वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में निवेश की बाढ़ आई हुई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लिहाज से रेस का सबसे बड़ा विजेता सॉफ्टवेयर या एआई मॉडल नहीं, बल्कि देश पावर सेक्टर बनने जा रहा है।श्रीराम म्यूचुअल फंड की नई थीमैटिक रिपोर्ट ‘द एआई बबल डिबेट: ए यूनिट-इकोनॉमिक्स लेंस’ के अनुसार, भारत के लिए एआई में निवेश के इस दौर में ‘बिजली की मांग’ पूरी करने का अवसर है। रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि एआई डेटा सेंटरों की असीमित जरूरत को पूरा करने के लिए बिजली की भारी जरूरत है। ऐसे में भारतीय बिजली और बुनियादी ढांचा कंपनियों के लिए इस क्षेत्र में विकास के अभूतपूर्व मौके हैं।
एआई रेस में भारत के लिए बिजली क्षेत्र क्यों सबसे बड़ा अवसर बन रहा है?
वैश्विक स्तर पर टेक दिग्गज एआई मॉडल विकसित करने की दौड़ में अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं, लेकिन इस रेस में भारत की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी बेहद सीमित है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कोई भी लिस्टेड फ्रंटियर लैब या हाइपरस्केलर मौजूद नहीं है, जिससे हमारा सीधा कूटनीतिक या तकनीकी एक्स्पोजर काफी हद तक केवल आईटी सेवाओं की मांग तक सीमित हो जाता है।
लेकिन भारत के पास डेटा सेंटर्स के लिए अत्यधिक बिजली और भौतिक बुनियादी ढांचे की जरूरतों को पूरा करने की जबरदस्त क्षमता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरी एआई व्यवस्था के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा जीपीयू चिप्स नहीं, बल्कि बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करना है। एआई मॉडल की रेस में चाहे कोई भी लैब जीते या टोकन की कीमतें कितनी भी तेजी से गिरें, बिजली की खपत होना तय है। यही वजह है कि भारत का पावर सेक्टर इस वैश्विक डिजिटल क्रांति का भौतिक इंजन बनने जा रहा है।
निवेशकों के लिए इस फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर चेन में कहां हैं कमाई के मौके?
श्रीराम म्यूचुअल फंड ने इस संरचनात्मक बदलाव को देखते हुए पावर सेक्टर पर अपना भरोसा जताते हुए इसे ओवरवेट रेटिंग दी है। फंड हाउस के अनुसार, निवेशकों को एआई के सॉफ्टवेयर मॉडल के बजाय उस भौतिक बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो इसके निर्माण में काम आ रहे हैं।
फंड ने बिजली क्षेत्र के भीतर कई प्रमुख कड़ियों की पहचान की है:
- पावर ग्रिड और ट्रांसमिशन: बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और ट्रांसमिशन ईपीसी से जुड़ी कंपनियां।
- इलेक्ट्रिकल इंफ्रास्ट्रक्चर चेन: डेटा सेंटर के लिए आवश्यक स्विचगियर, ट्रांसफॉर्मर, ग्रिड, कूलिंग और केबलिंग बनाने वाले उद्योग।
- सपोर्टिंग गियर्स और फाइनेंसर: पावर फाइनेंसर्स और डीजल जेनसेट निर्माता कंपनियां।
रिपोर्ट में इन कंपनियों को एआई के भौतिक निर्माण का पिक्स एंड शावेल्स (खदान खोदने के औजार) बताया गया है। ये कंपनियां इस बात से बेअसर रहकर मुनाफा कमाएंगी कि अंततः कौन सी एआई कंपनी बाजार पर राज करती है।
क्या एआई निवेश का यह चक्र वाकई एक बड़ा बुलबुला है?
बाजार में लगातार यह बहस चल रही है कि क्या एआई पर किया जा रहा भारी खर्च एक बुलबुला है जो जल्द ही फूट सकता है। हालांकि, यह रिपोर्ट इस तर्क को खारिज करती है कि यह साल 2000 के डॉट-कॉम या टेलीकॉम संकट जैसा कोई दिवालियापन जैसा संकट लाएगा। इसका कारण यह है कि मौजूदा निवेश का बड़ा हिस्सा दुनिया की सबसे अधिक नकदी और भारी मुनाफा कमाने वाली तकनीकी कंपनियों की ओर से खुद फंड किया जा रहा है।
यह पूरी बहस यूनिट इकोनॉमिक्स के एक सीधे सवाल पर आकर टिक जाती है। वह सवाल है- क्या इस कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को खड़ा करने में लगाई गई भारी पूंजी पर तब तक पर्याप्त रिटर्न (कमाई) मिल पाएगी, जब तक कि यह बुनियादी ढांचा पुराना न हो जाए? इस सवाल का जवाब तलाशा जाना अब भी जरूरी है।
इस पूरे बदलाव का भारतीय उद्योगों के लिए क्या मतलब है?
एआई तकनीक का भविष्य चाहे जो भी हो, भारत के लिए इसके निहितार्थ पूरी तौर पर साफ हैं। भले ही एआई की मांग उम्मीद से कम रहे या उम्मीद से अधिक हो जाए, भारत इस वैश्विक विस्तार के लिए आवश्यक भौतिक बुनियादी ढांचे की आपूर्ति करके बड़ा आर्थिक लाभ उठाने की स्थिति में है। निवेशकों के लिए अब व्यापक कैपिटल गुड्स के बजाय विशेष रूप से एआई बुनियादी ढांचे से जुड़ी बिजली और इलेक्ट्रिकल ग्रिड कंपनियों पर दांव लगाना एक रणनीतिक और सुरक्षित विकल्प बन गया है।



