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Sanatan Tradition in Maldives: जब भी कोई भारतीय मालदीव का प्लान बनाता है तो उसकी जेहन में लग्जरी रिसॉर्ट्स और खूबसूरत बीच ही होते हैं. लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि मालदीव के द्वीपों में हजार साल पुराना सनातन इतिहास छुपा हुआ है. यह देश पहले हिन्दू और बौद्धों का देश था लेकिन करीब साढ़े 800 साल पहले यहां से बौद्धों का रक्तपात किया गया और पूरा देश में इस्लामिक संस्कृति के आगोश में समा गया. जब भी आप मालदीव जाएं तो इन ऐतिहासिक चिन्हों को जरूर देखें.
मालदीव जाएं तो इस बार वहां की हिन्दू संस्कृति को जरूर खोजें.
Maldives Hindu and Buddhist History: मालद्वीप 1200 टापूओं का देश है. इनमें कुछ पर ही मानव का बसेरा है. अगर समंदर का जलस्तर थोड़ा सा भी ऊंचा उठा तो यह देश समंदर में ही समा जाएगा. यहां की आबादी महज 4 लाख है. 12 वीं सदी में यहां इस्लाम का फैलना शुरू हुआ था. 1965 में यह देश अंग्रेजों से आजाद हुआ. पिछले कुछ सालों को छोड़ दें तो मालदीव हमेशा से भारत की छत्रछाया में ही रहा है. वर्तमान में मालदीव इस्लामी संस्कृति का 900वां सालगिरह मना रहा है. ऐसा लग रहा है कि यहां सदियों से यहां इस्लाम की ही जड़ें थीं. पर वास्तव में ऐसा है नहीं. आप जिस देश में बीच वेकेशन और खूबसूरत रिजॉर्ट का आनंद लेने जाते हैं दरअसल, वहां सनातन और बौद्ध धर्म की गहरी जड़ें मौजूद हैं. मालदीव का इतिहास कभी भी भारतीय संस्कृति से अलहदा नहीं हो सकता है. सनानत संस्कृति अपने प्रारंभ से ही वहां मौजूद थी. यहां तक कि सिंधु घाटी सभ्यता से भी मालदीव का तार जुड़ा हुआ है. इस स्टोरी का उद्येश्य यह है कि जब भी आप मालदीव जाते हैं तो वहां के समंदर किनारे की खूबसूरती और रिजॉर्ट की लग्जरी में हो खोए रहते हैं, कभी ध्यान नहीं आता कि यह देश भी हिन्दू और बौद्धों का ही था. इसलिए आज आपको हम इसके बारे में सारी तथ्यात्मक जानकारी दे रहे हैं ताकि जब आप वहां जाए तो अपनी संस्कृति के चिन्हों का दीदार करें.
माला की तरह पिरोए द्वीप
पहले जानते हैं कि मालदीव का नाम कैसे पड़ा. मालदीव का नाम पूरी तरह से संस्कृत शब्द से आया है. हालांकि मालदीव का प्राचीन नाम महिलाद्वीप था. ऐसा कहा जाता है कि महिला शासिकाओं द्वारा संचालित देश के कारण इसे महिलाद्वीप कहा जाता था. कुछ ग्रंथों में इसका नाम मालाशिखर भी है. अरब यात्री बाद में इसे दिवि या दीबात नाम दिया लेकिन जब यहां पर तमिल और चोल शासकों का प्रभाव हुआ तो इसे माले द्वीप कहा जाने लगा. यह शब्द संस्कृत और तमिल में लगभग समान है जिसका अर्थ है माला की तरह पिरोया एक द्वीपों का समूह. आज भी जब आप इसका नक्शा देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि 1200 द्वीपों का यह समूह एक माला की तरह आकृति बनाता है. माला द्वीप अंततः मालदीव बन गया.
सिंधुघाटी सभ्यता का हिस्सा
यह एक निर्विवाद और ऐतिहासिक तथ्य है कि 12वीं शताब्दी में इस्लाम के आने से पहले मालदीव मुख्य रूप से बौद्ध धर्म और उससे पूर्व प्राचीन हिंदू धर्म और उससे पहले सिंधु घाटी सभ्यता का हिस्सा था. 17वीं सदी में अल्लामा अहमद शहाबुद्दीन ने अरबी में लिखी अपनी किताब ‘फी आथार मीधू अल-कादिमा’ में लिखा था कि मालदीव के सबसे पहले निवासी धेयविस थे, जो भारत के कालीबंगा से आए थे. कालीबंगा आज के राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित है. कालीबंगा से वे लोग कब आए, इसका समय अज्ञात है लेकिन यह सम्राट अशोक के शासनकाल यानी 269–232 ईसा पूर्व से पहले का है.
