नैनीताल: उत्तराखंड की हरी-भरी वादियों में बसा नैनीताल आज देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शुमार है. हर साल लाखों पर्यटक यहां की ठंडी जलवायु, झीलों की खूबसूरती और शांत वातावरण का आनंद लेने पहुंचते हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब यह शहर एक गुमनाम और शांत पहाड़ी इलाका हुआ करता था. इसकी पहचान सीमित थी और यहां का जीवन बेहद साधारण था.
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि नैनीताल का वास्तविक विकास 19वीं सदी में शुरू हुआ. नैनीताल निवासी प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत के अनुसार, साल 1841 वह दौर था, जब इस क्षेत्र का नगरीकरण प्रारंभ हुआ और यहीं से पर्यटन की नींव भी रखी गई. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेज अधिकारी भीषण गर्मी से बचने के लिए पहाड़ों का रुख करते थे और इसी तलाश में नैनीताल उनकी पसंदीदा जगह बन गया.
ल्यूसिंगटन का खास योगदान
प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर नैनी झील ने इस शहर को खास पहचान दिलाई. चारों ओर फैली हरियाली, ठंडी हवाएं और शांत वातावरण ने इसे एक आदर्श हिल स्टेशन बना दिया. अंग्रेजों ने यहां सड़कों, चर्चों, स्कूलों और अन्य बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विकास किया, जिससे यह इलाका धीरे-धीरे एक व्यवस्थित शहर में बदलने लगा.
प्रोफेसर रावत बताते हैं कि इस विकास में तत्कालीन कमिश्नर जॉर्ज थॉमस ल्यूसिंगटन का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है, जिन्होंने 1838 से 1848 के बीच इस क्षेत्र के प्रशासन और विकास को नई दिशा दी. बाद में हेनरी रैमसे के कार्यकाल में भी नैनीताल का महत्व लगातार बढ़ता गया. साल 1862 में इसे नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज और अवध की समर कैपिटल घोषित किया गया, जिससे शहर की रौनक और बढ़ गई. उस समय सचिवालय का काम छह महीने लखनऊ और छह महीने नैनीताल से संचालित होता था.
मैरी जिम कॉर्बेट ने की पर्यटन की शुरुआत
सरकारी गतिविधियों के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी नैनीताल तेजी से उभरा. यहां कई प्रतिष्ठित स्कूलों की स्थापना हुई, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र पढ़ने आने लगे. बच्चों के साथ उनके अभिभावकों का आना-जाना बढ़ा, जिससे पर्यटन को भी मजबूती मिली. इसी वजह से नैनीताल को एक प्रमुख एजुकेशनल हब के रूप में भी पहचान मिलने लगी. प्रोफेसर रावत बताते हैं कि नैनीताल के पर्यटन को नई दिशा देने में मैरी जिम कॉर्बेट की भूमिका भी अहम रही.
पर्यटनों के ठहरने की शुरू हुई सुविधा
उन्होंने यहां कई बंगले किराए पर लेकर आने वाले अंग्रेज पर्यटकों को ठहरने की सुविधा दी. यह व्यवस्था उस समय के पर्यटन उद्योग के लिए एक बड़ा कदम साबित हुई और लोगों को लंबे समय तक यहां रुकने का अवसर मिला. इसके अलावा, शहर में खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों ने भी पर्यटन को बढ़ावा दिया. नैनीताल में उस दौर में पोलो, हॉकी और फुटबॉल जैसे खेलों की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं, जिनमें देशभर से खिलाड़ी भाग लेने आते थे.
फेमस नाटकों का हुआ मंचन
साथ ही, शारदा संघ की ओर से आयोजित ऑल इंडिया ड्रामा प्रतियोगिताएं भी काफी लोकप्रिय थीं. इन आयोजनों में ‘अंधा युग’ और ‘पोस्ट ग्रेजुएट’ जैसे नाटकों का मंचन किया जाता था, जिसने सांस्कृतिक रूप से भी नैनीताल को समृद्ध बनाया. धीरे-धीरे यह शहर सिर्फ अंग्रेजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय पर्यटकों के बीच भी इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी. खासतौर पर बंगाली पर्यटकों का यहां आना-जाना काफी अधिक था, जो आज भी देखने को मिलता है.
आज का नैनीताल अपने ऐतिहासिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता के कारण एक विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल बन चुका है. कभी गुमनाम रहा यह शहर अब लाखों लोगों की पहली पसंद है. यहां अब हर मौसम और साल के हर महीने में काफी पर्यटक पहुंचते हैं, जिससे यह शहर पर्यटकों से गुलजार रहते हैं.



