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अर्थव्यवस्था पर युद्ध की आंच: फिच ने घटाया भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान, जानिए आम आदमी पर क्या होगा असर


अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा युद्ध अब भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार पर ब्रेक लगाने लगा है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी ‘फिच’ ने भारत के आर्थिक विकास दर के अनुमान को घटाकर एक नई चिंता बढ़ा दी है। अगर आप सोच रहे हैं कि इस भू-राजनीतिक तनाव का आपसे क्या लेना-देना है, तो जान लीजिए कि इसका सीधा असर आपकी जेब, रोजमर्रा के खर्च और लोन की ईएमआई पर पड़ने वाला है।

फिच ने भारत की ग्रोथ का अनुमान कितना घटाया है?

फिच ने चालू वित्त वर्ष (FY27) के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान पहले के 6.7 प्रतिशत से घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में 7.4 प्रतिशत की शानदार ग्रोथ के बाद अब अर्थव्यवस्था में यह सुस्ती देखने को मिलेगी। इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर वित्त वर्ष 2027 की दूसरी (सितंबर) और तीसरी (दिसंबर) तिमाही में दिखाई देने की उम्मीद है। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते ही भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी अपने ग्रोथ के अनुमान को घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया था।

आखिर इस सुस्ती के पीछे की मुख्य वजह क्या है?

इस आर्थिक नरमी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका-ईरान युद्ध और इसके कारण पैदा हुआ तेल संकट है। वैश्विक व्यापार के लिए अहम ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पिछले 14 हफ्तों से बंद है और इसके जुलाई तक खुलने की उम्मीद नहीं है। इसके चलते हाल के हफ्तों में ईंधन की कीमतें चार से पांच प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। फिच का कहना है कि युद्ध के कारण बढ़ती कीमतों से लोगों की वास्तविक आय कम हो रही है, जिसका सीधा असर ग्राहकों के खर्च करने की क्षमता पर पड़ेगा।

क्या कच्चे तेल और ग्लोबल मार्केट के हालात और बिगड़ेंगे?

जी हां, अमेरिका-ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। वैश्विक मोर्चे पर फिच ने 2026 के लिए ग्लोबल ग्रोथ का अनुमान 0.2 प्रतिशत घटाकर 2.4 प्रतिशत कर दिया है। इसके अलावा, कच्चे तेल की महंगाई को देखते हुए एजेंसी ने 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड ऑयल का औसत अनुमान 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ाकर 87 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है।

क्या देश में महंगाई और ईएमआई और बढ़ेगी?

फिच की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अभी महंगाई बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी है; अप्रैल में थोक महंगाई दर 8.3 प्रतिशत और खुदरा महंगाई 3.5 प्रतिशत रही। लेकिन एजेंसी का अनुमान है कि ऊंचे ऊर्जा दामों के कारण साल के अंत तक महंगाई दर बढ़कर 5.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, खराब मानसून की आशंका और देश के कई हिस्सों में पड़ रही भीषण गर्मी से कीमतों में और तेज उछाल का जोखिम है। इसे काबू में करने के लिए, आरबीआई इस साल अपनी नीतिगत ब्याज दरों को 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत कर सकता है। इसका सीधा मतलब यह है कि आपकी लोन की ईएमआई महंगी हो सकती है।

क्या आगे चलकर अर्थव्यवस्था में सुधार की कोई उम्मीद है?

इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, लंबी अवधि के लिए कुछ अच्छे संकेत भी हैं। फिच को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2028 में ऊर्जा संकट का असर कम होने के बाद उपभोक्ता खर्च और निवेश में मजबूती आएगी, जिससे जीडीपी ग्रोथ एक बार फिर रफ्तार पकड़कर 6.7 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर भी राहत है; फिच को भारतीय रुपये में किसी बड़ी गिरावट की आशंका नहीं है और चालू वित्त वर्ष में यह डॉलर के मुकाबले औसतन 97.50 के आसपास बना रह सकता है।

युद्ध और महंगे तेल के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को अल्पावधि में झटके जरूर लगेंगे। हालांकि, घरेलू मांग के दम पर लंबी अवधि में सुधार की पूरी गुंजाइश बनी हुई है। आने वाले महीनों में आरबीआई के फैसलों और महंगाई के आंकड़ों पर बाजार की पैनी नजर रहेगी।



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