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सोनिया गांधी बोलीं-मोदी और मेरी भारत को लेकर सोच अलग: राजीव से मुलाकात के 60 साल बाद भी मैं वही इंसान हूं, बस पहले जितना हंसती नहीं


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नई दिल्ली25 मिनट पहले

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कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपनी नई किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ के जरिए पहली बार अपनी निजी जिंदगी, राजीव गांधी के साथ रिश्ते और भारतीय राजनीति के सफर पर खुलकर बात की है। यह किताब 10 नवंबर को लॉन्च हो रही है।

द हिंदू को इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि इटली से भारत आने के बाद उनकी जिंदगी कैसे बदली और इंदिरा-राजीव गांधी से उन्होंने क्या सीखा। सोनिया ने 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने, इमरजेंसी, कांग्रेस की मौजूदा स्थिति और BJP-RSS की राजनीति पर भी अपनी राय रखी।

उन्होंने कहा कि पिछले 12 साल में देश के लोकतंत्र और संस्थाओं को बहुत नुकसान पहुंचा है। हालांकि, उन्हें भरोसा है कि देश के लोग सुशासन की वापसी का स्वागत करेंगे। मोदी और मेरी भारत को लेकर सोच अलग है। राजीव से मुलाकात और उसके 60 साल बाद भी मैं वही इंसान हूं, बस पहले जितना हंसती नहीं हूं।

द हिंदू के पूर्व एडिटर-इन-चीफ से बातचीत के अंश

सवाल: आपने हाल ही में X पर लिखा था- ‘दूसरे लोग दशकों से मेरी कहानी बताते रहे हैं, अब मेरी बारी है।’ AI की मदद से की गई मेरी बिब्लियोग्राफिकल (पुस्तकों से संबंधित) खोज में कम से कम 75 किताबें मिलीं। इनमें कई ऐसी जीवनियां भी हैं, जो काफी हद तक आपकी कहानी बताने का दावा करती हैं। आपकी पोस्ट से लगा कि दूसरों के आपके बारे में लिखने से आप नाराज या परेशान नहीं, बल्कि इसे लेकर कुछ मजाकिया अंदाज में हैं। क्या मैं सही समझा? क्या आपने उन लेखकों की किताबें पढ़ीं, जिन्होंने दशकों तक आपकी कहानी लिखी?

जवाब: मुझे तो अंदाजा ही नहीं था कि इतनी सारी किताबें हैं! लेकिन मैंने कभी अपने बारे में लिखी किताबें पढ़ने की इच्छा महसूस नहीं की। बहुत पहले राजीव और मैंने समझ लिया था कि हमारे बारे में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उसे पढ़ते रहना व्यर्थ है। लेकिन जैसा कि मैंने अपनी किताब में भी कहा है, एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि अब मुझे अपनी कहानी खुद बतानी चाहिए।

सवाल: आपने अपनी किताब ‘बिलॉन्गिंग’ (Belonging) की प्रस्तावना में बताया है कि आपने अपनी कहानी लिखने का फैसला कैसे किया। आपने विनम्रता से इसे ‘शायद दूसरों के साथ साझा करने लायक कहानी’ कहा है। क्या वर्षों से आप पर अपनी कहानी लिखने का दबाव डाल रहे लोगों की वजह से आपने यह फैसला लिया, या आपके भीतर से इसकी इच्छा पैदा हुई? या फिर दोनों कारण थे? यह भी बताइए कि बीच-बीच में आए ब्रेक को मिलाकर इस किताब को लिखने में आपको कुल कितना समय लगा?

