भारतीय रिजर्व बैंक आज अपनी मौद्रिक नीति का महत्वपूर्ण निर्णय घोषित करने वाला है। इस घोषणा पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक इस बार भी रेपो दर में कोई बदलाव नहीं करेगा।
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिवसीय बैठक 5 से 7 अक्तूबर तक हुई। समिति ने अगस्त में अपनी पिछली बैठक में रेपो दर को 5.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखा था। उस समय केंद्रीय बैंक ने तटस्थ रुख बनाए रखा था। इसके पीछे मुद्रास्फीति के दृष्टिकोण पर अधिक स्पष्टता की आवश्यकता बताई गई थी। साथ ही, वृद्धि और मुद्रास्फीति की बदलती गतिशीलता को भी एक कारण बताया गया था। बाजार को उम्मीद है कि इस बार भी रेपो दर में कोई बदलाव नहीं होगा। हालांकि, केंद्रीय बैंक के बयान में भविष्य की नीतियों के संकेत मिल सकते हैं। यह निर्णय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
क्या है मौद्रिक नीति समिति का रुख?
मौद्रिक नीति समिति ने अगस्त में रेपो दर को 5.25 फीसदी पर स्थिर रखा था। उस समय समिति ने मुद्रास्फीति के रुझानों पर अधिक स्पष्टता की प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया था। वृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया गया था। समिति का तटस्थ रुख दर्शाता है कि वह स्थिति पर बारीकी से नजर रख रही है।
रेपो दर क्यों है महत्वपूर्ण?
रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक भारतीय रिजर्व बैंक से ऋण लेते हैं। यह दर सीधे तौर पर बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋणों की ब्याज दरों को प्रभावित करती है। रेपो दर में बदलाव से गृह ऋण, वाहन ऋण और अन्य उपभोक्ता ऋण महंगे या सस्ते हो सकते हैं। इसलिए, इसका सीधा असर आम जनता और उद्योगों पर पड़ता है। केंद्रीय बैंक इसका उपयोग मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए करता है।
आरबीआई इस बैठक में फैसला किस आधार पर लेता है?
आरबीआई की एमपीसी बैठक में देश की आर्थिक स्थिति और सबसे जरूरी ‘महंगाई की दर’ (Inflation) को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाता है। अगर बाजार में महंगाई बहुत ज्यादा होती है, तो आरबीआई रेपो रेट को बढ़ा देता है या उसे ऊंचे स्तर पर बरकरार रखता है ताकि लोग कम खर्च करें और महंगाई पर काबू पाया जा सके। वहीं, जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ानी होती है, तो ब्याज दरों को कम किया जाता है।