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Jaipur Suicide Case Mother Son: जयपुर के शिकारपुरा अंडरपास के पास एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जहां ससुराल की कथित मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से परेशान एक महिला ने अपने 8 साल के बेटे के साथ ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी. मृतका की पहचान टोंक जिले की रामकन्या के रूप में हुई है. बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और पति की नशे की लत से परेशान थी. घटना से एक दिन पहले उसने अपने भाई को फोन कर कहा था कि वह अब और सहन नहीं कर सकती. महिला शनिवार से लापता थी और सोमवार को उसका शव मिला. इस दर्दनाक घटना ने घरेलू हिंसा और मानसिक तनाव जैसे गंभीर मुद्दों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं.
बेटे को सीने से लगाकर ट्रेन के आगे कूदी मां (सांकेतिक फोटो)
जयपुर: जयपुर के शिकारपुरा अंडरपास के पास हुई यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस दर्द की कहानी है जो धीरे-धीरे एक मां को अंदक से तोड़ता गया है. रामकन्या, जो कभी अपने बेटे के लिए जी रही थी, आखिरकार उसी बेटे को सीने से लगाकर मौत की राह पर चल पड़ी. तेज रफ्तार ट्रेन के आगे छलांग लगाते समय शायद उसके मन में आखिरी ख्याल भी अपने बच्चे की सुरक्षा का ही रहा होगा, लेकिन उस एक पल में उसका सब कुछ खत्म हो गया.
रविवार शाम को रामकन्या ने अपने भाई को फोन किया था. आवाज में दर्द था, थकान थी और एक टूटन भी “अब और नहीं सह सकती…”. यह सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि एक ऐसी पुकार थी, जिसे शायद सही समय पर कोई समझा नहीं जा सका. परिवार को अंदाजा नहीं था कि यह बातचीत उनकी आखिरी बात होगी. अगले ही सुबह जब पटरियों पर मां-बेटे के शव मिले, तो हर कोई सन्न रह गया. किसी को यकीन नहीं हो रहा था.
15 साल का रिश्ता, जब बन गया बोझ
लगभग 15 साल पहले रामकन्या की शादी रामदयाल बैरवा से हुई थी. समय के साथ यह रिश्ता सहारे की बजाय बोझ बनता चला गया. पति की नशे की लत ने घर का माहौल पूरा बिगाड़ दिया था. आए दिन झगड़े, मारपीट और मानसिक उत्पीड़न ने रामकन्या को अंदर तक तोड़ दिया था. ससुराल पक्ष पर भी लगातार प्रताड़ना के आरोप लगे हैं. दहेज और घरेलू विवादों ने उसकी जिंदगी को एक अंतहीन संघर्ष बना दिया था.
मां की ममता हालातों के आगे हारी
एक मां के लिए अपने बच्चे से बढ़कर कुछ नहीं होता. लेकिन जब हालात इतने बेरहम हो जाएं कि जीना ही मुश्किल लगे, तब ममता भी हार मान लेती है. रामकन्या ने अपने 8 साल के बेटे को सीने से लगाकर जो कदम उठाया, वह सिर्फ एक आत्मघाती निर्णय नहीं, बल्कि उस असहनीय दर्द का प्रतीक है जिसे वह लंबे समय से झेल रही थी.
सवाल जो अब भी बाकी हैं
यह घटना कई सवाल छोड़ जाती है. क्या समय रहते उसकी मदद हो सकती थी? क्या उसकी आवाज को गंभीरता से लिया जाता तो यह अंत टल सकता था? समाज और परिवार के स्तर पर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए समय पर आवाज उठाना बहुत जरूरी है.
रामकन्या और उसके बेटे की यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक डरावनी सच्चाई है कि किसी की चुप्पी के पीछे कितना बड़ा दर्द छिपा हो सकता है. हमारे समाज के माथे पर एक गहरा कलंक है. जब कोई मां मौत को गोद में लेना, जीने से ज्यादा आसान समझने लगे, तो हमें रुककर सोचना होगा कि हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं.
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