जवाब: इतना लंबा समय बीत चुका है कि अब ठीक-ठीक याद भी नहीं कि इसकी शुरुआत कब हुई थी। लेकिन इतना जरूर कह सकती हूं कि मैंने पहली बार कुछ लिखना एक दशक से भी पहले शुरू किया था। हालांकि, गंभीरता से लिखना करीब पांच साल पहले ही शुरू किया।

यह सिलसिला लगातार नहीं चला। कभी ऐसा होता था कि शब्द और विचार अपने आप आते चले जाते थे, तो कभी कुछ भी लिखना मुश्किल हो जाता था। ऐसे मौकों पर मैं निराश होकर हाथ खड़े कर देती थी।

सवाल: आपने ‘बिलॉन्गिंग’ को एक व्यक्तिगत संस्मरण बताया है, जिसमें राजनीति सिर्फ पृष्ठभूमि या एक तरह का ढांचा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस किताब के केंद्र में एक प्रेम कहानी है। राजीव और सोनिया के बीच पहली ही मुलाकात में बना असाधारण और गहरा प्रेम संबंध, जो धीरे-धीरे एक बड़े रिश्ते में बदलता गया। इस रिश्ते ने आपको सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारों तक पहुंचाया। फिर अनिच्छा के बावजूद आप सार्वजनिक जीवन और राजनीति में आईं और अंततः देश की प्रमुख राजनीतिक नेताओं में शामिल हुईं। यह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता, है न?

जवाब: हां! यही एक वजह थी कि इतने लंबे समय तक मेरी इस कहानी के बारे में बात करने की इच्छा नहीं हुई।

लेकिन यह सिर्फ हम दोनों की प्रेम कहानी नहीं है। यह इस बात की कहानी भी है कि कैसे मुझे राजीव के परिवार और उस देश से प्यार हो गया, जिससे उनका रिश्ता था। धीरे-धीरे मैं भी उस परिवार और देश का हिस्सा बन गई।

यह इस बात की कहानी भी है कि इसी प्यार ने मुझे सार्वजनिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया। जब मुझे लगा कि उन लोगों के सभी बलिदानों का उद्देश्य खतरे में पड़ रहा है और पार्टी कमजोर हो रही है, तब मुझे लगा कि मुझे कुछ करना ही होगा।

सवाल: लेखक आर.के. नारायण ने एक बार कहा था कि समय बीतने और उम्र बढ़ने के बावजूद, ‘हमारे भीतर का इंसान वही रहता है।’ यह बात इंसान की स्थायी पहचान को बयां करती है। आपका बचपन इटली के एक छोटे से शहर में ऐसे परिवार और सामाजिक माहौल में बीता, जो उस दुनिया से बिल्कुल अलग था, जिसमें आप आगे चलकर रहने लगीं और जिसे अपना बना लिया। भारत में छह दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद, पीछे मुड़कर देखती हैं तो उस युवा इतालवी लड़की का कितना हिस्सा आज भी आपके व्यक्तित्व में मौजूद है?

जवाब: बचपन में जो मूल्य और संस्कार मैंने सीखे, वे आज भी मेरे भीतर हैं। मैंने हमेशा कोशिश की है कि उनके प्रति ईमानदार रहूं। परिवार और दोस्तों के प्रति वफादारी, दूसरों के लिए सच्चाई और संवेदनशीलता, अपने कर्तव्यों को समझना और जिम्मेदार होना- ये मूल्य आज भी मेरे जीवन का हिस्सा हैं।

मुझे लगता है कि इन मामलों में मैं आज भी वही इंसान हूं, जिससे राजीव 60 साल पहले मिले थे। हालांकि, उस समय मैं आज के मुकाबले कहीं ज्यादा मुस्कुराती और हंसती थी!

सवाल: राजीव गांधी, जो आपके जीवन का प्यार थे, और इंदिरा गांधी, जिनके साथ आपका बेहद करीबी रिश्ता था, आपकी कहानी के दो प्रमुख किरदार हैं। आज पीछे मुड़कर देखती हैं तो आपको दोनों की सबसे बड़ी खूबियां क्या लगती हैं? इन दोनों ने आपके जीवन और सोच को किस तरह प्रभावित किया?

