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सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट में मिली सजा रद्द की: पीड़िता को पति ने छोड़ा तो आरोपी ने ही शादी की, 10 लाख का मुआवजा भी दिया


नई दिल्ली37 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट में मिली सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने यह फैसला इसलिए लिया, क्योंकि आरोपी और पीड़िता ने बाद में शादी कर ली और आरोपी ने पीड़िता को 10 लाख रुपए का मुआवजा भी दिया। कोर्ट का कहना है कि बालिग होने के बाद पीड़िता ने आरोपी से शादी कर ली थी। पीड़िता ने ही उसकी सजा रद्द करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी और पीड़िता अब समाज में पति-पत्नी की तरह शांतिपूर्वक जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं। 2019 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को 10 साल की सजा सुनाई थी। मद्रास हाई कोर्ट ने सजा सस्पेंड कर दी थी, लेकिन 2021 में केस खत्म करने की पीड़िता की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

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कोर्ट ने विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर फैसला सुनाया

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए फैसला सुनाया। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार है कि वह अपने पास लंबित किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कोई भी आदेश पारित कर सके।

जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदूरकर की बेंच ने कहा- मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए, हम अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल करना उचित समझते हैं। यह फैसला पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(1) के तहत लगे आरोप के संबंध में है और अपीलकर्ता को इस आरोप से बरी किया जाता है।

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अब पूरा मामला जानिए…

यह मामला साल 2018 का है, तब पीड़िता नाबालिग थी। उसे इस व्यक्ति से प्रेम हो गया था। आरोपी को नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध बनाने के अपराध में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत 10 साल की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद पीड़िता की किसी और युवक से शादी हो गई थी। लेकिन उसके पिछले रिश्ते के बारे में पता चलने के कुछ ही दिनों बाद ही पति ने उसे छोड़ दिया था।

जमानत पर बाहर आने के बाद आरोपी फिर पीड़िता के संपर्क में आया। दोनों के बीच सुलह हो गई और साल 2024 में दोनों ने शादी कर ली थी। शादी के बाद महिला ने अपने पति को पॉक्सो अधिनियम के तहत सुनाई गई सजा को रद्द करने का अनुरोध करते हुए मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी।

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