Opinion
oi-Pallavi Kumari
आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए विवश होना पड़ा। कॉकरोच जनता पार्टी और केंद्र सरकार के बीच दोपहर को होने वाली तीसरे दौर की बातचीत शुरू होने के कुछ देर पहले धर्मेन्द्र प्रधान ने अपने इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास भेज दिया।
अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि मैं देश के युवाओं, आकांक्षाओं और भावनाओं का बहुत सम्मान करता हूँ। कि काकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने आज सुबह कहा था कि अगर सरकार से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होता तो सरकार से बातचीत जारी रखने का कोई मतलब नहीं है।

काकरोच जनता पार्टी ने केंद्र सरकार के साथ दूसरे दौर की बातचीत के बाद यह दावा किया था कि नीठ पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले अभ्यर्थियों के परिजनों को उचित मुआवजा और प्रदर्शन कारी छात्रों के विरुद्ध कोई मुकदमा दर्ज न करने की उनकी मांग सरकार ने सैद्धान्तिक रूप से मान ली हैं साथ ही काकरोच जनता पार्टी ने यह चेतावनी भी दी थी कि नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होने की स्थिति में देश भर में इस आंदोलन का और बड़े रूप में विस्तार किया जाएगा। यहाँ यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कांग्रेस पार्टी ने यह घोषणा की थी कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हो जाता तब तक वह संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार नहीं होगी। कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद के मानसून सत्र में लगातार हंगामा कर रहा था जिसके कारण संसद का कार्यवाही नहीं चल पा रही थी।
जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक ने जिन मांगों को अनशन प्रारंभ किया था उनमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रमुख थी यद्यपि सोनम वांगचुक ने जब दो दिन पूर्व अपना अनशन समाप्त किया तो उन्होंने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर जोर नहीं दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे, राहुल गाँधी औरप्रियंका गाँधी वाड्रा सहित 100 से अधिक वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे सहित अन्य मांगों को लेकर प्रधान मंत्री आवास के समीप धरना देकर अपनी गिरफ्तारी दी। इसके बाद देश भर में यह आंदोलन व्यापक रूप से फैलता गया और मांग यही थी कि धर्मेन्द्र प्रधान इस्तीफा दें। आंदोलनकारी छात्रों के आक्रोश को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यद्यपि अनेक फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन तथा पेपर लीक रोकने के लिए इसी सत्र में एक बिल लाने की घोषणा भी की, रात में छात्रों को संबोधित करते हुए इंस्टाग्राम पर लगातार दो दिन संदेश भी दिए परंतु ये सारे कदम भी छात्रों को धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं कर सके।
कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि धर्मेन्द्र प्रधान को शिक्षा मंत्री पद पर कायम रखने के लिए सरकार अडिग है। इसके पीछे एकमात्र कारण यही माना जा रहा था कि सरकार यह संदेश नहीं देना चाह रही थी कि यदि विपक्ष और आंदोलन कारी छात्रों की मांग मानकर धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफे के लिए कहा गया तो भविष्य में भी किसी मंत्री के इस्तीफे के लिए आंदोलनों का एक नया सिलसिला शुरू हो सकता है लेकिन अब सरकार को इस हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए कि नीट पेपर लीक का मामला सामने आते ही नैतिकता के आधार पर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफे की घोषणा करके धर्मेन्द्र प्रधान अपना कद बढ़ा सकते थे परंतु इतना सब होने के बाद मजबूरी में इस्तीफे की घोषणा करके उन्होंने पूरी सरकार को असहज स्थिति में पहुँचा दिया है।
इतनी किरकिरी होने के बाद भी केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा न देने की जिद पर अड़े धर्मेन्द्र प्रधान आखिर अचानक ही अपना फैसला बदलने के लिए विवश क्यों हुए यह समझने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के उस भाषण पर गौर करने की आवश्यकता है जो उन्होंने एक दिन पूर्व ही न ई दिल्ली में आयोजित विश्व मांगल्य सभा के एक महत्वपूर्ण समारोह में दिया था।अपने इस भाषण में संघ प्रमुख ने कहा था कि नयी पीढ़ी को अपनापन और समय देने एवं उसके साथ संवाद करने की आवश्यकता है।
भागवत ने इस बात पर विशेष जोर दिया था कि नयी पीढ़ी के साथ संवाद करके ही उन्हें सही दिशा दिखाई जा सकती है। गौर तलब है कि भागवत के उक्त संबोधन के दो दिन पूर्व भाजपा के वयोवृद्ध नेता और अतीत में मानव संसाधन मंत्री रह चुके डा मुरली मनोहर जोशी ने भी छात्रों के संसद मार्च के बाद कहा था कि परीक्षा प्रणाली को लेकर छात्रों की चिंताएं और सरोकार वास्तविक हैं उन्होंने संसद मार्च में शामिल बलप्रयोग को निर्मम बताते हुए यहाँ तक कह दिया था कि बल का ऐसा इस्तेमाल भारतीय समाज के एक बडे़ हिस्से को विकसित भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य से दूर कर देगा।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)