जवाब: जब मैं एक युवा दुल्हन के रूप में भारत आई थी, तब मुझे इस देश के बारे में कुछ भी पता नहीं था। आज मैं जो कुछ भी हूं और भारत के बारे में जो कुछ भी जानती हूं, वह सब मैंने उन्हीं दोनों से सीखा है।

उनका साहस, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और सबसे बढ़कर कर्तव्य के प्रति उनका समर्पण, जो दोनों के लिए किसी भी दूसरी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण था, मेरे लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहा।

इन्हीं गुणों ने मुश्किल और संदेह से भरे दौर में भी मुझे मजबूती से डटे रहने की ताकत दी।

सवाल: आपने लिखा है कि संजय गांधी का नाम आपातकाल (Emergency) के साथ जुड़ गया था। राजीव गांधी अपनी मां इंदिरा गांधी को उन शिकायतों और प्रतिक्रियाओं के बारे में बताते रहते थे, जो उन्हें लोगों से सुनने को मिलती थीं, लेकिन उनकी ओर से कभी कोई जवाब नहीं आता था। क्या आपको लगता है कि अगर इंदिरा गांधी अपने बड़े बेटे और उन दूसरे लोगों की बात सुनतीं, जो उन्हें आपातकाल के दौरान हो रही घटनाओं और ज्यादतियों के बारे में ईमानदारी से बताते थे, तो आपातकाल की कथित ज्यादतियों को रोका जा सकता था?

जवाब: इसके लिए सिर्फ संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे, हालांकि आम लोगों की नजर में अक्सर उनका नाम आपातकाल का पर्याय बन गया है। इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था। मुझे लगता है कि उनके आसपास राजीव जैसे बहुत कम लोग थे, जिनका नजरिया उनसे अलग था।

मेरा मानना है कि आखिरकार मेरी सास ने अपनी समझ और विवेक से हालात को समझना शुरू किया और उन्हें सुधारने के लिए कदम उठाए।

सवाल: मैंने जिस आपातकाल को देखा और जिसका विरोध किया, वह निस्संदेह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक काला अध्याय था। अच्छी बात यह रही कि कई जटिल कारणों से यह ज्यादा समय तक नहीं चला। आपने अपनी किताब में आपातकाल के बारे में विस्तार से लिखा है। यह स्पष्ट है कि राजीव गांधी की तरह आप भी उस दौरान हुई कई घटनाओं को गलत मानती हैं। क्या यह कहना उचित नहीं होगा कि आपातकाल को केवल अत्यधिक केंद्रीकृत शासन और कुछ ज्यादतियों वाले दौर के बजाय एक अलोकतांत्रिक और तानाशाहीपूर्ण अध्याय के रूप में पहचाना जाना चाहिए?

जवाब: आपातकाल के दौरान वास्तव में क्या-क्या हो रहा था और उसकी गंभीरता कितनी थी, इसका मुझे पता आपातकाल खत्म होने के बाद ही चला।

हां, उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया था और बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) के अधिकार को निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, यह सब संवैधानिक तरीके से किया गया था।

लेकिन जब मैं खुद को उस दौर में ले जाकर श्रीमती गांधी के नजरिए से हालात को देखने की कोशिश करती हूं, तो मुझे लगता है कि वह तेजी से बिगड़ती परिस्थितियों से निपटने के लिए संघर्ष कर रही थीं। उस समय हिंसक प्रदर्शन हो रहे थे, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन के साधनों में आग लगाई जा रही थी, बड़े पैमाने पर संगठित अशांति थी और यहां तक कि नौकरशाही तथा सशस्त्र बलों से सरकारी आदेशों की अवहेलना करने की अपील भी की जा रही थी।

आज पीछे मुड़कर देखने पर हम घटनाओं को बेहतर परिप्रेक्ष्य में समझ सकते हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि खुद श्रीमती गांधी ने ही अंततः हालात को समझा और मार्च 1977 में चुनाव कराने का फैसला किया। आप अच्छी तरह जानते हैं कि बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर खेद भी जताया और इसके लिए माफी भी मांगी।

सवाल: आपकी किताब के कुछ सबसे दिलचस्प और विचारोत्तेजक हिस्से RSS, BJP और संघ परिवार से जुड़े हैं। इनमें आपने भारतीय समाज और राजनीति के सामने मौजूद उन खतरों का जिक्र किया है, जो विशेष रूप से लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों के लिए चुनौती हैं।

क्या आपको लगता है कि कांग्रेस पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से और हाल के वर्षों में भी इन बुनियादी मुद्दों पर RSS के नेतृत्व वाली हिंदुत्ववादी ताकतों से खुद को स्पष्ट रूप से, लगातार और प्रभावी ढंग से अलग रखा है?

