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4000 साल पुरानी छपाई की कला, जो सरहद पार कर राजस्थान के रेगिस्तान तक पहुंची


Ajrakh Block Printing Barmer: राजस्थान का नाम आते ही किले, महल, रेगिस्तान और रंग-बिरंगे कपड़े आंखों के सामने आ जाते हैं, लेकिन यहां की पहचान सिर्फ इन चीजों तक सीमित नहीं है. राजस्थान के बाडमेर में आज भी कपडे पर छपाई की एक ऐसी पारंपरिक कला को जिंदा रखा गया है, जिसकी जडें हजारों साल पुरानी बताई जाती हैं. इसे अजरख ब्लाक प्रिंटिंग के नाम से जाना जाता है. लकडी के नक्काशीदार ब्लाक, प्राकृतिक रंगों से जुडी पुरानी परंपराएं और कपडे पर बेहद बारीकी से तैयार किए जाने वाले डिजाइन इस कला को खास बनाते हैं. राजस्थान पर्यटन की ओर से साझा जानकारी के मुताबिक, अजरख से जुडी यह कला सिंध और कच्छ से होते हुए राजस्थान के बाडमेर तक पहुंची.

भारत के बंटवारे के दौरान कई खत्री परिवार सिंध से बाडमेर आए और अपने साथ कपडे की छपाई का हुनर, औजार और पीढियों से चली आ रही जानकारी भी लेकर आए. समय के साथ बाडमेर के कारीगरों ने इस कला को स्थानीय रंगों और अंदाज के साथ आगे बढाया. आज यहां बनने वाला अजरख सिर्फ एक खूबसूरत कपडा नहीं, बल्कि इतिहास, पलायन, कारीगरी और कई पीढियों से बचाकर रखी गई एक विरासत की कहानी भी सुनाता है.

हजारों साल पुरानी मानी जाती हैं अजरख की जडें
अजरख को दुनिया की पुरानी कपडा छपाई परंपराओं में गिना जाता है. राजस्थान पर्यटन की पोस्ट में इसे करीब 4000 साल पुरानी प्रिंटिंग कला बताया गया है. पोस्ट में यह भी दावा किया गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता से मिले कपडे के कुछ अवशेषों पर मौजूद ब्लाक प्रिंट जैसे पैटर्न आधुनिक अजरख डिजाइन से मिलते-जुलते हैं. हालांकि, प्राचीन इतिहास से जुडे ऐसे दावों को सीधे यह प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए कि आज इस्तेमाल होने वाली पूरी अजरख तकनीक ठीक उसी रूप में 4000 साल पहले भी मौजूद थी. इतना जरूर है कि भारतीय उपमहाद्वीप में कपडा बनाने, रंगने और सजाने की परंपरा बेहद पुरानी रही है और अजरख इसी समृद्ध विरासत से जुडी एक खास कला है.

खत्री समुदाय ने पीढियों तक संभालकर रखा हुनर
अजरख की कहानी में खत्री समुदाय की अहम भूमिका मानी जाती है. कपडे की छपाई और रंगाई से जुडे खत्री कारीगरों ने पीढी दर पीढी इस हुनर को आगे बढाया. राजस्थान पर्यटन की जानकारी के मुताबिक, यह कला सिंध से कच्छ और फिर राजस्थान के बाडमेर तक पहुंची. कारीगर केवल तैयार कपडा लेकर एक जगह से दूसरी जगह नहीं गए, बल्कि अपने साथ लकडी के ब्लाक, रंगाई और छपाई के तरीके और वर्षों में हासिल किया गया अनुभव भी लेकर गए. यही वजह है कि जगह बदलने के बावजूद यह पारंपरिक कला खत्म नहीं हुई और नई जमीन पर भी अपनी पहचान बनाने लगी.

(इमेज AI)
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बंटवारे के बाद बाडमेर बना नया घर
साल 1947 में भारत के बंटवारे ने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी. राजस्थान पर्यटन की पोस्ट में बताया गया है कि इस दौरान कई खत्री परिवार सिंध से निकलकर राजस्थान के बाडमेर में आकर बस गए. उनके साथ अजरख की कला भी सरहद पार करके यहां पहुंची. नए माहौल में जीवन दोबारा शुरू करना आसान नहीं रहा होगा, लेकिन कारीगरों ने अपने पारंपरिक हुनर को नहीं छोडा. बाडमेर की रेगिस्तानी जमीन पर अजरख को नया घर मिला और धीरे-धीरे इस कला ने स्थानीय पहचान भी बनानी शुरू कर दी. आज बाडमेर के अजरख को देखते हुए सिर्फ डिजाइन नहीं, बल्कि पीढियों के इस सफर की कहानी भी समझी जा सकती है.

बाडमेरी अजरख में जुडे स्थानीय रंग
बाडमेर पहुंचने के बाद अजरख का मूल अंदाज बरकरार रहा, लेकिन स्थानीय कारीगरों ने इसमें अपने इलाके की पसंद और रंग भी शामिल किए. पारंपरिक अजरख में नीला और काला जैसे गहरे रंग प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं. बाडमेर के कारीगरों ने इसके साथ ज्यादा चमकीले लाल, पीले और हरे रंगों का इस्तेमाल भी किया. यही बदलाव बाडमेरी अजरख को अपना अलग अंदाज देता है. अलग-अलग ज्यामितीय आकार, फूलों जैसे डिजाइन और बारीक दोहराव वाले पैटर्न कपडे को दूर से ही पहचानने लायक बना देते हैं. एक ही कपडे पर रंगों और डिजाइन का संतुलन तैयार करने के पीछे कारीगर की लंबी मेहनत होती है.

एक कपडा तैयार करने में लगते हैं कई चरण
अजरख की खूबसूरती सिर्फ उसके अंतिम डिजाइन में नहीं, बल्कि उसे बनाने की लंबी प्रक्रिया में भी छिपी है. राजस्थान पर्यटन की पोस्ट के मुताबिक, अजरख का एक कपडा तैयार करने में धुलाई, छपाई, रंगाई और सुखाने जैसे करीब 16 से 23 अलग-अलग चरण शामिल हो सकते हैं. हर चरण के बाद कपडे पर अगला काम किया जाता है. इसका मतलब है कि एक डिजाइन तैयार करना केवल लकडी का ब्लाक रंग में डुबोकर कपडे पर लगाने जितना आसान नहीं है. सही जगह पर सही पैटर्न बैठाना, रंगों को संभालना और अगले चरण के लिए कपडे को तैयार करना बेहद सावधानी का काम है.

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