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वह अगले दिन फिर आई – कहानी एक मां एक अटूट संकल्प की


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oi-Oneindia Staff

सादिया बेगम अपनी बेटी का हाथ ज़रूरत से थोड़ा ज़्यादा देर तक थामे रहती है। इसलिए नहीं कि गेट भारी है, बल्कि इसलिए कि छोड़ना मुश्किल है।

सुबह हो चुकी है। धूप तेज़ है। आंगनवाड़ी का दरवाज़ा खुला है। भीतर वही परिचित आवाज़ें हैं बच्चों की हँसी, किसी के रोने की आवाज़, फर्श पर घिसटती चप्पलें और बच्चों के नाम पुकारती शिक्षिका, जैसे अपनी आवाज़ से पूरे दिन को संभाले हुए हो।

Bachpan Mano - Wah kal phir aayi - story

सादिया की बेटी दरवाज़े पर एक पल के लिए ठिठकती है। जैसे भीतर जाने से पहले उस कमरे को महसूस कर रही हो। उसकी नज़र सीधे करीने से रखी चप्पलों पर जाती है। एक के बाद एक, बिल्कुल सीधी कतार में।

सादिया झुककर धीरे से कहती है, मानो उसके शब्द ढाल बन जाएँ, “मैं शाम को लेने आऊँगी। ठीक से रहना… किसी को मत मारना… टीचर की बात सुनना।” बेटी हल्के से सिर हिलाती है। शायद वह हर बात नहीं समझती। लेकिन आवाज़ का अपनापन समझती है। माँ के हाथ का भरोसा समझती है। अंदर से शिक्षिका उसका नाम पुकारती हैं। वह मुड़ती है और भीतर चली जाती है।

सादिया कुछ क्षण वहीं खड़ी उसे देखती रहती है। फिर उसकी नज़र उन छोटी-सी चप्पलों पर जाती है, जिन्हें बेटी जल्दी में उतारकर चली गई थी। वह उन्हें उठाती है। सीधा करती है। और फिर से कतार में सलीके से रख देती है।

यह बहुत छोटा-सा काम है। लगभग ऐसा, जिस पर किसी की नज़र भी न जाए। लेकिन वह इसे ऐसे करती है, जैसे एक बात दर्ज कर रही हो, “मेरी बच्ची का भी यहाँ उतना ही हक़ है।

सादिया वहाँ से जाती नहीं। वह दरवाज़े के पास ही खड़ी रहती है… इतनी पास कि सब सुन सके, और इतनी दूर कि लगे जैसे सुन नहीं रही। धीरे-धीरे दूसरे अभिभावक भी आने लगते हैं। कुछ उसे देखते हैं और नज़र फेर लेते हैं।

एक माँ चुपचाप अपने बच्चे को थोड़ा-सा दूसरी ओर कर लेती है, जैसे दूरी बना लेने से असहजता भी दूर हो जाएगी। सादिया फिर भी हल्की-सी मुस्कान देती है। वैसी मुस्कान, जो हम तब देते हैं जब किसी को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि हम किसी के लिए परेशानी नहीं हैं।

वह अपनी साड़ी ठीक करती है और दीवार की ओर खिसक जाती है, जैसे ख़ुद को थोड़ा छोटा कर लेने से सब आसान हो जाएगा। क्लास के अंदर दिन शुरू होता है। एक कविता शुरु होती है, लय बिखरता है, फिर सँभलता है, कविता आगे बढती है।

अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है। सादिया का दिल तेज़ धड़कने लगता है। वह हल्का-सा झुककर भीतर देखने की कोशिश करती है। क्या वह उसकी बेटी है? उसे दिखाई नहीं देता। और यह न जान पाना, जब आपका बच्चा अंदर हो और आप बाहर, अपने आप में एक पीड़ा है।

तभी उसे आवाज़ें सुनाई देती हैं।
एक नहीं।
कई।

“मुझे डर है, इस बच्ची को देखकर हमारे बच्चे भी ऐसे ही न हो जाएँ।” “इसे स्कूल क्यों भेज रही हैं? यह सीखेगी ही क्या?” फिर एक और आवाज़, पहले से ज़्यादा तेज़ – “आपकी बच्ची हमारे बच्चों को मारती है। इसे उनके साथ बैठने या खेलने मत दीजिए।” सादिया के गले तक वही पुरानी माफ़ी आकर ठहर जाती है… “सॉरी… अम्मा…!”

