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Bird Poop make rich nation: इस देश के बारे में जानकर आप दंग रह जाएंगे. यह ऐसा देश है जहां सदियों से चिड़ियों की बीट ने नोटों की गद्दी बिछा दी. समय के साथ इस बीट के कारण देशवासी करोड़पति होने लगे लेकिन फिर सब कुछ पलट गया. पक्षियों की बीट बंद हो गई और लोग कंगाल होते चले गए. आज यह देश दाने-दाने को मोहताज है. इस देश का नाम है नौरू या नाउरु.
नाउरु प्रशांत महासागर में स्थित बहुत ही छोटा सा टापू है. मात्र 21 वर्गकिलोमीटर में फैला है. कोई भी 20-25 मिनट में पूरा देश घूम सकता है. लेकिन नाउरु भी भारत की तरह ही स्वतंत्र और संप्रभू देश है. यह कोई द्वीपों का समूह नहीं है बल्कि यह केवल एक ही अकेला द्वीप है जो गहरे प्रशांत महासागर के बीच में उभरा हुआ है. यह माइक्रोनेशियाई क्षेत्र में का द्वीप है. चूंकि यह समंदर के बीचों-बीच काफी अकेला टापू है, इसलिए ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे बड़े देशों से इसकी दूरी काफी ज्यादा है. नाउरु का सबसे नजदीकी पड़ोसी देश किरिबाती का बानाबा द्वीप है, जो इससे लगभग 300 किलोमीटर पूर्व में है. नाउरु की आबादी महज 10 से 12 हजार है. यह दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश है.

नाउरु की कुदरती सुंदरता को देखते हुए यहां लोगों का आवागमन शुरू हुआ और लोग यहां बसने भी लगे. नाउरु हमेशा से स्वतंत्र नहीं था. प्रथम विश्व युद्ध के बाद लीग ऑफ नेशंस ने इसका प्रशासन ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को सौंपा था. द्वितीय विश्व युद्ध में इस पर जापान का कब्जा रहा.युद्ध के बाद यह संयुक्त राष्ट्र की एक ट्रस्ट टेरिटरी बना जिसका प्रशासन मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया देखता था. आखिरकार 31 जनवरी 1968 को नाउरु ने पूर्ण स्वतंत्रता हासिल की और एक संप्रभु गणराज्य बना. Photo-Instagram

