सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक पूर्व जिला जज की जल्द सुनवाई की मांग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पद के आधार पर किसी को प्राथमिकता नहीं मिल सकती। संविधान हर व्यक्ति को समान रूप से न्याय तक पहुंच का अधिकार देता है। पूर्व जज राकेश कुमार नैन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेंडिंग रिट याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की थी। यह याचिका सेवा से बर्खास्तगी को चुनौती देने के लिए दायर की गई है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने उन्हें हाईकोर्ट में ही जल्दी सुनवाई की मांग रखने की छूट दी। भ्रष्टाचार के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था राकेश कुमार नैन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले विशेष जज थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने उन्हें न्यायिक कदाचार और भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी पाया था। इसके बाद नैन को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उन्होंने बर्खास्तगी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। यह याचिका अब भी लंबित है। सुनवाई में देरी से परेशान होकर नैन ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की। शुरुआत में बेंच ने उनकी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। साथ ही, उन्हें हाईकोर्ट में जल्दी सुनवाई के लिए मौजूदा आवेदन रखने की छूट दी। जस्टिस बागची ने कहा कि अगर देरी के बेहद गंभीर आरोप नहीं हैं, तो सिर्फ पूर्व न्यायिक अधिकारी होने के कारण याचिकाकर्ता के प्रति ‘गलत सहानुभूति’ नहीं दिखाई जा सकती। उन्होंने कहा, “हम इस तरह की याचिकाओं को पसंद नहीं करते। लंबे समय तक सुनवाई न होने पर गलत सहानुभूति दिखाने से उन लोगों के समान अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है, जो हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए कतार में हैं और जिनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई वकील नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को जल्दी सुनवाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपना आवेदन रखने की छूट दी जाती है। जस्टिस बागची ने आगे कहा कि मौजूदा बेंच ‘अवसरवादी दखल’ रोकने की पूरी कोशिश करेगी। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यह मामला किसी सामान्य याचिकाकर्ता का नहीं है। उनके मुताबिक, यह याचिका पूर्व न्यायिक अधिकारी ने दायर की है। इस पर जस्टिस बागची ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह दलील संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने कहा, “हर नागरिक को उसके पद या स्थिति की परवाह किए बिना न्याय तक पहुंच का अधिकार है। बस कंडक्टर और राज्य के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, दोनों को कानूनी निपटारे के लिए न्याय तक समान पहुंच का अधिकार है।” जस्टिस बागची ने कहा कि संवैधानिक समानता के इस क्षेत्र में कोर्ट व्यक्तिगत आधार पर किसी के लिए अलग हस्तक्षेप नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि जल्दी सुनवाई से जुड़े हर आवेदन पर कोर्ट तभी दखल देगा, जब उसे हाईकोर्ट की ओर से ऐसा बेहद गंभीर उल्लंघन दिखे, जो अनुचित या बेईमानीपूर्ण हो।
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हमारा काम बस कंडक्टर, प्रिंसिपल सेक्रेटरी को बराबर न्याय मिले: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जिला जज की जल्द सुनवाई की मांग ठुकराई
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