भारत की पहली तिमाही की आर्थिक विकास दर को लेकर इस समय देश के नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के बीच एक बड़ी बहस छिड़ गई है। सरकार ने उस दावे को पूरी तरह से सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी विकास दर 7.8 प्रतिशत नहीं, बल्कि केवल 2.6 प्रतिशत के करीब थी। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) ने साफ किया है कि देश की 7.8 प्रतिशत की मजबूत आर्थिक वृद्धि पूरी तरह से वास्तविक उत्पादन आंकड़ों पर आधारित है और इसे कम करके आंकने के प्रयास सेब की तुलना संतरे से करने जैसा हैं।
आखिर क्या है यह 2.6% बनाम 7.8% का पूरा विवाद?
इस पूरे विवाद की शुरुआत पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि यदि पिछले साल की पहली तिमाही की जीडीपी को करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये नहीं किया गया होता, तो मौजूदा कीमतों पर देश की जीडीपी विकास दर महज 2.6 प्रतिशत के आसपास होती। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले साल के आंकड़ों को जानबूझकर संकुचित किया गया है ताकि चालू वर्ष की विकास दर को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा सके।
सरकार ने इसे सेब और संतरे की तुलना क्यों बताया?
सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग ने इस दलील को पूरी तरह दोषपूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने साफ-साफ कहा कि आलोचक दो ऐसी चीजों की तुलना कर रहे हैं जिनका आपस में कोई मेल नहीं है:
- अलग-अलग आधार वर्ष: आलोचक जिस 86.05 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े का हवाला दे रहे हैं, वह पुराने ‘2011-12’ के आधार वर्ष पर आधारित था। सरकार की ओर से फरवरी 2026 में नया 2022-23 आधार वर्ष पेश किए जाने के बाद इस पुराने आंकड़े का कोई महत्व नहीं रह गया है।
- चालू बनाम स्थिर कीमतें: जीडीपी की वास्तविक वृद्धि की गणना हमेशा स्थिर कीमतों पर की जाती है ताकि महंगाई के प्रभाव को हटाया जा सके, जबकि आलोचक चालू कीमतों की तुलना कर रहे हैं।
क्या पिछले साल की जीडीपी को जानबूझकर घटाया गया?
मंत्रालय ने साफ किया कि डेटा में बदलाव किसी हेरफेर का हिस्सा नहीं, बल्कि सामान्य संशोधन चक्र का हिस्सा है। नए आधार वर्ष (2022-23) के तहत, पिछले साल की पहली तिमाही की जीडीपी शुरुआत में 80.32 लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी, जिसे बाद में नए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) के आधार पर संशोधित कर क्रमशः 80.44 लाख करोड़ रुपये और अंततः 80 लाख करोड़ रुपये किया गया। इसलिए यह कहना गलत है कि आंकड़ों को कृत्रिम रूप से घटाया गया।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नेगेटिव डिफ्लेटर का क्या खेल है?
आलोचकों ने इस बात पर भी सवाल उठाए थे कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में वास्तविक वृद्धि (9.2%) नॉमिनल वृद्धि (7.7%) से अधिक कैसे हो सकती है। मंत्रालय ने समझाया कि ऐसा डबल डिफ्लेश’ पद्धति के कारण हुआ है। जब कच्चे माल (इन्पुट) की कीमतें तैयार उत्पादों (आउटपुट) की तुलना में तेजी से बढ़ती हैं (जैसे कपड़ा, धातु और प्लास्टिक सेक्टर में हुआ), तो नॉमिनल ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (जीवीए) वास्तविक जीवीए की तुलना में धीमा हो जाता है। इसके चलते ही वहां -1.5% का निगेटिव डिफ्लेटर दिखाई दे रहा है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फैक्टरी-गेट पर उत्पाद सस्ते हुए हैं।
माइनिंग और कृषि क्षेत्रों में क्या रुझान देखने को मिला?
खनन क्षेत्र में भी ऐसा ही विरोधाभास दिखा, जहां वास्तविक माइनिंग जीवीए में 2.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन नॉमिनल जीवीए में 22.3 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई। इसका कारण यह था कि अप्रैल से जून के दौरान कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 72.2 प्रतिशत तक का उछाल आया था। वहीं कृषि क्षेत्र में स्थिति अलग थी, जहां उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) में 5 प्रतिशत की बढ़त के कारण कृषि जीवीए में 3.9 प्रतिशत की सकारात्मक मुद्रास्फीति दर्ज की गई।
सरकार के इस जवाब से साफ है कि भारत की जीडीपी गणना वैश्विक मानकों और नए डेटा स्रोतों के अनुसार पूरी तरह से पारदर्शी है। आधार वर्ष में बदलाव और डेटा का समय-समय पर संशोधन किसी भी प्रगतिशील अर्थव्यवस्था की सामान्य सांख्यिकीय प्रक्रिया है। 7.8 प्रतिशत की यह वास्तविक विकास दर भारतीय अर्थव्यवस्था की जमीनी मजबूती को दर्शाती है, जिसे अनुचित तुलनाओं के जरिए खारिज नहीं किया जा सकता।



