रवि प्रकाश पिछले हफ्ते बेहद उत्साहित थे। उन्होंने मेट्रो में सफर करते हुए पांच मिनट में मोबाइल एप से अपने लिए हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदी थी। उन्हें लगा कि उन्होंने तकनीक का सही इस्तेमाल किया, बिना किसी एजेंट के सबसे सस्ता प्लान खरीदा। लेकिन यह खुशी कुछ ही घंटों में फुर्र हो गई।
जब रवि प्रकाश ने पॉलिसी के दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ा तो पता चला कि जो प्रीमियम उन्हें सस्ता लग रहा था, उसमें तीन ऐसे राइडर्स पहले से जुड़े थे, जिनकी उन्हें जरूरत ही नहीं थी। यही नहीं, क्लेम के समय अस्पताल के बिल पर ‘सब-लिमिट’ की एक ऐसी बारीक शर्त छिपी थी, जो मुसीबत के समय उनकी जेब खाली कर देती। रवि प्रकाश डिजिटल सुविधा के उस जाल में फंस गए थे, जिसे हम ‘डार्क पैटर्न्स’ के नाम से जानते हैं।
लोकल सर्कल्स के ताजा सर्वे के मुताबिक, ऑनलाइन इंश्योरेंस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले 80% से अधिक लोग किसी न किसी रूप में डार्क पैटर्न्स यानी डिजिटल धोखाधड़ी का शिकार हो रहे हैं।
क्या है डार्क पैटर्न का खेल?
कंपनियां अब आपको बीमा बेच नहीं रही हैं, बल्कि चतुराई से आपको गलत फैसले लेने के लिए मजबूर कर रही हैं। सर्वे के मुताबिक 80% यूजर्स मानते हैं कि ऑनलाइन पॉलिसी खरीदना तो आसान है, लेकिन उसे कैंसिल करना या ऑटो-रिन्यूअल रोकना बहुत मुश्किल। 90% लोगों की शिकायत है कि कोटेशन लेने या पॉलिसी छोड़ने की कोशिश करने पर उन्हें लगातार कॉल, एसएमएस और ईमेल के जरिये परेशान किया गया। यूजर्स को सिर्फ एक कोटेशन देखने के लिए अपनी निजी जानकारी देने पर मजबूर किया जाता है, जिसका इस्तेमाल बाद में मार्केटिंग कॉल्स के लिए किया जाता है।
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जाल से कैसे बचें?
जल्दबाजी न करें: ‘ऑफर खत्म हो रहा है’ या ‘अंतिम एक पॉलिसी बची है’ जैसे टाइमर फर्जी होते हैं। बीमा कोई फ्लैश सेल का सामान नहीं है। शांति से फैसला लें।
प्री-टिक्ड बॉक्स देखें: अक्सर चेकआउट के समय बीमा कंपनियां छोटे-छोटे राइडर्स (जैसे एक्सीडेंटल कवर) को पहले से टिक कर देती हैं, उन्हें अन-टिक करें।
एक्सक्लूजंस पर गौर करें: पॉलिसी क्या देती है, उससे ज्यादा यह देखें कि वह क्या नहीं देती। वेटिंग पीरियड और क्लेम की शर्तों को कम से कम तीन बार पढ़ें।
रिकमेंडेड का मतलब बेस्ट नहीं: प्लेटफॉर्म जिसे ‘सबसे लोकप्रिय’ या ‘हमारा सुझाव’ कहते हैं, वह अक्सर उनके कमीशन के आधार पर तय होता है।
फ्री-लुक पीरियड का इस्तेमाल: याद रखें, आपके पास पॉलिसी मिलने के बाद 30 दिन का समय होता है, उसे कैंसिल करने के लिए।
शिकायत करें: अगर कोई प्लेटफॉर्म कैंसिल करना मुश्किल बना रहा है, तो सीधे IRDAI बीमा रक्षक पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।
ये हैं प्रमुख ‘डार्क पैटर्न्स’
| पैटर्न का नाम | क्या है तरीका? | ग्राहक पर असर |
|---|---|---|
| प्री-सिलेक्टेड एड-ऑन्स | मुख्य पॉलिसी के साथ एक्सीडेंटल कवर या गंभीर बीमारी जैसे विकल्प पहले से ही ‘टिक’ होते हैं। | न चाहते हुए भी प्रीमियम की राशि काफी बढ़ जाती है। |
| नकली जल्दबाजी | स्क्रीन पर काउंटडाउन टाइमर या “ऑफर खत्म होने वाला है” जैसे संदेश दिखाना। | ग्राहक बिना सोचे-समझे दबाव में गलत फैसला ले लेता है। |
| एंकर प्राइसिंग | एक बहुत बड़ी ‘मूल कीमत’ को काटकर उसके सामने ‘डिस्काउंट’ वाली कीमत दिखाना। | बचत का भ्रम होता है, जबकि असल में प्लान महंगा होता है। |
| छिपी हुई शर्तें | वेटिंग पीरियड और क्लेम की पाबंदियों को लंबे दस्तावेजों के बीच बारीक अक्षरों में छिपाना। | क्लेम के समय पता चलता है कि बीमारी कवर ही नहीं थी। |
| जटिल ऑप्ट-आउट | एड-ऑन्स जोड़ना आसान, लेकिन उन्हें हटाना या कैंसिल करना बहुत मुश्किल। | ग्राहक प्रक्रिया से थककर गैरजरूरी सुविधा भी जारी रखता है। |
| भ्रामक सिफारिशें | किसी प्लान को “सर्वश्रेष्ठ” या “अनुशंसित” का टैग देना। | ग्राहक जरूरत के बजाय अन्य प्लान चुनता है। |
| कंफर्मशेमिंग | विकल्प मना करने पर “नहीं, मुझे परिवार की सुरक्षा नहीं चाहिए” जैसी भाषा का इस्तेमाल। | ग्राहक अपराध बोध में आकर न चाहते हुए भी ‘हां’ कर देता है। |
इंसानी सूझबूझ बनाम एल्गोरिदम
- याद रखिए, एल्गोरिदम का काम बिक्री बढ़ाना है, आपके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं। एक गलत एल्गोरिदम आपका प्रीमियम तो बचा सकता है, लेकिन क्लेम के वक्त वह आपके परिवार के साथ खड़ा नहीं होगा।
- डिजिटल इंडिया में तकनीक का इस्तेमाल तुलना के लिए जरूर करें, लेकिन अंतिम फैसला लेने से पहले एक ‘इन्सानी नजरिये की सलाह जरूर लें। क्योंकि जब क्लेम का समय आता है, तब आप किसी वेबसाइट से बात नहीं करते, बल्कि एक इन्सान का साथ ढूंढते हैं।