जवाब: बिल्कुल! मैं मानती हूं कि पार्टी के भीतर कुछ ऐसे लोग रहे हैं, जो महसूस करते थे कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर हमें इतना स्पष्ट और दो-टूक रुख नहीं अपनाना चाहिए। लेकिन यह पार्टी का आधिकारिक नजरिया नहीं है।

मुझे लगता है कि अपनी नीतियों और कार्यों के जरिए हम इस बात पर लगातार कायम रहे हैं कि देश के हर नागरिक को बिना किसी डर के अपने धर्म और आस्था को मानने तथा उसका पालन करने का संवैधानिक अधिकार है।

सवाल: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में आपने लिखा है कि आप और वह अलग-अलग वैचारिक दुनिया से आते हैं और भारत को लेकर आपकी सोच भी बहुत अलग है। हालांकि, आपने उनके भीतर सत्ताधारी अभिजात्य वर्ग (Ruling Elite) के प्रति कुछ असहजता को भी स्वीकार किया है।

किताब के एक अहम हिस्से में आपने दिल्ली के उन ड्रॉइंग रूम की चर्चा की है, जहां राजनीतिक विचार आपको भारत की वास्तविकता से बहुत दूर लगते थे। अपने निर्वाचन क्षेत्र और देश के दूसरे हिस्सों में आपने लोगों को जिस गरीबी, तकलीफ और जीवनयापन के संघर्ष से गुजरते देखा था, उसकी कल्पना भी इस विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लिए मुश्किल थी।

आप यह भी लिखती हैं कि मोदी की साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि को भले ही उनकी PR टीम ने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हो, लेकिन उन्होंने निश्चित रूप से एक वंचित पृष्ठभूमि से निकलकर RSS के भीतर अपनी राजनीतिक जगह बनाई और सत्ता तक पहुंचे।

कांग्रेस को इससे क्या राजनीतिक सबक लेना चाहिए?

जवाब: यह सच है कि मोदी बिल्कुल अलग वैचारिक दुनिया से आते हैं। लेकिन राजनीति में सफलता हासिल करने के कई रास्ते होते हैं। कांग्रेस पार्टी के भीतर ही उदाहरण के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को देख सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि हमें RSS से कुछ सीखने की जरूरत है।

सवाल: राजनीतिक दृष्टि से आपकी किताब का 30वां अध्याय शायद सबसे दिलचस्प है और व्यक्तिगत रूप से सबसे भावुक भी। इसमें 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत के बाद प्रधानमंत्री न बनने के आपके फैसले से जुड़ी नई बातें सामने आती हैं। उस समय लगभग सभी को उम्मीद थी कि आप प्रधानमंत्री बनेंगी।

लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले जब आपके एक बच्चे ने पूछा था कि अगर कांग्रेस जीत गई तो क्या आप प्रधानमंत्री पद स्वीकार करेंगी, तो आपने साफ कहा था- ‘बिल्कुल नहीं।’ राहुल और प्रियंका भी इसके सख्त खिलाफ थे। वे अपनी दादी और पिता की हत्या की घटनाओं से डरे हुए थे और मानते थे कि प्रधानमंत्री का पद बेहद खतरनाक है।

महत्व वाली किताब, जिससे भारत और विदेशों में बड़ी संख्या में पाठकों की उम्मीद है, उसके प्रकाशक का लॉन्च से कुछ महीने पहले बदल जाना असामान्य है।

अगस्त 2026 के आखिर में खबर आई कि पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया अब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ प्रकाशित नहीं करेगा। सितंबर की शुरुआत में हार्पर कॉलिन्स इंडिया ने 10 नवंबर को किताब प्रकाशित करने की घोषणा की।

इस बदलाव के बाद कई तरह की अटकलें लगाई गईं। एक अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया कि नरेंद्र मोदी, RSS, सांप्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों से जुड़े कुछ अंशों के साथ-साथ चीन के साथ भारत के टकराव, खासकर गलवान, को लेकर मतभेद थे।

पेंगुइन ने कहा था कि पांडुलिपि को लेकर असहमति के बाद आपकी टीम ने उसके साथ प्रकाशन आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया।

क्या यह जानकारी सही है? क्या यह किताब की सामग्री को लेकर मतभेद था या इसके पीछे लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े बड़े सवाल भी थे?

