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oi-Oneindia Staff
शनिवार था। सरकारी स्कूल में ड्रॉइंग की क्लास चल रही थी। कक्षा के अंदर एक अलग‑सी चहल‑पहल थी कोई पेंसिल तेज़ कर रहा था, कोई रंगों के डिब्बे खोल रहा था।
कागज़ों की खड़खड़, बेंचों का सरकना, बच्चों की “देखो‑देखो” वाली आवाज़ें। किसी ने पेड़ बनाया था। किसी ने घर, किसी ने सूरज को इतना बड़ा रंग दिया था कि पूरी शीट चमक रही थी।

टीचर ने बच्चों को ड्रॉइंग शीट बाँटीं। “आज सब बनाओ… और कलर भरो,” उन्होंने कहा। और तभी मेरी नज़र कामिनी पर गई। कक्षा 4 की बच्ची। शांत स्वभाव। चेहरे पर मासूमियत जैसे वो कम बोलती है, पर बहुत कुछ देखती है। वह कक्षा के एक किनारे बैठी थी। उसके सामने भी कागज़ था, रंग भी थे लेकिन उसकी गोद में उसकी छोटी बहन थी।
छोटी बहन अभी बहुत छोटी थी। गोद में टिकती तो नहीं, उतरती तो नहीं। कभी उसकी उंगलियाँ कामिनी की पेंसिल पकड़ने जातीं, कभी रंगों के डिब्बे की तरफ। कामिनी एक हाथ से उसे संभालती, दूसरे हाथ से कागज़ की तरफ बढ़ती जैसे दो ज़िंदगी एक साथ पकड़ने की कोशिश कर रही हो।
कामिनी रोज़ अपनी बहन को साथ लेकर स्कूल आती है। क्योंकि उसके मम्मी‑पापा बाहर काम के लिए चले जाते हैं। उस दिन भी माँ उसे स्कूल तक छोड़कर गई थी जल्दी‑जल्दी, जैसे घर का काम भी इंतज़ार कर रहा हो और जंगल का भी।
कामिनी ने किसी से शिकायत नहीं की। बस इतना कहा, बहुत साधारण तरीके से जैसे ये बात उसकी उम्र से बड़ी हो चुकी हो।
“मम्मी घर आ जाएगी… तब वो मेरी बहन को घर ले जाएगी… अभी मम्मी घर पर नहीं है।” माँ का जवाब भी वही था जो कई घरों में सच होता है। “दो‑तीन घंटे की तो बात है… तब तक कामिनी देख लेती है। मैं इसको अपने साथ जंगल भी नहीं ले जा सकती। इतनी देर के लिए कामिनी ही इसका ध्यान रख लेगी… मैं इसे और किसके पास छोड़कर जाऊँ?” यह कोई बहाना नहीं था। यह मजबूरी थी। और उसी मजबूरी के बीच, कामिनी का स्कूल का दिन शुरू होता था, किताबों के साथ नहीं, देखभाल के साथ।
ड्रॉइंग पीरियड में बच्चे रंग भर रहे थे। कोई हँसते‑हँसते अपनी शीट हवा में उठाकर दोस्त को दिखा रहा था। “देख, मेरा घर!” कोई टीचर के पास जाकर तारीफ सुन रहा था। टीचर बोल रही थीं “बहुत बढ़िया!” “वाह!” “कितना अच्छा कलर है!” कामिनी के सामने कागज़ पड़ा था। सफेद। साफ। खाली। उसने पेंसिल उठाई। शायद पेड़ बनाना चाहती थी। या घर। या कुछ भी बस अपना कुछ।
लेकिन उसी क्षण छोटी बहन ने उसकी उंगलियों को खींच लिया। कभी पेंसिल छीन ली, कभी रंगों का डिब्बा
उलटने लगी, कभी शीट पर हाथ मार दिया। कामिनी ने पेंसिल रोक ली। फिर बहन को संभाला। फिर कागज़ की तरफ देखा। फिर बहन के चेहरे की तरफ। फिर कक्षा की तरफ। उसकी आँखें बार‑बार कक्षा में इधर‑उधर जातीं, जैसे वो पूछ रही हो: मेरे हिस्से का समय कहाँ गया?
एक बच्चा अपना कलर‑भरा चित्र लेकर टीचर के पास गया। तारीफ मिली। दूसरा गया। तीसरा गया। और कामिनी… बस अपनी बहन को ऊपर‑नीचे करती रही ताकि वो रोए नहीं, गिर न जाए, कुछ उलट न दे।
कामिनी ने बहुत देर बाद कागज़ पर एक छोटी‑सी रेखा खींची। बस एक। और उसी वक्त बहन ने उसके रंगों को पकड़ लिया उँगलियों में, हथेली में, जैसे खेलना चाहती हो। कामिनी ने जल्दी से रंग बचाए। बहन का हाथ साफ किया। बहन की टोपी ठीक की।
फिर कागज़ देखा। वो रेखा अकेली थी। बाकी कागज़… खाली।
लंच टाइम में बच्चे दौड़कर बाहर गए। किसी ने टिफिन खोला, कोई मैदान की तरफ भागा। खेल‑खेल में धूल उठी, हँसी उठी, शोर उठ गया। कामिनी वहीं रही। उसने बहन को गोद में ऊँचा किया, पकड़ ठीक की। बाकी बच्चे दौड़ते‑भागते, गिरते‑उठते, हँसते और कामिनी अक्सर बस दूर खड़ी होकर देखती रही।
उस उम्र में देखना भी खेल होता है… लेकिन कामिनी के लिए देखना खेल नहीं था। वो चौकन्नी थी। जैसे उसके भीतर कोई अलार्म चल रहा हो “बहन को संभालना है।”
क्लास के आख़िरी मिनटों में टीचर ने कहा, “शीट जमा करो।”
कागज़ों की आवाज़ आई। रंगों के डिब्बे बंद हुए। बच्चे अपने चित्रों को ऐसे संभालकर रख रहे थे जैसे पुरस्कार हो। कामिनी ने अपनी बहन को थोड़ा ऊपर किया, उसकी पकड़ कसकर की, और फिर कागज़ को देखा जैसे आख़िरी बार सोच रही हो कि कुछ कर ले लेकिन समय निकल चुका था।
उसने अपना कागज़ उठाया। उस पर रंग नहीं थे। बस वही सफेदी थी और एक छोटी‑सी रेखा। कामिनी जब कक्षा से बाहर निकली, उसकी गोद में बहन थी। वही गोद, जो घर में भी उसकी है, स्कूल में भी उसकी है।
कुछ बच्चों के हाथ में रंग‑भरे कागज़ थे। और कामिनी के हाथ में… वही बोझ, जिसे कोई “होमवर्क” नहीं कहता लेकिन जो रोज़ उससे कराया जाता है। उस दिन मुझे एक बात बहुत साफ दिखी। कुछ बच्चे स्कूल बैग लेकर आते हैं। और कुछ बच्चे… बचपन उठाकर ले आते हैं।



