Homeटेक्नोलॉजीगिरिराज, ललन और रूडी की सीटों में क्यों होगा बंटवारा: बिहार...

गिरिराज, ललन और रूडी की सीटों में क्यों होगा बंटवारा: बिहार की कौन-कौन सी लोकसभा सीटें 3 हिस्सों में बंटेंगी, तेजस्वी-मोदी किसे फायदा – Bihar News




सबकुछ सही रहा तो अगले लोकसभा चुनाव यानी 2029 में बिहार में 40 की जगह 60 लोकसभा सांसद होंगे। राज्य की 10 लोकसभा सीटों को 3 हिस्सों में बांटने का ड्राफ्ट प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने तैयार कर लिया है। केंद्र सरकार इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुला सकती है। जिसमें लोकसभा सीटें बढ़ाने के लिए संविधान (131वां संशोधन) बिल, परिसीमन (संशोधन) बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल को पास कराया जाएगा। इनके जरिए महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। बिहार की 10 सीटें कौन सी हैं, जिनका बंटवारा होगा। क्यों होगा, इससे भाजपा को कितना फायदा होगा। जानेंगे, बूझे की नाही में… सवाल-1ः EAC-PM की रिपोर्ट में क्या है? जवाबः देश की संसद और विधानसभाओं में महिला रिजर्वेशन लागू करने के लिए केंद्र सरकर इस महीने यानी अक्टूबर के आखिरी सप्ताह और नवंबर के पहले सप्ताह में एक बार फिर परिसीमन बिल लेकर आ सकती है। जिसमें लोकसभा की सीटों को 543 से 850 सीट तक करने का प्रावधान है। सरकार इस संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो तिहाई बहुमत यानी 543 में से 362 सांसदों का जुगाड़ कर रही है। इसी बीच जून के आखिरी सप्ताह में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने एक नया वर्किंग पेपर ड्राफ्ट तैयार किया है। परिषद की सदस्य डॉ. शामिका रवि और डॉ. मुदित कपूर ने ड्राफ्ट में 543 लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 824 करने का गणितीय फॉर्मूला दिया है। जिसमें सुझाव दिया गया है कि 543 में से 374 सीटों में कोई बदलाव नहीं किया जाए। 111 सीटों को तीन हिस्सों में और 59 सीटों को दो हिस्सों में बांटा जाए। इसमें बिहार की 40 लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 60 करने का प्रस्ताव है। नए ड्राफ्ट में कहा गया है कि नई सीटों को बढ़ाने के लिए राज्य की 10 लोकसभा सीटों पटना साहिब, पाटलिपुत्र, दरभंगा, सारण, बेगूसराय, आरा, मधुबनी, झंझारपुर, खगड़िया और मुंगेर को 3 हिस्सों में बांट दिया जाए। बाकी की 30 लोकसभा सीटें जस की तस रखी जाए। सवाल-2ः परिषद ने इन्हीं 10 सीटों को 3 हिस्सों में बांटने का फॉर्मूला क्यों दिया? जवाबः आर्थिक सलाहकार परिषद का दावा है कि इस बंटवारे से वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोत्तरी होगी और लोगों को सहूलियतें मिलेंगी। परिषद के मुताबिक, पटना साहिब, बेगूसराय और मुंगेर जैसी सीटों पर शहरीकरण का स्तर ज्यादा है। मतलब शहरी आबादी ज्यादा है। साथ में ग्रामीण इलाके जुड़े हैं। जब इन्हें 3 हिस्सों में बांटा जाएगा तो शहरी और ग्रामीण वोटर अपनी-अपनी प्राथमिकता के आधार पर वोटिंग करेंगे। उनको फायदा होगा। दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर और खगड़िया जैसी लोकसभा सीटें भौगोलिक रूप से बड़ी हैं और यहां सवर्ण, EBC, मुस्लिम और