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यूपीआई भुगतान पर लगेगा चार्ज?: आरबीआई गवर्नर बोले- लागत का भुगतान किसी न किसी को करना होगा


भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए होने वाली लागत का भुगतान किसी न किसी को करना होगा। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका बोझ जरूरी नहीं कि आम उपभोक्ताओं पर ही डाला जाए। 

मुंबई में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या कमीशन लगाए जाने की संभावनाओं को लेकर सवाल पूछा गया था। इस पर जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इस विषय पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

क्या कहा संजय मल्होत्रा ने?

संजय मल्होत्रा ने कहा, “इस बारे में अभी कुछ कहना बहुत जल्दबाजी होगी। आने वाले घटनाक्रम का इंतजार करना चाहिए। आखिरकार लागत किसी न किसी को वहन करनी होती है, लेकिन जरूरी नहीं है कि इसका भार आम उपभोक्ताओं पर ही पड़े।”

आरबीआई गवर्नर इससे पहले पिछले महीने भी कह चुके हैं कि डिजिटल भुगतान से जुड़ी आधारभूत संरचना (डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर) को बनाए रखने और विकसित करने की लागत को किसी न किसी रूप में पूरा करना आवश्यक है। हालांकि फिलहाल आम उपभोक्ताओं से शुल्क वसूलने को लेकर कोई औपचारिक प्रस्ताव या ढांचा मौजूद नहीं है।

इस बीच, वित्त मंत्रालय ने भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव रखा है, जिसका उद्देश्य भविष्य में 2,000 रुपए से अधिक मूल्य के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर व्यापारियों से शुल्क लेने की संभावनाओं के लिए कानूनी लचीलापन प्रदान करना है। हालांकि वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, सामान्य उपभोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले नियमित यूपीआई भुगतान आगे भी निःशुल्क बने रहेंगे।

रोजमर्रा की खरीदारी से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक ट्रांजैक्शन

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि दूध, सब्जी, किराना और अन्य रोजमर्रा की खरीदारी से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक ट्रांजैक्शन किसी भी संभावित एमडीआर शुल्क के दायरे में नहीं आएंगे। यानी आम लोगों के दैनिक भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क लगने की संभावना बहुत कम है।

वर्तमान में क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के माध्यम से होने वाले ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लागू होता है। हालांकि अधिकांश व्यापारी यह अतिरिक्त लागत सीधे ग्राहकों से नहीं वसूलते और स्वयं वहन करते हैं। वित्त मंत्रालय ने भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम की धारा 10ए में संशोधन का प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत शून्य शुल्क से जुड़े कठोर प्रावधानों को हटाकर सरकार को भविष्य में विभिन्न डिजिटल भुगतान माध्यमों पर शुल्क संबंधी अधिसूचना जारी करने की अधिक स्वतंत्रता देने की योजना है।

लोकसभा में पेश किए गए विधेयक के अनुसार, सरकार को यह तय करने का अधिकार मिलेगा कि कौन से डिजिटल भुगतान माध्यम शुल्क से मुक्त रहेंगे और किन पर भविष्य में एमडीआर लागू किया जा सकता है।फिलहाल कानून के तहत बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को यूपीआई एवं रुपे डेबिट कार्ड जैसे अधिसूचित भुगतान माध्यमों पर किसी प्रकार का शुल्क लगाने की अनुमति नहीं है। प्रस्तावित संशोधन इस व्यवस्था में बदलाव का रास्ता खोल सकता है।

हालांकि सरकार और आरबीआई दोनों ने संकेत दिया है कि किसी भी संभावित बदलाव का उद्देश्य डिजिटल भुगतान प्रणाली को टिकाऊ बनाना है और आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालना नहीं है। यूपीआई पर एमडीआर को लेकर अंतिम निर्णय भविष्य में परिस्थितियों और नीतिगत जरूरतों के आधार पर लिया जाएगा।

 



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