लेकिन इस बार वह उसे ज़ुबान पर नहीं लाती। क्योंकि शिकायत सिर्फ़ उस एक घटना की नहीं थी। सवाल उसकी बेटी की जगह पर था। एक पल के लिए उसे कमरे के भीतर हलचल दिखती है। जैसे किसी का हाथ उठता है। फिर रुक जाता है। हाथ नीचे आ जाता है। कमरा फिर अपनी रफ़्तार में लौट जाता है। लेकिन वह दृश्य उसके भीतर रह जाता है।

सादिया अपनी चप्पल की पट्टी की ओर देखती है। उसे ठीक करती है। एक छोटी-सी, लगभग अनजानी हरकत। जैसे हाथों को कुछ काम चाहिए, ताकि चेहरा बिखर न जाए। फिर वह दरवाज़े से थोड़ा हट जाती है। बस कुछ क़दम। लेकिन वे कुछ क़दम बहुत लंबे लगते हैं।

दोपहर तक आंगनवाड़ी खाली होने लगती है। माता-पिता लौट आते हैं। बच्चे अपने लोगों को देखते ही दौड़ पड़ते हैं। फैले हुए हाथ। खिले हुए चेहरे। कंधों पर झूलते बस्ते, जैसे कोई पदक हों।

शिक्षिका एक-एक कर नाम पुकारती हैं। हर बच्चा किसी की बाँहों में चला जाता है। कोई गले लगता है। किसी को डाँट पड़ती है। किसी के माथे पर चुंबन मिलता है।
सादिया अपनी बेटी का नाम सुनने का इंतज़ार करती रहती है। एक पल बीतता है। कुछ नहीं होता। फिर वह उसे देखती है।

बेटी अपना बैग पकड़े बाहर आती है। बाल थोड़े बिखरे हुए हैं। चेहरे पर वही थकान है, जो उन बच्चों के चेहरे पर होती है जिन्होंने पूरे दिन ऐसी जगह में ख़ुद को संभालने की कोशिश की हो, जहाँ उनका सहज होना आसान नहीं था।

फिर… एक छोटी-सी बात होती है। वह अपनी माँ की ओर देखती है और मुस्कुरा देती है। यह बड़ी मुस्कान नहीं है। न ही किसी सुखांत फ़िल्म जैसी। बस एक सच्ची मुस्कान। वही, जो किसी बच्चे के चेहरे पर तब आती है जब उसे अपना सबसे सुरक्षित चेहरा दिखाई देता है।

वह माँ का हाथ पकड़ लेती है। सादिया की उँगलियाँ तुरंत उसके हाथ को थाम लेती हैं। जैसे पूरे दिन से रोकी हुई साँस अब जाकर छूटी हो। दोनों साथ घर लौटते हैं। सादिया उसे उन आवाज़ों के बारे में कुछ नहीं बताती। वह नहीं चाहती कि इतनी छोटी उम्र में उसकी बेटी यह जान जाए कि दुनिया ने उसके बारे में फ़ैसला करना शुरू कर दिया है। घर पहुँचकर वह उसके पैरों की धूल धोती है। बैग फिर से ठीक करती है। सुबह के लिए जो हो सकता है, तैयार रखती है। और हर रात की तरह वही योजना बनाती है – कल भी।

अगली सुबह सादिया फिर आंगनवाड़ी के दरवाज़े पर होती है। वही धूप… वही दरवाज़ा… वही करीने से रखी चप्पलों की कतार। बेटी इस बार भी एक पल को ठिठकती है। सादिया झुकती है। उसकी चप्पलें ठीक से रखती है। और फिर धीरे-धीरे उसका हाथ छोड़ देती है। इसलिए नहीं कि अब उसे डर नहीं लगता। बल्कि इसलिए…
क्योंकि उसने एक फ़ैसला कर लिया है।

चाहे तकलीफ़ हो… चाहे लोग घूरें… चाहे फिर कोई शिकायत करे! वह अपनी बेटी को ग़ायब होना नहीं सिखाएगी। वह उसका हाथ छोड़ देती है। और… अगले दिन फिर लौट आती है।

(वनइंडिया एक्सक्लूसिव, ‘बचपन मनाओ’ की प्रस्तुति)



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