भारत को ‘विकसित भारत’ बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश के बैंकिंग क्षेत्र और कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में व्यापक संस्थागत सुधारों की रूपरेखा तैयार की जा रही है। वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) के सचिव एम. नागराजू ने शुक्रवार को एक ग्रोथ कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बैलेंस शीट से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए जल्द ही एक उच्च स्तरीय समिति काम शुरू करेगी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य प्रणाली को अधिक समावेशी बनाना और छोटे कारोबारियों से लेकर किसानों तक सस्ते कर्ज की पहुंच सुनिश्चित करना है।
बैंकिंग समिति का दायरा और प्रमुख उद्देश्य
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2026 के अपने बजट भाषण में ‘विकसित भारत के लिए बैंकिंग पर उच्च स्तरीय समिति’ के गठन का प्रस्ताव रखा था। नागराजू के अनुसार, सरकार जल्द ही इस पैनल के लिए ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ (शर्तें और अधिकार क्षेत्र) की घोषणा करेगी। इस समिति का मुख्य कार्य बैंकिंग क्षेत्र की समग्र समीक्षा करना है। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि बैंकिंग प्रणाली भारत की विकास जरूरतों के अनुरूप हो, लेकिन इसके साथ ही वित्तीय स्थिरता, वित्तीय समावेशन और उपभोक्ता संरक्षण के बुनियादी ढांचे से कोई समझौता न हो। समिति का फोकस इस बात पर भी रहेगा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपनी पूंजी का अधिक इष्टतम उपयोग कैसे कर सकते हैं।
कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार: मिडिल टियर का संकट
केवल बैंकिंग सुधार ही पर्याप्त नहीं हैं; देश के कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार को गहरा और अधिक सुलभ बनाना भी सरकार के अहम एजेंडे में शामिल है। नागराजू ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि भारत में जारी होने वाले 90-95 प्रतिशत बॉन्ड ‘AA’ या उससे ऊपर की उच्च रेटिंग वाली कंपनियों के होते हैं।
- अमेरिकी बाजार से तुलना: अमेरिका में बॉन्ड बाजार का एक बड़ा हिस्सा ‘A’ और ‘BBB’ रेटिंग वाली कंपनियों का है, जबकि भारत में यह ‘मिडिल टियर’ लगभग अस्तित्वहीन है।
- फंडिंग की समस्या: शीर्ष रेटिंग न होने के कारण कई छोटी व मध्यम कंपनियों को लंबी अवधि के लिए पूंजी जुटाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
- क्या है समाधान: दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ सेकेंडरी मार्केट में तरलता में सुधार और लेन-देन की बाधाओं को कम करने की आवश्यकता है।
अंतिम छोर तक सस्ती पूंजी और कड़े नियम
वित्तीय प्रणाली की सफलता केवल पूंजी की प्रचुरता में नहीं, बल्कि इसकी सामर्थ्य में निहित है। सचिव ने स्पष्ट किया कि जब कर्ज की लागत परियोजनाओं के अंतर्निहित जोखिम से अधिक होती है, तो कई व्यवहार्य परियोजनाएं शुरू ही नहीं हो पाती हैं। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा पहली पीढ़ी के उद्यमियों, छोटे व्यवसायों और ग्रामीण कर्जदारों को उठाना पड़ता है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि फसल वित्त के लिए किसानों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए किफायती दर पर पूंजी उपलब्ध हो।
इसके साथ ही, बाजार में किसी भी तरह की विसंगति से बचने के लिए उन्होंने कड़े नियमों की वकालत की। सहकारी बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र की पिछली गड़बड़ियों का हवाला देते हुए नागराजू ने कहा कि वित्तीय बाजारों को “कम विनियमन नहीं, बल्कि बेहतर और डिजाइन किए गए विनियमन” की आवश्यकता है।
भारत की आर्थिक वृद्धि के अगले चरण के लिए केवल मजबूत बैंक ही नहीं, बल्कि बॉन्ड, मुद्रा और डेरिवेटिव बाजारों के बीच एक प्रभावी तालमेल की आवश्यकता है। राजकोषीय प्रबंधन की गुणवत्ता, मौद्रिक स्थिरता और निवेशकों का विश्वास ही अंततः पूंजी की लागत तय करेंगे। मौजूदा चर्चाओं से साफ है कि ‘विकसित भारत’ के विजन को एक पारदर्शी, सुलभ और सशक्त वित्तीय ढांचे के माध्यम से साकार करने की दिशा में तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।