जवाब: मैं इन विवादों में खुद को शामिल करना पसंद नहीं करूंगी।

लेकिन जब पार्टी के नेता आपसे पद स्वीकार करने का आग्रह कर रहे थे, तो उस पूरे घटनाक्रम को आपने ‘अवास्तविक नाटक’ जैसा बताया है। आखिरकार आपने ‘ठीक है’ कहा, लेकिन बाद में अपना फैसला बदल लिया। इसके बाद डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।

क्या कभी आपके मन में यह सवाल आता है कि अगर आपने प्रधानमंत्री पद स्वीकार किया होता, तो UPA सरकार की नीतियां और कांग्रेस की रणनीति कितनी अलग होती? मैं यह इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि आपको डॉ. सिंह और कांग्रेस के दूसरे नेताओं की तुलना में अधिक समाजवादी लोकतांत्रिक सोच वाला नेता माना जाता है।

जवाब: नहीं, बिल्कुल नहीं। यह सवाल कभी मेरे मन में आया ही नहीं। हमारा अनुभव कुल मिलाकर काफी सकारात्मक रहा। हमने एक टीम के रूप में काम किया और हम दोनों की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से अलग-अलग थीं। वे सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और मैं पार्टी का नेतृत्व कर रही थी।

सवाल: किताब के उपसंहार (Epilogue) में आपने स्पष्ट किया है कि भारत आकर यहां अपने परिवार के साथ जीवन बिताने के फैसले को लेकर आपको निजी जिंदगी में कोई पछतावा नहीं है। आपने यह उम्मीद भी जताई है कि जब आप कांग्रेस में शामिल हुईं और पार्टी अध्यक्ष बनीं, तब आपको एहसास हुआ कि इंसान के भीतर ऐसी क्षमताओं का भंडार होता है, जिनके बारे में उसे खुद भी पता नहीं होता। जिंदगी जब ऐसी जिम्मेदारियां सौंपती है, जिनकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होती, तब ये क्षमताएं सामने आती हैं।

हालांकि, आपने लिखा है कि राजनीतिक समझौते करते समय आपको सबसे ज्यादा दुविधा हुई। आपने किताब में सवाल उठाया है- ‘अब मैं खुद से पूछती हूं कि क्या उन समझौतों से उनके मकसद भी पूरे हुए? हमेशा नहीं। कई बार वे पार्टी के लिए फायदेमंद दिखे, फिर भी मैं दिल से खुश नहीं हो सकी। आज भी वे समझौते मेरी अंतरात्मा पर बोझ बने हुए हैं।’

आखिर ये राजनीतिक समझौते कौन से थे? क्या आप इनके दो उदाहरण दे सकती हैं?

जवाब: हमें वास्तविकता को समझना होगा। राजनीति में कई बार समझौते करना अपरिहार्य हो जाता है। कुछ मौकों पर हमारे सामने कठिन राजनीतिक विकल्प थे, जहां हमें ऐसे लोगों के साथ हाथ मिलाना पड़ा, जिनकी राजनीतिक विचारधारा हमसे अलग थी।

यह फैसला मेरे मन को कभी सहज नहीं लगा। लेकिन एक बात को लेकर मैं पूरी तरह स्पष्ट हूं- हमने कभी BJP और RSS के साथ कोई समझौता नहीं किया और न ही भविष्य में कभी करेंगे।

सवाल: आपने पिछले एक दशक से अधिक समय में संसदीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में शालीनता और मर्यादा के खत्म होने पर दुख जताया है। आपने इसे ‘उस बेरहमी’ से जोड़ा है, जो तानाशाही शासन में देखने को मिलती है और जिसका इस्तेमाल असहमत लोगों को नीचा दिखाने और परेशान करने के लिए किया जाता है।

क्या आपको लगता है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में BJP के सत्ता से बाहर होने पर हालात बदलेंगे और राजनीति फिर से नीतियों और कार्यक्रमों पर आधारित प्रतिस्पर्धा की ओर लौटेगी?

