वित्त मंत्रालय ने संसद में एक विधेयक पेश किया है, जो सरकार को इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लगाने का अधिकार देगा। अब इस बात की आशंका बढ़ गई है कि छह साल बाद बड़े यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लग सकता है। इससे पहले सरकार ने जनवरी, 2020 में यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड लेनदेन पर एमडीआर को शून्य कर दिया था।
क्या हो रहे हैं बदलाव?
- सरकार ने भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। वर्तमान कानून बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं (पीएसपी) को यूपीआई एवं रुपे डेबिट कार्ड सहित अधिसूचित भुगतान माध्यमों पर शुल्क लगाने से रोकता है।
- यह संशोधन इस पूर्ण वैधानिक छूट को हटा देगा। इसके बजाय, यह केंद्र सरकार को समय-समय पर यह अधिसूचित करने का अधिकार देगा कि कौन से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान पर शून्य एमडीआर रहेगा और किन पर मर्चेंट शुल्क लगाया जा सकता है।
क्या है एमडीआर
एमडीआर वह शुल्क है, जो व्यापारियों की ओर से डिजिटल लेनदेन को प्रोसेस करने के लिए बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को दिया जाता है। भारत में क्रेडिट कार्ड पर करीब 1.5 फीसदी और डेबिट कार्ड पर 0.9 फीसदी तक एमडीआर लगता है। यूपीआई लेनदेन वर्तमान में व्यापारियों के लिए मुफ्त है।
क्यों लाया गया संशोधन
यूपीआई ने जुलाई में 29.9 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 23.6 अरब लेनदेन को प्रोसेस किया। फोनपे और गूगल पे यूपीआई के माध्यम से होने वाले भुगतानों में दबदबा रखते हैं।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का लंबे समय से तर्क रहा है कि डिजिटल भुगतानों में वृद्धि को बनाए रखना कठिन हो गया है, क्योंकि भुगतान कंपनियों को यूपीआई लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं मिलता है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र में निवेश की उनकी क्षमता सीमित हो गई है।
लेनदेन पर कितना लग सकता है शुल्क?
सूत्रों के अनुसार, सरकार दो व्यापक विकल्पों पर विचार कर रही है। एक निश्चित सीमा से अधिक के लेनदेन पर एमडीआर लगाना या व्यापारी के वार्षिक टर्नओवर के आधार पर शुल्क वसूलना।
- एक प्रस्ताव में सिर्फ बड़े व्यापारियों पर शुल्क लागू करने की बात कही गई है, जबकि उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों के लिए यूपीआई भुगतान मुफ्त रखा जाएगा।
- केंद्र 1.5 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक टर्नओवर वाले व्यापारियों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 0.3 से 0.5 फीसदी एमडीआर लगा सकती है।
- जेफरीज के मुताबिक, 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन की संख्या मूल्य के लिहाज से मर्चेंट पेमेंट वॉल्यूम का 67% है। इस शुल्क से भुगतान उद्योग को 10,000 करोड़ तक का राजस्व मिल सकता है।



