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Gold: दुनिया के केंद्रीय बैंक खरीदेंगे अभी और सोना, कीमतों में आ सकता है तेज उछाल


आर्थिक अनिश्चितता के दौर में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों का भरोसा कागजी मुद्रा के बजाय एक बार फिर सोने पर ज्यादा मजबूत हो रहा है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के वार्षिक सर्वे ने यह साफ कर दिया है कि रिजर्व मैनेजरों (आरक्षित निधि प्रबंधकों) के बीच अपने पोर्टफोलियो में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने को लेकर दीर्घकालिक रुझान है।

सर्वे में दुनिया भर के 76 केंद्रीय बैंकों ने हिस्सा लिया, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। 84 फीसदी केंद्रीय बैंकों का मानना है कि पांच साल बाद कुल वैश्विक भंडार में सोने की हिस्सेदारी काफी ऊंची होगी। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में विकसित देशों, उभरते बाजारों व विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक एक सुर में बात कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों से पता चलता है कि वैश्विक भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। 74 फीसदी आरक्षित प्रबंधकों का अनुमान है कि पांच साल बाद वैश्विक भंडार में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा वर्तमान के मुकाबले काफी कम हो जाएगा।

लंबी अवधि का नजरिया सकारात्मक

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल सर्वे के नतीजों पर केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर अजय केडिया ने कहा, दीर्घकालिक रूप से सोने की कीमतों का नजरिया तेज और आक्रामक बना हुआ है। कच्चे तेल से महंगाई बढ़ी है और उससे ब्याज दरों में इजाफा हो रहा है। ऐसे में तीन-चार माह तक सोने पर दवाब दिख सकता है। अगले एक साल में सोना वैश््विक बाजार में 6100 से 6500 डॉलर प्रति औंस तक जाएगा।

आरबीआई सख्त…भ्रामक वित्तीय उत्पाद नहीं बेच सकेंगे बैंक और अन्य संस्थान

बैंक व अन्य वित्तीय संस्थान अब ग्राहकों को भ्रमित कर व गलत जानकारी देकर अपने उत्पाद नहीं बेच पाएंगे। अगर उन्होंने ऐसा किया तो तय समय में उस उत्पाद की मूल कीमत के साथ-साथ नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा भी देना होगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ग्राहकों की लिखित सहमति लेने में हो रहे बड़े खेल को रोकने के लिए नियम काफी सख्त कर दिए हैं।

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दरअसल, आरबीआई ने वाणिज्यिक बैंक-उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण द्वितीय संशोधन निर्देश, 2026 जारी कर दिया है। नई नियमावली के तहत रिजर्व बैंक ने मिस-सेलिंग यानी गलत तरह से बिक्री की परिभाषा और स्पष्ट कर दी है। इसके प्रावधान एक जनवरी, 2027 से लागू होंगे। अब ग्राहक की प्रोफाइल के अनुरूप न होने वाला उत्पाद बेचना मिस सेलिंग माना जाएगा, चाहे ग्राहक ने सहमति क्यों न दी हो। एक उत्पाद लेने के लिए दूसरा उत्पाद खरीदने को मजबूर करना भी इसी दायरे में आएगा। इनमें होम लोन, बीमा पालिसी, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि शामिल हैं। ग्राहकों को अब इनके लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा।

ग्राहकों की सहमति का मतलब

अब बैंक किसी भी उत्पाद को तभी बेच सकेगा जब ग्राहक ने उसके लिए स्पष्ट सहमति दी हो। विशिष्ट उत्पाद के लिए दी सहमति दूसरे उत्पाद के लिए स्वत: सहमति नहीं मानी जाएगी। ग्राहकों को उनकी लिखित सहमति दर्ज करने का विकल्प देना होगा। केवल अभी नहीं या सहमत नहीं के विकल्प से काम नहीं चलेगा।



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