Homeटेक्नोलॉजी40 साल बाद बोफोर्स केस बंद: सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका...

40 साल बाद बोफोर्स केस बंद: सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका खारिज की, घोटाले के आरोप से राजीव गांधी 1989 का चुनाव हारे थे


नई दिल्ली3 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

1986 में भारत ने स्वीडिश कंपनी AB बोफोर्स से 400 होवित्जर तोपों का सौदा किया था।

करीब 40 साल पुराने बोफोर्स घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आखिरी याचिका भी खारिज कर दी। इसके साथ ही अब यह मामला पूरी तरह खत्म हो गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि अब इस केस में आगे सुनवाई की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपील भी सुनने से मना कर दिया, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को बरी कर दिया गया था।

यह मामला 1986 की उस डील से जुड़ा है, जिसमें भारत ने स्वीडन की कंपनी बोफोर्स से 1,437 करोड़ रुपए की तोपें खरीदी थीं। बाद में आरोप लगे कि इस सौदे में कमीशन दिया गया था। घोटाले के आरोप से राजीव गांधी 1989 का चुनाव हार गए थे।

quote image 20 1786076508688

क्या था बोफोर्स घोटाला

यह मामला 1986 में भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुई 1,437 करोड़ रुपए की तोप खरीद डील से जुड़ा है।

1987 में खुलासा हुआ कि इस सौदे को हासिल करने के लिए कथित तौर पर कमीशन (रिश्वत) दिया गया। इसके बाद यह मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक घोटालों में शामिल हो गया।

dainik bhaskar pointer 5 1786074179081

केस क्यों कमजोर पड़ा

बोफोर्स केस लंबे समय तक चर्चा में रहा, लेकिन अदालत में यह टिक नहीं सका। इसकी सबसे बड़ी वजह जांच और सबूतों से जुड़ी खामियां रहीं।

ठोस सबूत पेश नहीं हो सके: दिल्ली हाईकोर्ट ने 2005 के फैसले में कहा कि CBI आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सबूत नहीं दे सकी। आरोप तो लगाए गए, लेकिन उन्हें सीधे तौर पर किसी आरोपी से जोड़ने वाली कड़ी नहीं मिल पाई।

विदेशी दस्तावेज प्रमाणित नहीं थे: जांच में CBI को स्वीडन से जो कागज मिले, वे असली नहीं थे और ठीक से सत्यापित भी नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कागजों के आधार पर किसी को आरोपी बनाना सही नहीं है और इससे न्याय प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होता है।

आरोप और पैसों के बीच लिंक साबित नहीं हुआ: कमीशन का आरोप था, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि जो पैसा मिला, वह सीधे तौर पर इस डील से जुड़ा था या किसी आरोपी तक पहुंचा।

देरी से केस कमजोर हुआ: जांच और कानूनी प्रक्रिया में सालों की देरी हुई। इससे न सिर्फ सबूत कमजोर पड़े, बल्कि कई अहम गवाह और आरोपी भी समय के साथ उपलब्ध नहीं रहे। इससे केस की विश्वसनीयता पर असर पड़ा।

केस बंद होने से पहले CBI की आखिरी कोशिश

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले तक भी CBI इस मामले में कुछ नई जानकारी ढूंढने में लगी हुई थी। एजेंसी ने अमेरिका के माइकल हर्शमैन से जुड़ी जानकारी पाने की कोशिश की। हर्शमैन ने 2017 में कहा था कि बोफोर्स डील की जांच को उस समय की सरकार ने प्रभावित किया था और वो खुद इस मामले में मदद करना चाहते थे।

लेकिन जब CBI ने उनसे जुड़े कागज और रिकॉर्ड मांगे, तो कुछ खास हाथ नहीं लगा। एजेंसी ने इंटरपोल और अमेरिका के अधिकारियों को कई बार चिट्ठियां भी भेजीं, पर वहां से भी कोई ठोस जवाब नहीं मिला। आखिर में CBI को 2025 में कोर्ट के जरिए ‘लेटर रोगेटरी’ भेजकर अमेरिका से मदद मांगनी पड़ी। कोर्ट ने भी माना था कि हर्शमैन के दावों की सच्चाई जानने के लिए विदेश में जांच जरूरी है।

