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विमान सुरक्षा होगी और पुख्ता: 12,000 से अधिक कमर्शियल पायलट्स का सालभर होगा रैंडम डोप टेस्ट, जानिए क्या अपडेट


भारतीय विमानन क्षेत्र में यात्रियों की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए सरकार एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है। सरकार देश के सभी कमर्शियल पायलटों के लिए सालभर किसी भी समय औचक (रैंडम) नशीले पदार्थों का टेस्ट (साइकोएक्टिव सब्सटेंस टेस्ट) अनिवार्य करने पर विचार कर रही है। नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू ने इसके स्पष्ट संकेत दिए हैं। उन्होंने बताया कि विमानन नियामक नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) इस दिशा में नए सुरक्षा मानकों को लागू करने के लिए सभी संबंधित पक्षों (स्टेकहोल्डर्स) के साथ गंभीर चर्चा कर रहा है। सुरक्षा मानकों को कड़ा करने की यह कवायद हाल ही में उड़ान के दौरान विमान की हवा में अचानक ऊंचाई घटने की एक गंभीर घटना और उसमें मुख्य पायलट के नशीले पदार्थ के सेवन की पुष्टि होने के बाद शुरू हुई है।

आखिर नियमों में अचानक इस बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

यह पूरा मामला तब राष्ट्रीय चर्चा में आया जब 4 अगस्त को फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट AI2379 (एअरबस A320 विमान, रजिस्ट्रेशन वीटी-ईएक्सओ) उड़ान के दौरान क्रूज़ स्टेज पर थी। इसी दौरान विमान ने अचानक लगभग 300 फीट की ऊंचाई खो दी, जिससे विमान अचानक नीचे आ गया। हालांकि, इसके बाद विमान स्थिर हो गया और देश की राजधानी नई दिल्ली में सुरक्षित रूप से उतर गया। लेकिन इसके बाद हुई जांच ने सबको चौंका दिया, जब विमान के मुख्य पायलट (कैप्टन) के नशीले पदार्थ के टेस्ट में मारिजुआना (गांजे) के सेवन की पुष्टि हुई। इस गंभीर सुरक्षा चूक की जांच फिलहाल विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ) के ‘एनेक्सचर 13’ (विमान दुर्घटना और घटना जांच) के तहत कर रहा है। इस घटना ने हवा में यात्रियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

मौजूदा नियम क्या हैं और सरकार का नया प्रस्ताव क्या है?

वर्तमान नियमों के तहत देश में पायलटों और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स (एटीसीओ) के लिए सालाना आधार पर केवल 10 प्रतिशत पायलट नेटवर्क का ही रैंडम डोप टेस्ट किया जाता है। नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि मौजूदा सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स (सीएआर) के तहत यह रैंडम जांच केवल 10 फीसदी पायलटों और अन्य हवाई कर्मियों तक सीमित है। लेकिन अब मंत्रालय का विचार इसे पूरी तरह बदलने का है। मंत्री ने कहा, “हमारी तरफ से एक राय यह है कि हर पायलट को साल के दौरान किसी भी रैंडम समय पर इस टेस्ट से गुजरना चाहिए।” यानी अब 100% पायलटों को इस रैंडम टेस्टिंग के दायरे में लाया जाएगा। भारत में विभिन्न कमर्शियल एयरलाइंस के पास 12,000 से अधिक पायलट कार्यरत हैं। इन सभी को इस नए नियम के तहत कड़े अनुशासन में रहना होगा।

पायलटों के संगठन और एयरलाइंस का इस पर क्या रुख है?

इस गंभीर मुद्दे पर पायलटों के प्रतिनिधि संगठन ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स’ (एफआईपी) ने भी अपनी चिंता जताई है और डीजीसीए को पत्र लिखा है। FIP ने 18 अगस्त को डीजीसीए से अनुरोध किया था कि रैंडम जांच के दायरे को वर्तमान 10 प्रतिशत से बढ़ाकर कम से कम 25 प्रतिशत किया जाए। इसके साथ ही, FIP ने सुझाव दिया है कि केवल पारंपरिक यूरिन (मूत्र) जांच पर ही निर्भर न रहकर, ‘ओरल फ्लूइड’ (लार) टेस्टिंग को भी एक पूरक विधि के रूप में इसके साथ अपनाया जाना चाहिए। दूसरी तरफ, एयरलाइंस ने खुद भी इस दिशा में सक्रिय कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। हालिया घटना के बाद एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने पहले ही अपने सभी पायलटों के लिए अनिवार्य साइकोएक्टिव सब्सटेंस टेस्टिंग प्रक्रिया शुरू कर दी है।

विमानन क्षेत्र और यात्रियों की सुरक्षा पर इसका क्या असर होगा?

इस कड़े नीतिगत बदलाव से भारतीय विमानन क्षेत्र में सुरक्षा का एक नया अध्याय शुरू होने की उम्मीद है। देश के सभी 12,000 से अधिक कमर्शियल पायलटों को कड़े नियमों के दायरे में लाने से यात्रियों का हवाई यात्रा पर भरोसा और बढ़ेगा। नागरिक उड्डयन मंत्री के अनुसार, डीजीसीए इस डोप टेस्ट प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए सभी पक्षों के साथ विचार-विमर्श कर रहा है ताकि भविष्य के लिए एक अधिक सख्त और प्रभावी नीति लाई जा सके। नियामक का उद्देश्य उड़ानों के दौरान मानवीय भूलों या लापरवाही के कारण होने वाले किसी भी संभावित बड़े हादसे को पूरी तरह रोकना और देश की विमानन सुरक्षा को वैश्विक मानकों पर खरा उतारना है।



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