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E20 Row: वाहन खराब होने पर उपभोक्ता फोरम ने कंपनी को दिया ग्राहक को नई कार देने का आदेश, जानें पूरा विवाद


देश में ग्रीन फ्यूल के तौर पर प्रमोट किए जा रहे E20 (20% इथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को लेकर चल रही बड़ी बहस के बीच छत्तीसगढ़ से एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सामने आया है। रायपुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त पीठ) ने वाहन निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड और उसके डीलर को एक ग्राहक की ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड कार को बदलकर उसी मॉडल का नया E20-कंपैटिबल (अनुकूल) वाहन देने का कड़ा आदेश जारी किया है। उपभोक्ता आयोग ने इस मामले में कंपनी और डीलर दोनों को ‘सेवा में कमी’ और ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ का दोषी माना है। 14 जुलाई 2026 को आया यह ऐतिहासिक फैसला देश में इथेनॉल मिश्रित ईंधन के उपयोग और वाहन निर्माताओं द्वारा पारदर्शिता बरतने की अनिवार्यता पर एक बड़ा कानूनी संदेश देता है।

क्या है E20 ईंधन से जुड़ा यह पूरा विवाद?

यह मामला रायपुर के रहने वाले 41 वर्षीय किडनी रोग विशेषज्ञ (नेफ्रोलॉजिस्ट) डॉ. प्रेमराज देवता से जुड़ा है। डॉ. देवता ने 3 जून 2024 को मारुति सुजुकी की ‘ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस’ कार 18,29,000 रुपये में खरीदी थी। शिकायत के मुताबिक, कार खरीदने के समय उन्हें यह बिल्कुल नहीं बताया गया था कि यह गाड़ी व्यापक रूप से उपलब्ध E20 इथेनॉल-मिश्रित ईंधन के पूर्ण अनुकूल नहीं है। बाद में पता चला कि जो गाड़ी उन्हें नई बताकर जून 2024 में बेची गई थी, वह वास्तव में जनवरी 2023 में निर्मित की गई थी- यानी बिक्री से लगभग 17 महीने पहले। 

कार करीब 21,913 किलोमीटर तक बिना किसी परेशानी के चली, लेकिन नवंबर 2024 में इसके डैशबोर्ड पर अचानक इंजन की खराबी का सिग्नल आ गया। इसके बाद बार-बार डीलर के वर्कशॉप जाने, फ्यूल टैंक साफ कराने और स्पेयर पार्ट्स बदलने के बाद भी कार लगातार खराब होती रही। थक-हारकर ग्राहक ने कंपनी और रायपुर के नेक्सा मैग्नेटो (स्काई ऑटो मोबाइल) डीलर के खिलाफ आयोग का दरवाजा खटखटाया। इस बीच, मार्च 2025 से ग्राहक को एक वैकल्पिक कार (लोनर वाहन) दी गई थी, जबकि उनकी अपनी गाड़ी डीलरशिप पर ही खड़ी रही।

मारुति सुजुकी और डीलर ने बचाव में क्या तर्क दिए?

फोरम के समक्ष मारुति सुजुकी और डीलर ने शिकायत का कड़ा विरोध किया। उनके वकीलों ने दलील दी कि गाड़ी के इंजन में आई खराबी किसी मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (निर्माण संबंधी कमी) के कारण नहीं थी, बल्कि इसमें मिलावटी या प्रदूषित ईंधन के इस्तेमाल से हुई थी। कंपनी ने अपनी बात साबित करने के लिए लैब टेस्ट रिपोर्ट भी दाखिल की, जिसमें कार से निकाले गए ईंधन की गुणवत्ता को खराब बताया गया था। उनका कहना था कि ईंधन की गुणवत्ता एक बाहरी कारक है और यह गाड़ी की वारंटी शर्तों के तहत कवर नहीं होता है।

कंज्यूमर फोरम ने कंपनी और डीलर को क्यों दोषी ठहराया?

अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्यडॉ. आनंद वर्गीस की पीठ ने कंपनी के दावों को खारिज करते हुए आंशिक रूप से शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने स्पष्ट किया कि जनवरी 2023 में निर्मित यह गाड़ी E20 ईंधन के अनुकूल नहीं थी। इसके बावजूद, कंपनी और डीलर ने ग्राहक को यह महत्वपूर्ण जानकारी छुपाकर 17 महीने बाद गाड़ी बेच दी। ऐसे में बार-बार ईंधन टैंक साफ करने से इस तकनीकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता था। आयोग ने इसे उपभोक्ता के अधिकारों का हनन और सेवा में गंभीर लापरवाही करार दिया।

मुआवजे और वित्तीय भुगतान से जुड़े क्या निर्देश दिए गए हैं?

उपभोक्ता आयोग ने मारुति सुजुकी और डीलरशिप को आदेश जारी होने के 45 दिनों के भीतर निम्नलिखित निर्देश पूरे करने को कहा है:


  • नया वाहन देना: ग्राहक को उसी मॉडल की नई E20-कंपैटिबल ग्रैंड विटारा कार दी जाए।

  • कार न बदलने की स्थिति में रिफंड: यदि 45 दिनों में कार नहीं बदली जाती है, तो विरोधी पक्षों को कुल 20,50,494 रुपये का पूरा भुगतान करना होगा। इस राशि का ब्योरा इस प्रकार है:

  • वाहन की मूल कीमत: 18,29,000 रुपये

  • आरटीओ शुल्क: 1,86,850 रुपये

  • बीमा प्रीमियम: 34,644 रुपये

  • मानसिक प्रताड़ना व कानूनी खर्च: गाड़ी बदलने या न बदलने, दोनों ही स्थितियों में ग्राहक को मानसिक प्रताड़ना के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा और मुकदमा खर्च के लिए 10,000 रुपये का भुगतान करना होगा।

  • ब्याज की शर्त: यदि निर्धारित 45 दिनों के भीतर इस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो विरोधी पक्षों को आदेश की तिथि से भुगतान के दिन तक इस पर 7% वार्षिक दर से ब्याज चुकाना होगा।

यह फैसला देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और वाहन कंपैटिबिलिटी को लेकर चल रहे विमर्श को एक नया मोड़ देने वाला साबित होगा।



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