Maharashtra
-Bhavna Pandey
महाराष्ट्र की राजनीति में छिड़े ‘ऑपरेशन टाइगर’ ने राज्य के सियासी पारे को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के सांसद पाला बदलकर रविवार को अधिकारिक तौर पर एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो गए हे। उद्ध्व ठाकरे की शिवसेना यूबीटी में बड़ी टूट के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने अपनी चुप्पी तोड़ी है।
राज ठाकरे ने कहा मौजूदा राजनीतिक दौर की नैतिकता पर बड़े सवाल उठाते हुए अप्रत्यक्ष तौर पर देश के सत्ताधारी दल को घेरा है। राज ठाकरे ने इतिहास का हवाला देते हुए भारतीय जनता पार्टी को आगाह किया कि सत्ता कभी स्थाई नहीं होती है।

उन्होंने कांग्रेस का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस दल ने देश पर लगभग साठ वर्षों तक एकछत्र राज किया, आज उसकी हालत हर कोई देख रहा है। राज ठाकरे ने सांसदों के पाला बदलने की इस दौड़ पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत करार दिया।
पावर पॉलिटिक्स और राज ठाकरे के तीखे सवाल
पार्टी में टूट और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति पर उंगली उठाते हुए मनसे प्रमुख ने दिल्ली की राजनीति के पीछे चल रहे खेल को उजागर किया। उन्होंने मीडिया के साथ अपनी बातचीत साझा करते हुए बताया कि जब संवाददाताओं ने उनसे उद्धव गुट के सांसदों के टूटने पर राय मांगी, तो उन्होंने पलटकर सीधा सवाल किया कि वर्तमान में केंद्र की सत्ता पर कौन काबिज है?
राज ठाकरे ने आगे कहा कि जब केंद्र में सत्ता भाजपा की है, तो बगावत करने वाले ये सांसद सीधे तौर पर भाजपा में शामिल होने की जगह मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट का दामन क्यों थाम रहे हैं? उन्होंने इशारों में आरोप लगाया कि इस पूरी पटकथा के पीछे दिल्ली का नियंत्रण है, जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह साल 2029 की चुनावी गोटियां फिट करने में व्यस्त हैं.
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर भाजपा इस दलबदल का विरोध करती, तो शायद बागी नेताओं को इतनी हिम्मत नहीं मिलती। राज ठाकरे ने आक्रोश जताते हुए कहा कि आज जनप्रतिनिधियों की निष्ठा करोड़ों रुपये के लेन-देन में खरीदी और बेची जा रही है, जिससे नेताओं के आत्मसम्मान की सरेआम हत्या हो रही है। उनके अनुसार, यह स्थिति लोकतांत्रिक मानदंडों के पूरी तरह विपरीत है।
बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच मनसे अध्यक्ष ने महायुति सरकार पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के राजनीतिक ड्रामे का एकमात्र उद्देश्य राज्य के बुनियादी संकटों से जनता का ध्यान भटकाना है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र इस समय गंभीर कृषि संकट, बेरोजगारी और किसानों की निरंतर हो रही आत्महत्याओं जैसे अहम मुद्दों से जूझ रहा है, जिन पर कोई बात नहीं करना चाहता।
छह सांसदों की बगावत और महायुति की रणनीति
गौरतलब है कि यह सारा विवाद तब शुरू हुआ जब शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के पार्टी छोड़ने की खबरें तेजी से फैलीं। सूत्रों के अनुसार, इन बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर शिंदे नीत वास्तविक शिवसेना में शामिल होने की औपचारिक इच्छा जाहिर की थी। इन अटकलों को तब और बल मिला जब ये सांसद उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई बैठकों से लगातार नदारद रहे।
सांसदों के इस रुख के बाद से ही महाराष्ट्र की राजनीति में दावों और प्रतिदावों का दौर तेज हो चुका है। जहां उद्धव गुट इस बगावत को रोकने के लिए सांगठनिक प्रयास कर रहा है, वहीं शिंदे गुट इस घटनाक्रम को अपनी बड़ी कामयाबी के रूप में देख रहा है। इस टूट ने एक बार फिर शिवसेना के मूल कैडर के बीच नेतृत्व की स्वीकार्यता को लेकर बहस छेड़ दी है।
इस पूरे मामले पर शिवसेना के साठवें स्थापना दिवस के अवसर पर मुंबई में उद्धव ठाकरे ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने विरोधियों के उन आरोपों का खंडन किया जिसमें कहा गया था कि वे केवल सत्ता के लालच में राजनीति कर रहे हैं। ठाकरे ने भावुक होते हुए कहा कि वे सत्ता को बलपूर्वक हाथ में रखने की इच्छा लेकर राजनीति के मैदान में नहीं उतरे थे।
उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि जब तक बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना के सच्चे और निष्ठावान सैनिक उनके साथ खड़े हैं, वे मैदान नहीं छोड़ेंगे। लेकिन जिस दिन महासैनिकों को लगेगा कि उनके हटने का वक्त आ चुका है, वे बिना किसी संकोच के पार्टी के अध्यक्ष पद का त्याग करने के लिए सहर्ष तैयार हो जाएंगे।