अब यह समझिए कि नाउरु पहले इतना अमीर देश कैसे बना. बीच समंदर में एक छोटा सा टापू था. दूर-दूर तक कोई दूसरा टापू यहां नहीं था. जाहिर है समंदर में रहने वाले पक्षियों का यही बसेरा रहा होगा. लाखों साल तक यहां पक्षियां आती रही है और उन्होंने अरबों टन यहां बीट छोड़ी. इस बीट यानी पक्षियों के मल से फॉस्फेट बनने लगा. यह प्रकृति की एक अद्भुत और लाखों साल पुरानी रासायनिक प्रक्रिया है. नाउरु में लाखों सालों तक इंसानी आबादी नहीं थी लेकिन गनेट और फ्रिगेटबर्ड जैसी पंक्षियों का प्रमुख बसेरा था. लाखों पक्षियों ने सदियों तक इस द्वीप पर अपनी बीट जमा की. इस संचित सूखी बीट को वैज्ञानिक भाषा में गुआनो कहा जाता है. गुआनो नाइट्रोजन और फॉस्फोरस का मिश्रण है. उस समय यहां भारी वारिश होती थी. बारिश के पानी ने गुआनो में मौजूद घुलनशील फॉस्फेट को घोल दिया जो टापू पर पहले से मौजूद कोरल और चूना-पत्थर के साथ प्रतिक्रिया कर नीचे दबता गया. इस रिएक्शन के कारण द्वीप पर अथाह कैल्शियम कार्बोनेट, कैल्शियम फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड बनने लगा. समय के साथ यह इतना कठोर हो गया कि इसने चट्टानों का रूप ले लिया जिसे फॉस्फेट रॉक कहा जाने लगा. यही नाउरु की समृद्धि का प्रतीक बन गया.
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1899 में एक ऑस्ट्रेलियाई ब्रिटिश अधिकारी अल्बर्ट एलिस ने पहली बार नाउरु की चट्टानों में उच्च गुणवत्ता वाले फॉस्फेट की पहचान की. कैल्शियम कार्बोनेट और कैल्शियम फॉस्फेट के बारे में जब दुनिया को पता चला तो उस समय के तत्कालीन शक्तिशाली देशों ने यहां खनन करना शुरू कर दिया.रिफाइनिंग के बाद इस फॉस्फेट रॉक को सल्फ्यूरिक एसिड के साथ मिलाकर सुपरफॉस्फेट या अमोनियम फॉस्फेट खादें बनाई गई. 1906 के आस-पास रिटिश कंपनी ने जर्मन प्रशासन के साथ मिलकर यहां से पहली बार फॉस्फेट का निर्यात किया. ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन ने यहां खूब खनन कर यहां के फॉस्फेट से खूब कमाया. नाउरु के फॉस्फेट ने 20वीं सदी में ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दुनिया के कई देशों की खेती में हरित क्रांति लाने और अनाज उत्पादन बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई. फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड का इस्तेमाल कई चीजों में किया जाता है. डिटर्जेंट और साबुन बनाने में, कोका कोला, पेप्सी जैसी कोल्ड ड्रिक में मिलाए जाने वाली फूड एडिटिव्स के रूप में, माचिस की तीली और बारूद बनाने में, बेकिंग पाउडर में, प्रोसेस्ड मूट आदि में फॉस्फेट का इस्तेमाल किया जाता है.

1968 में आजाद होने के बाद कुछ दशकों तक खुद नाउरु ने भी इससे भारी पैसा कमाया. यहां की आबादी बहुत कम थी. इसलिए इसके खनन से वहां के लोग मालामाल हो गए. फॉस्फेट खनन उद्योग नाउरु सरकार के पूर्ण नियंत्रण में आ गया. इससे देश को भारी आय प्राप्त हुई. 1970 के दशक तक नाउरु प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक बन गया था. सरकार के पास इतना अधिक पैसा हो गया कि लोगों से टैक्स भी नहीं लिए गए. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त थी. विदेशों से आयातित लग्जरी गाड़ियों का अंबार लग गया. मात्रा 10 हजार की आबादी के लिए सरकार ने अपनी अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन भी शुरू कर दी थी. सरकारी अधिकारी और धनी लोग सामान खरीदने और छुट्टियां मनाने के लिए विशेष विमानों से विदेश यात्रा करते थे.तब तक लोगों को लगता था कि फॉस्फेट का खजाना हमेशा के लिए रहेगा. Photo- naurutourism

लेकिन अंधाधुंध खनन के कारण अब यह संसाधन पूरी तरह समाप्त हो चुका है. द्वीप का पूरा मध्य भाग अत्यधिक खनन से क्षतिग्रस्त हो गया. वहां मौजूद सभी पेड़-पौधे और हरियाली बंजर भूमि में बदल गए. इसलिए वहां कोई खेती लायक जमीन भी नहीं बची. विलासितापूर्ण खर्च और बड़े रियल एस्टेट सौदों में अरबों डॉलर बर्बाद हो गए. 1990 के अंत तक फॉस्फेट के भंडार लगभग पूरी तरह समाप्त हो गए. देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई. कर्ज बढ़ता गया. नाउरी के पास देश चलाने के लिए पैसा नहीं बचा था. सरकार की विदेशों में स्थित कई संपत्तियां जब्त कर ली गईं. खेती नहीं होने के कारण अधिकांश लोगों को पैकेटबंद खाने पर जीना पड़ता है. इससे लोगों में मोटापा चरम पर है. संक्षेप में कहें तो यह देश अब दाने-दाने को मोहताज है और विदेशी कर्ज और सहायता के सहारे जी रहा है.