CBI पर भी उठे सवाल

इस मामले में जांच एजेंसी CBI की भूमिका भी सवालों में रही।

  • जांच में खर्च ज्यादा, नतीजा कम: इस केस की जांच पर करीब 250 करोड़ रुपए खर्च हुए, लेकिन इतने पैसे खर्च करने के बाद भी CBI मजबूत सबूत नहीं जुटा पाई।
  • अपील करने में बहुत देरी: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कहा था कि CBI ने अपील करने में करीब 12 साल (4522 दिन) की देरी की। इतनी लंबी देरी का कोई ठोस कारण भी नहीं बताया गया।
  • जांच के तरीके पर सवाल: हाईकोर्ट ने कहा था कि अधूरे और बिना पक्के कागजों के आधार पर केस चलाना सही नहीं है। इससे समय भी बर्बाद होता है और आरोपियों के साथ भी अन्याय होता है।
  • आरोप साबित नहीं कर पाई: अदालत का मानना था कि CBI अपने आरोपों को सही तरीके से साबित नहीं कर सकी, इसलिए केस धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया।

बोफोर्स कांड की वजह से इस्तीफा देना पड़ा, कांग्रेस सरकार चली गई

81710761272 1741157883

राजीव गांधी की अगुआई में 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 404 सीटें जीतीं थीं। उन्होंने 5 साल 32 दिन प्रधानमंत्री के रूप में काम किया था।

वरिष्ठ पत्रकार देबाशीष मुखर्जी अपनी किताब ‘द डिसरप्टर: हाउ वीपी सिंह शूक इंडिया’ में लिखते हैं कि बोफोर्स डील में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इसी के चलते राजीव सरकार में रक्षा मंत्री रहे वीपी सिंह ने 12 अप्रैल 1987 को इस्तीफा दे दिया।

इस्तीफे के चार दिन बाद 16 अप्रैल 1987 को स्वीडन के रेडियो में खबर चली कि भारत के साथ हुए रक्षा सौदे में घूसखोरी हुई है। स्वीडन की मीडिया ने दावा किया कि डील के लिए एबी बोफोर्स कंपनी ने भारत सरकार के बड़े नेताओं और रक्षा विभाग के अधिकारी को 60 करोड़ की घूस दी है।

मीडिया की खबरों के अनुसार राजीव गांधी परिवार के नजदीकी इटली के एक बिजनेसमैन ओत्तावियो क्वात्रोची ने इस मामले में बिचौलिये का रोल निभाया था। उन्होंने दलाली की रकम नेताओं तक भिजवाई थी। आरोप प्रत्यारोप के बीच 1989 के चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस पार्टी की हार हुई।​​​​​​

कारगिल युद्ध में बोफोर्स की अहम भूमिका रही

कारगिल युद्ध (1999) में बोफोर्स तोप ने भारतीय सेना को बड़ी बढ़त दिलाई। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में छिपे पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक और लगातार हमले किए गए।

इसकी लंबी रैंज और ऊंचाई से फायर करने की क्षमता ने दुश्मन की सप्लाई लाइन तोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

2e416dab ee9a 4b30 9921 e54b9fc140b7 1786075882419

—————————

ये खबर भी पढ़ें….

कोयला घोटाला में पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर केस बंद:सुप्रीम कोर्ट ने CBI क्लोजर को मंजूरी दी; कहा- क्लीन चिट के बाद फिर जांच शुरू हुई थी

cover 1785332258879

सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में चल रहा क्रिमिनल केस बंद कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल बाद सीबीआई की 2014 की 2 क्लोजर रिपोर्ट को मंजूरी दे दी। कोर्ट ने कहा कि पूर्व पीएक के खिलाफ करप्शन के कोई ठोस सबूत नहीं हैं। पूरी खबर पढ़ें…



Source link

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img

Most Popular

Recent Comments