What is Mesh network : दिल्ली में सीजेपी के प्रोटेस्ट में इंटरनेट बंद होने के बाद भी मेश नेटवर्क बेस्ड ऐप्स के धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। इन ऐप्स के मेन सर्वर विदेशी धरती पर होने से यह सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। जानिए बिना इंटरनेट यह ऐप आखिर काम कैसे करते हैं।
रमेश त्रिपाठी, नई दिल्ली
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में खत्म हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन के दौरान इंटरनेट शटडाउन के बावजूद बिटचैट, ब्रिजफाई, ब्रायर और फायरचैट ऐप जैसे मेश नेटवर्क आधारित ऐप का बड़े पैमाने पर हुआ उपयोग सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। खुफिया इकाइयों के मुताबिक, इन ऐप्स के जरिए देश की संवेदनशील आंतरिक जानकारियां, रणनीतिक लोकेशन और सुरक्षा बलों की मूवमेंट से जुड़ा डेटा विदेशी सर्वरों के माध्यम से दुश्मन देशों तक पहुंचने का एक गंभीर और वैज्ञानिक सुरक्षा जोखिम खड़ा हो गया है। इसे देखते हुए शीर्ष सुरक्षा एजेंसियां एक बड़े डिजिटल एक्शन प्लान पर काम कर रही हैं। इन ऐप पर डिजिटल स्ट्राइक भी शुरू कर दी गई है।
दुश्मन देशों तक डेटा लीक गणित का माध्यम
तकनीकी जांच मामलों की विशेषज्ञ यूनिट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चूंकि इन ऐप्स के मुख्य सर्वर विदेशी धरती पर हैं, इसलिए भारत सरकार के पास इन पर कोई कानूनी नियंत्रण नहीं है। तकनीकी रूप से, जब मेश नेटवर्क का कोई भी एक सिंक प्वॉइंट इंटरनेट से जुड़ता है तो डेटा पैकेट्स सीधे अमेरिका, जर्मनी व नीदरलैंड्स के सर्वर पर अपलोड होते हैं। वहां से चीन या पाकिस्तान जैसी विदेशी खुफिया एजेंसियां ‘डेटा स्क्रैपिंग’ या ‘रूट-लेवल इंटरसेप्शन’ के जरिए इस डेटा को आसानी से हासिल कर सकती हैं, जिससे भारत की आंतरिक सुरक्षा को सीधे भेदने का बड़ा खतरा बन जाता है।
‘डेटा स्क्रैपिंग’ एक कंप्यूटर बॉट/प्रोग्राम होता है जो किसी भी वेबसाइट या विदेशी सर्वर पर मौजूद हजारों लोगों की चैट, प्रोफाइल और लोकेशन जैसी जानकारियों को सेकंडों में खींचकर एक जगह इकट्ठा कर लेता है। वहीं, ‘रूट-लेवल इंटरसेप्शन’, इंटरनेट या सर्वर के मुख्य रास्ते (रूट) पर बैठकर डेटा को बीच में ही चुराने या हैक करने की तकनीक है, जिससे डेटा अपने असली सोर्स तक पहुंचने से पहले ही दुश्मनों के हाथ लग जाता है।
अदृश्य इंटरनेट गेटवे की तरह करता है काम
विशेषज्ञों के मुताबिक जब इंटरनेट शटडाउन के दौरान भीड़ में मौजूद हजारों लोग पूरी तरह ऑफलाइन मेश ऐप्स पर जुड़े होते हैं, तो उनका पूरा नेटवर्क अदृश्य रहता है। लेकिन जैसे ही उस भीड़ में किसी एक भी व्यक्ति का फोन वीपीएन या किसी गुप्त वाई-फाई के जरिए इंटरनेट से कनेक्ट होता है, तो उसका फोन पूरे ऑफलाइन नेटवर्क के लिए एक छिपा हुआ दरवाजा या इंटरनेट गेटवे बन जाता है। इसके बाद, पिछले कई घंटों की पूरी ऑफलाइन चैट हिस्ट्री उस एक फोन के माध्यम से विदेशों में स्थित सर्वरों पर ऑटो-अपलोड हो जाती है।
क्या होता है मेश नेटवर्क
मेश नेटवर्क (Mesh Network) में घर या किसी स्थान पर कई छोटे-छोटे वाई-फाई डिवाइस (नोड) लगे होते हैं। ये सभी आपस में जुड़े रहते हैं और मिलकर पूरे इलाके में एक जैसा मजबूत इंटरनेट सिग्नल पहुंचाते हैं। अगर इनमें से कोई एक डिवाइस खराब हो जाए, तो नेटवर्क खुद दूसरा रास्ता चुनकर इंटरनेट चलाता रहता है।
एजेंसियों का नेक्स्ट-जेन डिजिटल प्लान
विदेशी ताकतों द्वारा इस लूपहोल का फायदा उठाने से रोकने के लिए भारतीय तकनीकी एजेंसियां (आई4सी और साइबर सेल) तीन स्तरीय वैज्ञानिक रणनीति पर काम कर रही हैं
1. सोर्स कोड टेकडाउन
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) का उपयोग करते हुए, एजेंसियों ने वाया गृह मंत्रालय माइक्रोसॉफ्ट के कोडिंग प्रोजेक्ट्स (सोर्स कोड) को ऑनलाइन स्टोर करने वाले गिटहब को आधिकारिक नोटिस जारी कर बिटचैट के सभी सोर्स कोड और यूआरएल को भारत में तुरंत ब्लॉक करवा दिया है।
2. डिजिटल जियो-फेंसिंग
गूगल प्ले स्टो और एप्पल ऐप स्टोर के साथ मिलकर एक ऐसी वर्चुअल बाउंड्री तैयार की जा रही है, जिससे भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर ब्रिजफाई और ब्रायर जैसे ऐप्स के डाउनलोड और अपडेट को पूरी तरह ब्लॉक किया जा सकेगा।
3. स्मार्ट आरएफ जैमिंग
भविष्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति में एजेंसियां विरोध स्थलों पर 2.4 गीगाहर्ट्ज बैंड को डिस्टर्ब करने वाले विशेष आरएफ जैमर्स तैनात करने की तैयारी है। यह तकनीक ब्लूटूथ और वाई-फाई डायरेक्ट के सिग्नलों को टकराने पर मजबूर कर देगी, जिससे मेश नेटवर्क क्रैश हो जाता है।



