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oi-Oneindia Staff
मेरा नाम राहुल (बदला हुआ) है। मुझे किसी भी चीज़ से पहले, काँच के टकराने की वह आवाज़ याद आती है। एक बोतल का मेज़ से ज़ोर से टकराना। एक गहरी ख़ामोशी। और फिर चीखने-चिल्लाने का शोर इतना भयानक कि मैं, मेरा भाई और मेरी बहन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास वाले अपने छोटे से कमरे के कोनों में दुबक जाते थे, और बस उस तूफ़ान के गुज़र जाने का इंतज़ार करते थे।
एक शाम, मैं एनजीओ सेंटर पर काफ़ी देर से पहुँचा। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस अपनी मुट्ठी आगे बढ़ा दी भींची हुई, हल्की सी काँपती हुई। जब मैंने हथेली खोली, तो उसमें 70 रुपये रखे थे।

सत्तर रुपये… जिनसे समोसे खरीदे जा सकते थे। सिनेमा की एक टिकट आ सकती थी। या कुछ देर के लिए इस घुटन भरे माहौल से भागने का रास्ता मिल सकता था।
“मैं अपने लिए पढ़ाई की गाइड (रेफ़रेंस बुक्स) खरीदूँगा,” मैंने कहा। वहाँ मौजूद बड़े लोग मुस्कुराए, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे उस वक्त समझ पाए थे कि उन सत्तर रुपयों के मेरे लिए क्या मायने थे।
मेरे पिता महाराष्ट्र से एक स्थायी नौकरी की तलाश में दिल्ली आए थे। उन्हें नौकरी मिली भी एक होटल में। लेकिन फिर शुरू हुआ उनका शराब पीना। घर में इसे कोई ‘लत’ या ‘नशा’ नहीं कहता था। सब इसे तनाव कहते थे। आदत कहते थे। एक ऐसी चीज़, जो पढ़े-लिखे लोग दिनभर की थकान मिटाने के लिए करते हैं। हमारे घर में प्यार और नशे के बीच हमेशा होड़ लगी रहती थी, और अक्सर नशा ही जीत जाता था।
जब एक एनजीओ की मदद से मेरा दाखिला स्कूल में हुआ, तो वह कड़क यूनिफॉर्म और भारी बस्ता मुझे एक ढाल की तरह लगता था। स्कूल में अचानक से कोई चिल्लाता नहीं था। वहाँ की ख़ामोशी डरावनी नहीं होती थी। लेकिन मेरी ज़िंदगी में असली बदलाव किसी और चीज़ से आया।
मुझे मेहँदी लगाने का हुनर मिला
धूल और डीज़ल की गंध से भरी उन तंग गलियों में, मेरे हाथों ने सब्र से काम लेना सीखा। मेरी उंगलियों के जादू से हथेली पर फूल खिल उठते थे, केरी के खूबसूरत डिज़ाइन उकरने लगते थे। बारीक रेखाएँ एक-दूसरे से जुड़कर एक मुकम्मल आकार लेती थीं। मेरे आसपास की दुनिया भले ही बेरंग और बदरंग थी, लेकिन जिन हथेलियों को मैं सजाता था, वे रंगीन हो जाती थीं।
एनजीओ की एक सोशल वर्कर की नज़र मेरे इस हुनर पर पड़ी। उन्होंने पास के ही एक छोटे से पार्लर में मुझे काम सीखने में मदद की। शुरुआत में मुझे बहुत कम पैसे मिलते थे लेकिन वे पैसे मेरी खुद की कमाई थे। वे 70 रुपये इस बात का पहला सबूत थे कि मेरी मेहनत और कला की अपनी एक पहचान है, अपना एक मोल है।
लेकिन हर किसी का नज़रिया एक जैसा नहीं था। मेरे दोस्त मेरा मज़ाक उड़ाते, “अरे, मेहँदी? यह तो लड़कियों का काम है!” और घर पर? मेरे पिता हँसे नहीं, उन्होंने सीधा दिल पर चोट की। “पुरुषों वाले काम करो,” उन्होंने डांटते हुए कहा। “यह सब करते हुए शर्म नहीं आती?”
एक रात, मैं अपने कमरे में अकेले बैठा था। हाथ में मेहँदी का कोन था। मेरी उंगलियाँ ठिठक गई थीं। पहली बार मेरे मन में ख्याल आया कि मैं इसे हमेशा के लिए फेंक दूँ इन तानों को, रोज़-रोज़ की बहसों को और खुद के ‘गलत’ होने के इस अहसास को हमेशा के लिए खत्म कर दूँ।
मैं बस इसे फेंकने ही वाला था। अगले दिन, सेंटर की काउंसलर मेरे पास आकर बैठीं और उन्होंने बहुत सादगी से एक बात कही, “कला का कोई जेंडर (लिंग) नहीं होता। एक लड़की ट्रक चला सकती है और एक लड़का एक बड़ा और मशहूर कलाकार बन सकता है। यह तुम्हारी ज़िंदगी है, इसे बिना किसी पछतावे के जियो।”
उस एक बात से मेरा घर रातों-रात नहीं बदला। पिताजी का शराब पीना बंद नहीं हुआ। और पैसों की तंगी भी बनी रही। लेकिन मेरे अंदर कुछ ज़रूर बदल गया। अब जब मैं हाथ में मेहँदी का कोन उठाता हूँ, तो मेरे हाथ काँपते नहीं हैं। मैं आज भी उसी अनिश्चितता भरे घर की तरफ लौटता हूँ लेकिन अब मेरे कदमों में अपने हुनर का भरोसा, अपनी कमाई का स्वाभिमान और अपना रास्ता खुद चुनने की आज़ादी होती है। मैं अब केवल अपने पिता के फैसलों को सहने वाला लाचार दर्शक नहीं हूँ।
एक-एक बारीक और सँभली हुई रेखा खींचते हुए, अब मैं खुद अपने भविष्य की इबारत लिख रहा हूँ।
(वनइंडिया एक्सक्लूसिव, “बचपन मनाओ” की प्रस्तुति)



