30 साल के समीर की कहानी आज के उन युवाओं जैसी है, जो अच्छी नौकरी और नियमित आमदनी के बावजूद धीरे-धीरे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। समीर की मासिक आय 40,000 रुपये है। पहले उसने 38,000 रुपये का स्मार्टफोन ईएमआई पर लिया। किस्त खत्म हुई तो दोस्तों के साथ घूमने के लिए पर्सनल लोन ले लिया। इसके बाद रोजमर्रा और लाइफस्टाइल के खर्च के लिए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल बढ़ता गया। आज उसकी सैलरी आते ही करीब 30,000 रुपये किस्तों में चले जाते हैं। उसने कभी भुगतान में डिफॉल्ट नहीं किया, इसलिए क्रेडिट स्कोर खराब नहीं हुआ, लेकिन उसके पास महीने के बाकी खर्चों के लिए बहुत कम पैसा बचता है। यही स्थिति धीरे-धीरे कर्ज के ऐसे चक्र में बदल सकती है, जहां पुरानी देनदारी चुकाने के लिए नई देनदारी लेनी पड़ती है।
क्या देश में युवाओं के बीच कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ा है?
ट्रांसयूनियन सिबिल की रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय रूप से अत्यधिक कर्ज के बोझ तले दबे उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2016-17 के 5 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 18 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इसके बाद यह कुछ घटकर 15 प्रतिशत पर आई है। चिंता की बात यह है कि कर्ज का दबाव 35 साल से कम उम्र के युवाओं में ज्यादा दिखाई देता है। यह आयु वर्ग भारत के कुल क्रेडिट बाजार का करीब 39 प्रतिशत हिस्सा रखता है। यानी युवाओं के बीच कर्ज की उपलब्धता बढ़ी है और उसके साथ खर्च करने की क्षमता भी बढ़ी है। समस्या तब शुरू होती है जब आय बढ़ने से पहले ही खर्च और ईएमआई बढ़ने लगती है।
किस तरह के कर्ज ने युवाओं पर सबसे ज्यादा दबाव बढ़ाया है?
इस बदलाव में उपभोग से जुड़े कर्ज की बड़ी भूमिका है। इसमें पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और कंज्यूमर ड्यूरेबल फाइनेंस शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे उत्पाद रखने वाले सक्रिय उधारकर्ताओं की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत से बढ़कर 51 प्रतिशत हो गई है। यानी अब कर्ज का इस्तेमाल केवल घर, वाहन या खेती जैसे बड़े और जरूरी कामों के लिए ही नहीं हो रहा है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, छुट्टियां और लाइफस्टाइल से जुड़े खर्च भी कर्ज के जरिए पूरे किए जा रहे हैं। पहले नया कर्ज लेना किसी बड़ी जरूरत से जुड़ा माना जाता था, लेकिन अब करीब 38,000 रुपये के औसत स्मार्टफोन और दूसरे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स भी कर्ज लेने की बड़ी वजह बन रहे हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी क्रेडिट ग्रोथ के प्रमुख हिस्सेदार बन रहे हैं।
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कैसे पहचानें कि कर्ज अब आपकी क्षमता से बाहर जा रहा है?
कर्ज लेना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब मासिक आय का बड़ा हिस्सा सिर्फ किस्तों में चला जाए। अगर आपकी कुल मासिक आय का 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ईएमआई में जा रहा है तो इसे गंभीर संकेत मानकर अपने खर्च और कर्ज की समीक्षा करनी चाहिए। दूसरा खतरा तब है जब पुरानी ईएमआई चुकाने या क्रेडिट कार्ड का न्यूनतम भुगतान करने के लिए नया पर्सनल लोन या लोन एप का सहारा लेना पड़े। अगर आपकी बचत खत्म हो चुकी है और अचानक आने वाले खर्चों के लिए भी क्रेडिट कार्ड पर निर्भरता बढ़ गई है, तो स्थिति और गंभीर है। महीने के पहले सप्ताह में ही सैलरी का बड़ा हिस्सा कर्ज में चले जाना भी चेतावनी का संकेत है।
कर्ज के जाल से निकलने की शुरुआत कहां से करें?
