.11 अरब डॉलर का बड़ा व्यापार सरप्लस (बचत) हासिल हुआ है जो घाटे के दबाव को काफी हद तक संतुलित करता है।

वैश्विक चुनौतियों के बावजूद निर्यात के मोर्चे पर राहत कहां से मिल रही है?

तमाम भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत का कुल माल निर्यात सालाना आधार पर करीब 15% बढ़ा है। इसमें मुख्य भूमिका महंगे पेट्रोलियम शिपमेंट की रही है। इसके अलावा, ईरान के साथ युद्ध के व्यवधानों के बावजूद खाड़ी देशों को होने वाले निर्यात में शानदार रिकवरी देखी गई है। वैकल्पिक शिपिंग रूट अपनाने से खाड़ी देशों को निर्यात मार्च के 2.62 अरब डॉलर से लगभग दोगुना होकर मई में 5.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया। 

साथ ही, अप्रैल और मई के दौरान अमेरिका को होने वाला निर्यात भी बढ़कर 17.29 अरब डॉलर रहा है। अमेरिका-ईरान अंतरिम शांति समझौते से कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहने का फायदा भी भारतीय इकोनॉमी को मिला है। यही वजह है कि गोल्डमैन सैक्स ने भारत के लिए साल 2026 की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.8% कर दिया है और चालू खाता घाटे (सीएडी) के अनुमान को घटाया है। इसके अलावा, कमजोर होते रुपये ने भी निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता को सुधारा है।

अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर भारत जल्दबाजी क्यों नहीं कर रहा है?

आयात खर्च को नियंत्रित करने और निर्यात बनाए रखने के दबाव के बीच, भारत ने अमेरिका के साथ जल्दबाजी में कोई व्यापार समझौता करने से इनकार कर दिया है और वह बेहतर शर्तों के लिए इंतजार कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार नए व्यापारिक साझेदारों और हालिया चुनावी जीत के दम पर मजबूती से अपनी बात रख रही है। 



भारत अब अन्य विकसित बाजारों के साथ अपनी पहुंच बढ़ा रहा है। इसी महीने ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौता (यूके एफटीए) लागू होने जा रहा है, जबकि यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ भी अगले साल की शुरुआत तक समझौता होने की उम्मीद है। इसके अलावा, अमेरिकी शुल्कों को लेकर चल रही कानूनी अनिश्चितताओं और किसानों व छोटे व्यवसायों के हितों की रक्षा करने की प्रतिबद्धता ने भी भारत को बातचीत में कड़ा रुख अपनाने का हौसला दिया है।

जून के आंकड़ों में भले ही व्यापार घाटा 59% बढ़ा हो, लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों की कमजोरी नहीं बल्कि एक अस्थायी वैश्विक असंतुलन को दिखाता है। मजबूत सर्विस सरप्लस, खाड़ी देशों में निर्यात की बहाली और ब्रिटेन व यूरोपीय संघ के साथ होने वाले नए समझौतों से भारत आने वाले समय में अपने व्यापार संतुलन को बेहतर बनाने की मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है।



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