वैदिक संस्कृति का हिस्सा
सिंधु घाटी सभ्यता के बाद समस्त भारतीय उपमहाद्वीप में वैदिक संस्कृति का आगमन हुआ. कई पुरातात्विक उत्खननों और पुरालेखों में इसका जिक्र किया गया है कि श्रीलंका और पूरे भारत से लोगों का आगमन मालदीव में हुआ. इस तरह यहां पर सदियों तक हिन्दू संस्कृति फलता-फूलता रहा. ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से पहले मालदीव के शुरुआती निवासी भारत और श्रीलंका के तटीय क्षेत्रों से आए थे. वे सूर्य पूजा और वैदिक परंपराओं का पालन करते थे. थॉर हेयरडाहल को अपनी खोजों में कोरल पत्थरों पर उकेरे गए सूर्य चक्र, त्रिशूल और लिंगम जैसे प्राचीन हिंदू धार्मिक प्रतीक भी मिले थे. 11वीं शताब्दी में भारत के राजराजा चोल प्रथम ने मालदीव पर विजय प्राप्त की थी, जिससे इस क्षेत्र में दक्षिण भारतीय तमिल संस्कृति और हिंदू-बौद्ध प्रभाव और मजबूत हुआ था. मालदीव की राष्ट्रीय भाषा दीवेही की जड़ें प्राचीन पाली और प्राकृत व संस्कृत में हैं. इस भाषा की लिपि और व्याकरण श्रीलंका की प्राचीन एलू भाषा और भारत की ब्राह्मी लिपि से गहराई से प्रभावित है. मालदीव में द्वीपों, स्थानों, रिश्तों और दिशाओं के कई नाम आज भी संस्कृत व पाली मूल के हैं. जैसे-माले शब्द स्वयं ‘महा-लय’ या माला से प्रेरित माना जाता है.
बौद्ध धर्म पूरे द्वीप पर फैल गया
हिन्दू धर्म के बाद मालदीव के लगभग पूरे हिस्से पर बौद्ध धर्म का विस्तार हो गया. तीसरी शताब्दी के बाद से ही यहां बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या बढ़ने लगी. मालदीव के विभिन्न एटोल जैसे- लामा, फुवाहमुलाह और टोड्डू पर विशाल मिट्टी और कोरल पत्थर के टीले पाए गए हैं. ये जगहें बौद्ध घर्म के चैत्य और स्तूप हैं. इनके भग्नावशेष आज भी मौजूद हैं. स्थानीय भाषा में चैत्य को हवित्त और स्तूप को उसतुबु कहा जाता है. ब्रिटिश पुरातत्वविद एच. सी. पी. बेल और प्रसिद्ध नॉर्वेजियन अन्वेषक थॉर हेयरडाहल द्वारा 19वीं और 20वीं सदी में किए गए उत्खनन में बुद्ध की मूर्तियां, ध्यानी बुद्ध की नक्काशीदार प्रतिमाएं और कई बौद्ध मठों के अवशेष मिले थे. गान और काशिधू द्वीपों पर स्थित कुरुहिन तारागंडू स्थान 7वीं से 8वीं शताब्दी का एक विशाल बौद्ध मठ परिसर था जहां से बौद्ध प्रतीक चिन्ह मिले हैं. प्राचीन चीनी यात्री और रोम-फारस के नाविकों ने अपने यात्रा वृत्तांतों में इन द्वीपों को बौद्ध भिक्षुओं और महिला शासकों का देश बताया था. देश में किए गए कई उत्खननों में बौद्ध धर्म से संबंधित कई ताम्रपत्र मिले हैं जिनपर बौद्ध धर्म की व्यापकता का पता चलता है.
इस्लाम का आगमन
12वीं शताब्दी के अंत के ताम्रपत्रों में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि राजा धोवेमी ने बौद्ध धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार किया था. इसके बाद कई सालों तक इस्लामी धर्म कबूल कराने के लिए बौद्ध धर्मावलंबियों को असंख्य तरह से यातनाएं दी गई. ताम्र पत्रों के इन पट्टियों में यह भी उल्लेख है कि इस्लाम के आगमन के बाद बौद्ध स्तूपों को तोड़ा गया और कई बौद्ध भिक्षुओं को सजा दी गई या धर्म परिवर्तन कराया गया. आज मालदीव सौ फीसदी मुस्लिम देश है. यहां किसी भी गैर-मुसलमानों को नागरिकता नहीं मिल सकती है. मालदीव का राजकीय धर्म इस्लाम है. हालांकि विदेशी पर्यटकों को मालदीव आने पर इस्लामी के कई कानूनों से छूट प्राप्त है.