सबसे पहले अपनी पूरी वित्तीय स्थिति सामने रखें। सभी लोन, क्रेडिट कार्ड की बकाया रकम, ब्याज दर और हर महीने जाने वाली ईएमआई की सूची बनाएं। इसके बाद उन कर्जों की पहचान करें जिन पर सबसे ज्यादा ब्याज लग रहा है। आम तौर पर क्रेडिट कार्ड का बकाया महंगा पड़ सकता है, इसलिए उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से उसे प्राथमिकता देना उपयोगी हो सकता है। एक तरीका यह है कि सबसे महंगे कर्ज को पहले चुकाया जाए। दूसरा तरीका छोटे कर्ज को पहले खत्म करना है, जिससे एक-एक देनदारी खत्म होने का आत्मविश्वास बढ़ता है। अगर कई छोटे और महंगे कर्ज हैं तो लोन कंसोलिडेशन का विकल्प भी देखा जा सकता है, लेकिन नया लोन लेने से पहले उसकी कुल लागत और ब्याज की अच्छी तरह तुलना जरूरी है।
ईएमआई कम करने के लिए बैंक से बात करना क्यों जरूरी है?
अगर किसी व्यक्ति को लग रहा है कि वह आगे ईएमआई का भुगतान नहीं कर पाएगा, तो भुगतान चूकने तक इंतजार करने के बजाय बैंक या संबंधित ऋणदाता से पहले ही बात करना बेहतर है। परिस्थितियों के अनुसार बैंक लोन की अवधि बढ़ाने या पुनर्गठन जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। हालांकि हर मामले में सुविधा मिलना तय नहीं है और किसी भी बदलाव से कुल ब्याज बढ़ सकता है। इसलिए नया विकल्प स्वीकार करने से पहले ब्याज दर, अवधि, प्रोसेसिंग फीस और अन्य शुल्क को समझना जरूरी है। केवल एक ईएमआई कम दिखने से कर्ज सस्ता नहीं हो जाता। कई बार लंबी अवधि के कारण कुल भुगतान काफी बढ़ सकता है।
भविष्य में कर्ज का डेड-ट्रैप बनने से कैसे बचें?
कर्ज लेने से पहले इन बातों की जांच करें। नया लोन लेने से पहले ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस, लोन की अवधि और प्री-क्लोजर चार्ज जरूर देखें। यह भी तय करें कि लोन किस जरूरत के लिए लिया जा रहा है। केवल सोशल मीडिया पर दिखावे या दोस्तों के दबाव में महंगी चीजें ईएमआई पर खरीदने से बचना चाहिए। जिस वस्तु की तत्काल जरूरत नहीं है, उसके लिए कुछ महीने बचत करके नकद भुगतान करना कई बार बेहतर विकल्प हो सकता है। क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते समय कोशिश होनी चाहिए कि हर महीने पूरा बकाया चुकाया जाए, केवल न्यूनतम भुगतान पर निर्भर न रहें। क्रेडिट कार्ड की उपयोग सीमा को 30 प्रतिशत से नीचे रखने की रणनीति भी अपनाई जा सकती है।
50-30-20 नियम क्या कर्ज से बचने में मदद कर सकता है?
आय को व्यवस्थित करने के लिए 50-30-20 का नियम एक सरल बजट ढांचा हो सकता है। इसमें करीब 50 प्रतिशत आय जरूरी खर्चों, 30 प्रतिशत इच्छाओं और 20 प्रतिशत बचत के लिए रखने का सुझाव दिया जाता है। हालांकि हर व्यक्ति की आय, परिवार और कर्ज की स्थिति अलग होती है, इसलिए इसे कठोर नियम के बजाय बजट बनाने के आधार के रूप में देखना चाहिए। असल लक्ष्य यह होना चाहिए कि ईएमआई और गैर-जरूरी खर्च मिलकर आपकी पूरी आय को खत्म न कर दें। कर्ज तभी उपयोगी वित्तीय साधन बन सकता है जब उसकी किस्त आपकी भुगतान क्षमता के भीतर हो। समीर जैसी स्थिति से बचने का सबसे सीधा रास्ता यही है कि खरीदारी से पहले जरूरत, कुल लागत और अपनी वास्तविक भुगतान क्षमता तीनों को देखा जाए। आज की छोटी ईएमआई अगर लगातार बढ़ती रही तो कल वही बड़ी वित्तीय परेशानी बन सकती है।



