इस बार समय से पीछे चल रहे मानसून ने खरीफ फसलों की बुआई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। दक्षिण पश्चिम मानसून के तहत अब तक 43 फीसदी कम बारिश हुई है। इससे देश की दो महत्वपूर्ण नकदी फसलें कपास और सोयाबीन बुआई के शुरुआती दौर में पिछड़ गई हैं।
कृषि मंत्रालय के 19 जून तक के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 17.13 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई हुई है। यह आंकड़ा एक साल पहले के 22.82 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 5.69 लाख हेक्टेयर कम है। बुवाई का यह आंकड़ा बताता है कि कपड़ा उद्योग की इस लाइफलाइन से किसान फिलहाल हाथ खींच रहे हैं।
कपास के रकबे में आई शुरुआती सुस्ती अगर अगले कुछ हफ्तों में नहीं सुधरी, तो कॉटन और यार्न की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिसका सीधा असर टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर पड़ेगा।
कपास की ही तरह तिलहन क्षेत्र को भी तगड़ा झटका लगा है। इसकी मुख्य वजह सोयाबीन की बुआई में आई भारी सुस्ती है। पिछले साल की समान अवधि में सोयाबीन का रकबा 2.50 लाख हेक्टेयर था, जो इस बार 1.20 लाख हेक्टेयर की गिरावट के साथ सिर्फ 1.30 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया। सोयाबीन में इस सुस्ती के कारण तिलहन का कुल रकबा भी पिछले साल के 8.11 लाख हेक्टेयर से गिरकर 7.24 लाख हेक्टेयर रह गया। हालांकि, मूंगफली और सूरजमुखी में मामूली बढ़त है, लेकिन वे सोयाबीन के नुकसान की भरपाई करने में नाकाम रहे हैं।
धान और बाजरे का रकबा बढ़ा: धान की बुआई 4.26 लाख हेक्टेयर बढ़कर 12.36 लाख हेक्टेयर पहुंच गई। मोटे अनाजों जैसे बाजरा का रकबा भी 2.14 लाख हेक्टेयर से दोगुना होकर 4.05 लाख हेक्टेयर पहुंच गया। धान और मोटे अनाजों में सरकारी खरीद का भरोसा एवं कम जोखिम किसानों को आकर्षित कर रहा है, जबकि कपास-सोयाबीन में वैश्विक बाजार की अनिश्चितता और कीटों का डर किसानों को डरा रहा है।
जल प्रबंधन के कमजोर ढांचे से बढ़ रहा वित्तीय जोखिम: मूडीज
मूडीज रेटिंग्स ने सोमवार को एक रिपोर्ट में कहा, भारत का बिखरा जल प्रबंधन ढांचा और पानी की अत्यधिक सब्सिडाइज्ड कीमतें देश के लिए बड़ा वित्तीय एवं क्रेडिट जोखिम पैदा कर रही हैं। वैश्विक रेटिंग एजेंसी का मानना है कि पानी के आवंटन, उसकी कीमतों और वितरण के नियम अब किसी भी देश की आर्थिक मजबूती तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अगर समय रहते इस ढांचे में सुधार नहीं हुए, तो यह लंबे समय में राज्यों के खजाने पर भारी दबाव और क्रेडिट रेटिंग यानी साख पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
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80 फीसदी पानी निगल रही खेती: भारत में पानी की कीमतें अत्यधिक रियायती हैं। विशेष रूप से कृषि क्षेत्र के लिए। देश के कुल ताजे पानी का 80 फीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र में जाता है। सब्सिडी के कारण पानी का विवेकहीन दोहन हो रहा है, जिससे भूजल स्तर खतरनाक स्तर तक नीचे जा रहा है।
एआई और डाटा सेंटर बढ़ा रहे नई मुसीबत: मूडीज ने एक नए उभरते खतरे की ओर भी इशारा किया है। देश में क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का विस्तार तेजी से हो रहा है। इसके चलते बड़े-बड़े डाटा सेंटर बनाए जा रहे हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। डाटा सेंटर की यह तेजी से बढ़ती मांग पानी की कमी से जूझ रहे सिस्टम पर एक नया औद्योगिक दबाव बना रही है, जिससे निपटना सरकारों और यूटिलिटी कंपनियों के लिए आने वाले समय में बड़ी चुनौती होगी।