मालदीव की सैर. Photo: Instagrame
बौद्ध और हिन्दू संस्कृति मालदीव में कहां खोजें
- कुरुहिन तारागंडू : कुरुहिन तारागंडू में मालदीव का सबसे बड़ा संरक्षित बौद्ध मठ परिसर है. यह बौद्ध मठ 7वीं से 8वीं शताब्दी के बीच का है. यहां बुद्ध प्रतिमाओं के चबूतरे, स्तूपों के कोरल पत्थरों के आधार और ध्यान लगाने की जगहें देखी जा सकती हैं. यह स्थान माले से लगभग 86 किलोमीटर की दूरी पर है. कुरुहिन तारागंडू उत्तरी माले एटोल पर स्थित है. यहां पहुंचने के लिए आपको माले के सुलतान पार्क या एमटीसीसी फेरी टर्मिनल से बोट लेनी होगी. स्पीडबोट से 2 घंटे में आप वहां पहुंच जाएंगे लेकिन पैसेंजर फेरी से आपको वहां पहुंचने में 4 से पांच घंटे तक का समय लगेगा.
- इसधू हवित्त : लामा एटोल के इसधू द्वीप पर स्थित हवित्त (बौद्ध स्तूप का स्थानीय नाम) मालदीव के विशालकाय स्तूपों में से एक है. इसी द्वीप से प्रसिद्ध इसधू लोमाफानू ताम्रपत्र भी मिले थे. इसी ताम्रपत्र में लिखा है कि यहा के बौद्ध राजाओं ने 12वीं शताब्दी में इस्लाम अपनाया था. यह लामा एटोल माले से 240 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. माले से यहां जाने के लिए फ्लाइट भी है. यह फ्लाइट आपको कदधू हवाई अड्डे उतारेगी. वहां से स्पीडबोट से 20-30 मिनट में पहुंचा जा सकता है.
- लैंडहू हवित्त : नूनू एटोल ॉके लैंडहू द्वीप पर स्थित यह स्थान प्राचीन हिंदू-वैदिक काल और बौद्ध काल का एक बड़े स्तूप का अवशेष है. स्थानीय लोककथाओं के अनुसार यहां प्राचीन काल में सूर्य और प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करने वाले लोग निवास करते थे. माले से इसकी दूरी 170 से 200 किलोमीटर है. यहां जाने के लिए भी 45 मिनट का फ्लाइट लेना होगा. इसके बाद स्पीडबोट से आधे घंटे का सफर है.
- गान द्वीप के बौद्ध अवशेष : लामा एटोल का गान द्वीप मालदीव के सबसे बड़े आवासीय द्वीपों में से एक है. यहां एक विशाल बौद्ध स्तूप मुकिरी राशू हवित्त और कई बौद्ध विहारों के टीले मौजूद हैं. माले से इसकी दूरी लगभग 250 किलोमीटर है. यहां जाने के लिए माले से कदधू एयरपोर्ट तक डोमेस्टिक फ्लाइट लेना होगा. कदधू द्वीप से गान द्वीप एक लंबा सड़क पुल के ज़रिए जुड़ा हुआ है. इसलिए एयरपोर्ट से कार या टैक्सी लेकर 15 मिनट में सीधे पहुंच सकते हैं.
- मालदीव राष्ट्रीय संग्रहालय : अगर आप कहीं नहीं जाना चाहते हैं तो और सभी अवशेषों को एक जगह देखना चाहते हैं तो माले स्थिति राष्ट्रीय म्यूजियम सबसे मुफीद जगह है. यहां थॉर हेयरडाहल और एच.सी.पी. बेल द्वारा उत्खनन में मिली बुद्ध की पत्थर की प्रतिमाएं, नक्काशीदार कोरल स्तूप और शिव-विष्णु और वैदिक प्रतीकों वाले प्राचीन पत्थर सुरक्षित रखे गए हैं. माले में किसी भी स्थान से पैदल या केवल 5-10 मिनट की टैक्सियों के ज़रिए यहां पहुंचा जा सकता है.
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मीडिया में 20 साल से ज्यादा का अनुभव रखने वाले लक्ष्मी नारायण पत्रकारिता के हर विधा में माहिर हैं. भविष्य की आहट और ट्रेंड्स को समय से पहले भांपने की अद्भुत कला उनके अंदर समाहि…
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