सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान ने जंतर-मंतर प्रदर्शन में पुलिसकर्मियों पर प्रदर्शनकारियों से मारपीट के आरोपों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जब आईपीएस अधिकारी खुद प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखाई देते हैं, तो यह बेहद दुखद है। जस्टिस भुयान ने कहा कि पुलिस से जिस निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है, वह कहीं गायब होती दिख रही है। पुलिस को अपना रवैया बदला होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि हिरासत में मौत और फर्जी एनकाउंटर गंभीर अपराध हैं। पुलिस की विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी जस्टिस भुयान ने कहा कि सड़क पर सीटी और लाठी लेकर खड़ा पुलिसकर्मी आम लोगों के लिए राज्य की शक्ति और अधिकार का प्रतीक होता है। जब किसी नागरिक को लगता है कि उसके साथ गलत हुआ है, तो वह मदद के लिए पुलिस के पास जाता है। इसलिए पुलिस की विश्वसनीयता बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि पुलिस बिना जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किए और मानवाधिकारों का उल्लंघन किए बिना भी प्रभावी ढंग से काम कर सकती है। इसके लिए उसे संविधान का पालन करते हुए पेशेवर, निष्पक्ष और ईमानदार तरीके से काम करना होगा। हिरासत में मौत सभ्य समाज का गंभीर अपराध जस्टिस भुयान ने हिरासत में यातना और मौत के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कानून के शासन वाले सभ्य समाज में हिरासत में मौत सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। जांच, पूछताछ या किसी भी स्थिति में किसी व्यक्ति के साथ यातना, क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार नहीं किया जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1997 के डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल मामले का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के बाद भी नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म नहीं होते। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद किसी नागरिक का जीवन का अधिकार निलंबित हो जाता है? जस्टिस भुयान ने कहा कि इसका जवाब स्पष्ट रूप से नहीं है। डीके बसु फैसले में गिरफ्तारी और पूछताछ के नियम जस्टिस भुयान ने बताया कि डीके बसु फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और पूछताछ के दौरान पुलिस के लिए कई निर्देश जारी किए थे। अदालत ने यह भी माना था कि मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पीड़ित को मुआवजा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब सरकारी अधिकारी खुद कानून तोड़ने लगते हैं, तो इससे लोगों का कानून के प्रति सम्मान कम होता है और अराजकता बढ़ती है। किसी भी सभ्य देश में ऐसी स्थिति की अनुमति नहीं दी जा सकती। फर्जी एनकाउंटर को बताया अपराधी सोच जस्टिस भुयान ने फर्जी एनकाउंटर के मामलों पर भी सख्त टिप्पणी की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2011 के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि फर्जी एनकाउंटर कानून के शासन की मूल भावना को खत्म कर देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी सेवारत पुलिसकर्मी के खिलाफ फर्जी एनकाउंटर का आरोप मुकदमे में साबित हो जाता है, तो उसे बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए। जस्टिस भुयान ने कहा, “एनकाउंटर की सोच एक अपराधी सोच है। यह पुलिसिंग का हिस्सा नहीं हो सकती।” पुलिस सुधारों की जरूरत, राजनीतिक दखल से बचना जरूरी जस्टिस भुयान ने पुलिस सुधारों और राजनीतिक हस्तक्षेप के खतरों पर भी बात की। उन्होंने 1977 में गठित राष्ट्रीय पुलिस आयोग का जिक्र किया, जिसने पुलिस की भूमिका, कामकाज और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा से जुड़े मुद्दों पर कई रिपोर्ट दी थीं। आयोग ने मई 1981 में अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। उन्होंने कहा कि आयोग की सिफारिशों में पुलिस के खिलाफ शिकायतों से निपटने और पुलिस को पेशेवर स्वतंत्रता देने जैसे मुद्दे शामिल थे। इसके बावजूद सिफारिशें लागू नहीं हुईं, तो सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में प्रकाश सिंह और अन्य बनाम भारत सरकार मामले में पुलिस सुधारों पर निर्देश जारी किए। इन निर्देशों में राज्य सुरक्षा आयोगों का गठन, DGP की नियुक्ति और न्यूनतम कार्यकाल, जांच और अन्य पुलिस कार्यों को अलग करना, पुलिस स्थापना बोर्ड और पुलिस शिकायत प्राधिकरण बनाना शामिल था। जस्टिस भुयान ने कहा कि राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण पुलिस को कानून के शासन को कमजोर करने का साधन बना सकता है। मणिपुर का उदाहरण देकर बोले- शांति अब भी दूर जस्टिस भुयान ने किताब में शामिल मणिपुर से जुड़े अध्याय का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मणिपुर प्रतिभा और संस्कृति से समृद्ध राज्य है, लेकिन वहां जारी हिंसा चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस, मणिपुर राइफल्स, असम राइफल्स, अर्धसैनिक बलों और सेना की व्यापक मौजूदगी के बावजूद राज्य में शांति अब भी दूर है। उन्होंने कहा, “इससे हम सभी के लिए एक सबक है। भारत के लिए भी एक सबक है।”
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जस्टिस भुयान बोले- प्रदर्शनकारियों पर अफसरों का हमला बेहद दुखद: पुलिस का रवैया बदलना जरूरी; कस्टडी में मौत और फर्जी एनकाउंटर गंभीर अपराध
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