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बचत से शेयर बाजार में क्रांति तक: कैसे धीरूभाई अंबानी ने बदल दी देश में निवेश की परिभाषा? पढ़ें पूरी कहानी


1970 के दशक के भारत की कल्पना कीजिए, जहां किसी स्कूल शिक्षक, छोटे व्यापारी या वेतनभोगी क्लर्क की मेहनत की कमाई केवल सोने, जमीन या बैंक डिपॉजिट तक ही सीमित रहती थी। उस दौर में शेयर बाजार पर केवल गिने-चुने अमीर कारोबारियों और स्थापित व्यापारिक घरानों का वर्चस्व माना जाता था। ऐसे माहौल में चोरवाड़ के एक साधारण परिवार से निकले व्यक्ति ने वह ऐतिहासिक सवाल पूछा जिसने भारत के बचत करने और निवेश करने के तरीके को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने सवाल किया कि यदि लाखों भारतीय परिवार अपने बच्चों के भविष्य के लिए लगन से बचत करते हैं, तो वे केवल बड़ी कंपनियों के सामान के उपभोक्ता ही क्यों रहें, वे उन कंपनियों के मालिक क्यों नहीं बन सकते? यह क्रांतिकारी विचार था धीरूभाई अंबानी का, जिन्होंने शेयर स्वामित्व को चुनिंदा लोगों का विशेषाधिकार न रखकर जन-जन की आकांक्षा बना दिया।

धीरूभाई अंबानी ने भारतीय मध्यवर्ग की बचत का अंदाज कैसे बदला?

धीरूभाई अंबानी ने शेयर बाजार का निर्माण नहीं किया था, क्योंकि भारत के शेयर बाजार उनसे बहुत पहले से मौजूद थे, लेकिन उन्होंने बाजार को आम भारतीय घरों के दरवाजे तक पहुंचा दिया। 1970 के दशक तक आम परिवारों के लिए किसी बड़ी कंपनी में हिस्सेदारी रखना सोच से बाहर था। धीरूभाई ने देश में ‘इक्विटी कल्चर’ (शेयर संस्कृति) को फैलाने का नेतृत्व किया। उन्होंने मध्यम वर्ग को यह विश्वास दिलाया कि किसी कंपनी की सफलता और उसकी विकास यात्रा में आम जनता भी बराबर की भागीदार बन सकती है। शुरुआती शेयरधारकों के लिए रिलायंस के विकास ने न केवल संपत्ति का निर्माण किया, बल्कि एक अटूट भरोसा कायम किया कि आम लोगों के समर्थन से बड़ा औद्योगिक साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है।

यमन के एक क्लर्क से ‘विमल’ ब्रांड की स्थापना तक का सफर कैसा रहा?

धीरूभाई अंबानी को विरासत में कोई औद्योगिक साम्राज्य या व्यापारिक राजवंश नहीं मिला था। 1932 में सौराष्ट्र तट पर स्थित चोरवाड़ के एक साधारण परिवार में जन्मे धीरूभाई किशोरावस्था में ही काम की तलाश में यमन के अदन शहर चले गए। वहाँ उन्होंने ‘ए. बेसे एंड कंपनी’ में क्लर्क के रूप में काम शुरू किया और बाद में पेट्रोलियम व्यवसाय से जुड़े एक तेल-भरने वाले स्टेशन का प्रबंधन संभाला। टैंकरों और व्यापारियों के वैश्विक कारोबार को देखते हुए उन्होंने सीखा कि व्यवसाय मालिकाना हक से ज्यादा अवसरों को पहचानने की क्षमता पर निर्भर करता है।


  • व्यापारिक शुरुआत: मुंबई लौटकर उन्होंने मसालों का छोटा व्यापार शुरू किया, जो बाद में सूत (यार्न) और फिर विनिर्माण में बदल गया।

  • विमल ब्रांड का उदय: 1966 में गुजरात के नरोडा में एक कपड़ा मिल की स्थापना के साथ ‘विमल’ ब्रांड अस्तित्व में आया, जो जल्द ही भारत के घर-घर में पहचाना जाने लगा।

  • पहला स्टार्टअप: जब भारत में ‘स्टार्टअप’ या ‘यूनिकॉर्न’ जैसे शब्द चलन में नहीं थे, तब धीरूभाई पहली पीढ़ी के संस्थापक के रूप में देश का पहला विशाल ‘स्टार्टअप’ चला रहे थे।

1977 के आईपीओ ने भारतीय शेयर बाजार में कौन सी क्रांति ला दी?

धीरूभाई ने अपने क्रांतिकारी सवाल का वास्तविक परीक्षण साल 1977 में किया, जब ‘रिलायंस टेक्स्टाइल इंडस्ट्रीज’ का आईपीओ (पब्लिक इश्यू) बाजार में आया। 


  • सात गुना ओवरसब्सक्रिप्शन: इस आईपीओ को जनता का अभूतपूर्व समर्थन मिला और यह सात गुना ओवरसब्सक्राइब हुआ।

  • आम आदमी बना मालिक: इसके बाद एक आम शिक्षक, क्लर्क या व्यापारी वार्षिक रिपोर्ट, लाभांश (डिविडेंड) और बोनस शेयरों के माध्यम से एक बड़ी औद्योगिक कंपनी की प्रगति का सीधा भागीदार बन गया।

  • विश्वास का निर्माण: इस कदम ने साबित किया कि कंपनी की सफलता को उन आम लोगों के साथ साझा किया जा सकता है जिन्होंने इसकी यात्रा पर भरोसा जताया था।

धीरूभाई अंबानी को ‘औद्योगिक गुजरात ना नाथ’ क्यों कहा जाता है?

भारतीय उद्योग जगत में जब टाटा, बिड़ला और बॉम्बे डाइंग जैसे स्थापित घरानों का दबदबा था, तब धीरूभाई एक पहली पीढ़ी के चैलेंजर के रूप में उभरे। उन्होंने साबित किया कि साधारण पृष्ठभूमि से भी बड़ा औद्योगिक घराना खड़ा किया जा सकता है। गुजरात में, जहां व्यापार, बचत और नपे-तुले जोखिम लेने की परंपरा पुरानी है, धीरूभाई की सफलता ने ‘गुजराती अस्मिता’ को नया आयाम दिया। उनकी सफलता ने यह स्थापित किया कि उद्यम, दृढ़ता और जोखिम लेने का साहस किसी की भी किस्मत बदल सकता है। इसी ऐतिहासिक योगदान के कारण उन्हें ‘औद्योगिक गुजरात ना नाथ’ यानी औद्योगिक गुजरात के पितृपुरुष के रूप में याद किया जाता है।

क्या है धीरूभाई का वो निमंत्रण जो तीन पीढ़ियों से चला आ रहा है?

1977 में धीरूभाई अंबानी का गुजरात और देश को सबसे बड़ा उपहार केवल एक फैक्ट्री या ब्रांड नहीं था, बल्कि भारत की विकास यात्रा में बाहर से मूकदर्शक बने रहने के बजाय उसका हिस्सा बनने का एक निमंत्रण था। जिन लोगों ने इस निमंत्रण को स्वीकार किया, वे देश की सबसे बड़ी सफलता की कहानियों में भागीदार बने। लगभग पचास वर्षों के बाद भी यह निमंत्रण वापस नहीं लिया गया है और तीन पीढ़ियों से लगातार आगे बढ़ रहा है।

अगली किस्त में: नरोदा से जामनगर तक, मुकेश अंबानी ने कैसे एक पिता के सपने को साकार किया?



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