जवाब: पिछले 12 वर्षों में हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने, लोकतंत्र और संस्थाओं को बहुत नुकसान पहुंचा है। इस सरकार के जाने के बाद भी हमारी व्यवस्थाओं को फिर से स्वस्थ स्थिति में लाने में समय लगेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को भी काफी प्रयास करने होंगे।

लोग अब बेचैन होने लगे हैं और उन्हें हो रहे नुकसान का एहसास भी हो रहा है। लेकिन मैं आशावादी हूं। मुझे विश्वास है कि भारत के लोग सुशासन की वापसी का स्वागत करेंगे।

सवाल: आपने पिछले एक दशक से अधिक समय में संसदीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में शालीनता और मर्यादा के खत्म होने पर दुख जताया है। आपने इसे ‘उस बेरहमी’ से जोड़ा है, जो तानाशाही शासन में देखने को मिलती है और जिसका इस्तेमाल असहमत लोगों को नीचा दिखाने और परेशान करने के लिए किया जाता है।

क्या आपको लगता है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में BJP के सत्ता से बाहर होने पर हालात बदलेंगे और राजनीति फिर से नीतियों और कार्यक्रमों पर आधारित प्रतिस्पर्धा की ओर लौटेगी?

जवाब: पिछले 12 वर्षों में हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने, लोकतंत्र और संस्थाओं को बहुत नुकसान पहुंचा है। इस सरकार के जाने के बाद भी हमारी व्यवस्थाओं को फिर से स्वस्थ स्थिति में लाने में समय लगेगा। इसके लिए राजनीतिक दलों को भी काफी प्रयास करने होंगे।

लोग अब बेचैन होने लगे हैं और उन्हें हो रहे नुकसान का एहसास भी हो रहा है। लेकिन मैं आशावादी हूं। मुझे विश्वास है कि भारत के लोग सुशासन की वापसी का स्वागत करेंगे।

सवाल: भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस का पतन अब राजनीतिक वास्तविकता है। पिछले तीन दशकों में कांग्रेस हिंदुत्ववादी ताकतों के बढ़ते प्रभाव को रोकने में संघर्ष करती रही है। 2004 से 2014 के बीच पार्टी की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ, लेकिन आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस गिरावट के इस रुझान को पलटने में सफल नहीं रही।

आपने अपनी किताब में कांग्रेस के बारे में विस्तार से लिखा है। पार्टी की मौजूदा स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को आप किस तरह देखती हैं?

जवाब: मैं इतनी निराशावादी नहीं हूं। यह देखना चाहिए कि मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को समान अवसर वाला राजनीतिक माहौल नहीं मिला है।

सभी संस्थाओं पर उनका पूरी तरह नियंत्रण है, खासकर चुनाव आयोग पर। मुख्यधारा की मीडिया पर उनका दबदबा है, उनके पास अपार आर्थिक संसाधन हैं और वे धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं।

इसके बावजूद हमारी पार्टी संघर्ष कर रही है और आगे बढ़ रही है। वास्तव में, इस हमले का सामना करने का धैर्य और क्षमता दिखाने वाली कांग्रेस एकमात्र पार्टी है।

हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं ने असाधारण साहस दिखाया है। उन्होंने हर तरह के उत्पीड़न का सामना किया है, फिर भी देश के हर गांव और हर जिले में कांग्रेस के कार्यकर्ता संविधान में निहित मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं।

इसके अलावा, हाल के महीनों में यह बात पर्याप्त रूप से सामने आई है कि कई चुनावों में धांधली हुई है और अब लोग भी इसके प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं।

कांग्रेस समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है और हमारी संभावनाएं दिन-ब-दिन बेहतर हो रही हैं।



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