महादलितों के अपने बेहद मजबूत सामाजिक ताने-बाने हैं। फिलहाल बड़ी सीट होने के कारण राजनीतिक दल हर किसी तक नहीं पहुंच पाते हैं। महिलाएं ज्यादा वोट नहीं कर पाती। इन्हें तीन हिस्सों में तोड़ने पर महिला वोटरों का टर्नआउट ज्यादा बढ़ेगा। ड्राफ्ट में सीटों के बंटवारे के 7 आधार बताए गए हैं… सलाहकार परिषद ने कहा है कि इस फॉर्मूले को तकनीकी रूप से दुरुस्त करने और विवादों से बचाने के लिए 2009 से 2024 तक के लोकसभा चुनावों के वोटिंग प्रतिशत, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय भाषाई समूहों के रुझानों का बारीकी से अध्ययन किया गया है, ताकि परिसीमन के बाद किसी भी तबके में राजनीतिक हिस्सेदारी घटने की नाराजगी न रहे। सवाल-3ः बिहार में इस परिसीमन से किस पार्टी को फायदा होगा? जवाबः फिलहाल सीधे तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि अभी सिर्फ बंटने वाली लोकसभा सीट का नाम आया है, कौन सा एरिया किसमें शामिल होगा, क्लियर नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि आज की राजनीतिक परिस्थिति और समीकरण को देखें तो भाजपा लीड NDA को काफी फायदा होगा। 10 में से 5 सीट बेगूसराय, पाटलिपुत्र, आरा, दरभंगा और मधुबनी में RJD कड़ी टक्कर देती है। ज्यादा संभव है कि परिसीमन के बहाने उसकी जमीन को बहुत चालाकी से खत्म कर दी जाए। इसे सिलसिलेवार तरीके से ऐसे समझिए… पटना साहिबः BJP का मजबूत किला, बंटने से सीटें बढ़ेगी 22.92 लाख वोटरों वाली पटना साहिब लोकसभा सीट को देश भर में कायस्थ समाज के सबसे बड़े गढ़ों में से एक माना जाता है। इस सीट का सामाजिक ताना-बना भाजपा के पक्ष में इतना मजबूत है कि यहां उसके आगे कोई पार्टी टिक नहीं पाती। कायस्थ बहुल इस सीट पर 30% से ज्यादा जनरल कास्ट (करीब साढ़े 4 लाख कायस्थ, साढ़े 3 लाख भूमिहार-राजपूत-ब्राह्मण) के वोटर हैं। साहू, गुप्ता और अन्य वैश्य जातियों की करीब 3 लाख आबादी BJP के समीकरण को और मजबूत करते हैं। 6 विधानसभा सीट वाले इस लोकसभा एरिया की सिर्फ दो सीट फतुहा और बख्तियारपुर में महागठबंधन खासकर RJD कड़ी टक्कर देती है। यहां यादव-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे वह फाइटिंग पोजिशन में है, लेकिन गैर यादव OBC और EBC समुदाय भाजपा के लिए ढाल का काम करता है। पाटलिपुत्रः यादव बहुल इलाके बंटे तो लड़ाई से बाहर हो जाएगी RJD पाटलिपुत्र सबसे चर्चित सीट है। 2008 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर शहरी और ग्रामीण आबादी बराबर है। करीब 20 लाख वोटरों वाली इस सीट को यादव बहुल सीट माना जाता है। यहां इस समुदाय के वोटरों की संख्या सबसे अधिक करीब 4.5 लाख है। यही कारण है कि यहां दोनों गठबंधन यादव कैंडिडेट ही देते हैं। दूसरे नंबर पर यहां भूमिहार वोटर करीब 3 लाख हैं। उसके बाद कुर्मी और कुशवाहा वोटर करीब 2.5 लाख हैं। मुस्लिम आबादी भी ठीक-ठाक है। यही कारण है कि यहां RJD और BJP के बीच कांटे की टक्कर होती है। अब तक इस सीट पर हुए 4 चुनाव में 1 बार RJD (2024) और 3 बार NDA (2009, 2014, 2019) जीता है। बेगूसरायः लेफ्ट और RJD की खिसक सकती है जमीन बेगूसराय की राजनीति पूरी तरह से भूमिहार जाति के इर्द-गिर्द घूमती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक हर तीसरा वोटर इस समाज से है। यह राज्य की सबसे बड़ी भूमिहार-बहुल सीट है। इस सीट पर दूसरा सबसे बड़ा वोटर तबका मुस्लिम समुदाय का है, जिनकी संख्या करीब 12% है। उसके बाद कुर्मी और कुशवाहा (विशेषकर धानुक और महतो) मतदाताओं की संख्या निर्णायक है। पिछड़ी जातियों में यादवों की आबादी करीब 1.5 लाख से ज्यादा है, जिसका झुकाव RJD की तरफ है। यहां RJD से ज्यादा लेफ्ट की पकड़ मजबूत है। परिसीमन के जानकारों का कहना है कि इलाकों के बंटवारे में राज्य सरकार और केंद्र सरकार का दखल ठीक-ठाक रहता है। ऐसी परिस्थिति में ज्यादा संभव है कि मुस्लिम वोटरों को इधर से उधर शिफ्ट किया जाए। जिसका चुनावी लड़ाई में फायदा उठाया जा सके। मुंगेरः बंटवारे से मजबूत होगा NDA के पक्ष में अगड़ा और EBC गठजोड़ मुंगेर लोकसभा में कुल वोटरों की संख्या लगभग 20 लाख से अधिक है। इस सीट पर भूमिहार की आबादी और राजनीतिक प्रभाव सबसे अधिक है। अनुमान के मुताबिक, करीब 20% से ज्यादा वोटर भूमिहार समाज से आते हैं। उसके बाद यादव दूसरा सबसे बड़ा वोटर समूह है। करीब 11-12%। जो RJD का आधार वोटर है। फिर धानुक, कुर्मी और कुशवाहा निर्णायक वोट बैंक है। विशेषकर धानुक और कुर्मी जातियों की आबादी करीब 15% से ज्यादा है। NDA के भूमिहार-लव-कुश और धानुक फॉर्मूले के कारण यहां उसका पलड़ा भारी रहता है। दरभंगाः क्या परिसीमन में टूट जाएगा यादव-मुस्लिम गठजोड़ 17.81 लाख वोटरों वाली इस लोकसभा सीट पर सबसे ज्यादा संख्या मुस्लिम समाज की है। करीब 20% से ज्यादा। हालांकि, एंटी मुस्लिम समीकरण के कारण भाजपा यहां लगातार 4 बार से चुनाव जीत रही है। मुस्लिमों के बाद मैथिल ब्राह्मणों की संख्या है। करीब 12%। इसके बाद करीब 10% यादव वोटर हैं। सारणः दियारा इलाका बंटा तो RJD को हो सकती है दिक्कत राजपूतों और यादवों की लड़ाई वाली यह सीट लालू फैमिली के काफी करीब है। 2008 में हुई परिसीमन के बाद यहां सिर्फ एक बार 2009 में लालू यादव चुनाव जीते हैं। उसके बाद से लालू फैमिली लगातार चुनाव हार रही है। यहां सबसे बड़ी आबादी यादव वोटरों की है, करीब 20%। उसके बाद राजपूत समाज करीब 18%। वैश्य और राजपूतों का गठजोड़ लालू यादव को जीतने नहीं दे रहा है। हालांकि, काफी करीबी टक्कर होती है। संभावना जताई जा रही है कि परिसीमन में दियारा इलाके को अलग-अलग हिस्से में जोड़कर यादव वोटरों का बंटवारा किया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो लालू फैमिली के हाथ से यह सीट लगभग निकल जाएगी। आराः अगर 3 विधानसभा हुए अलग तो महागठबंधन की ताकत हो जाएगी आधी अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई वाली इस लोकसभा सीट पर सवर्ण वोटर करीब 8 लाख हैं, जिसमें राजपूत समाज के सबसे ज्यादा करीब 4 लाख। पिछड़ी जातियों में यादव सबसे बड़ा वोटर समूह है, जो करीब 3.5 लाख हैं। इसके बाद मुस्लिम करीब डेढ़ लाख। यादव-मुस्लिम गठजोड़ के कारण यहां भाजपा को RJD कड़ी टक्कर देती है। मधुबनीः मुस्लिम आबादी वाले हिस्से बंटे तो NDA को ज्यादा फायदा आंकड़ों की मानें तो यहां हर चौथा वोटर मुस्लिम है। बिस्फी और जाले जैसे विधानसभा क्षेत्रों में इनकी संख्या काफी ज्यादा है, जो महागठबंधन की राजनीति का मुख्य आधार हैं। सवर्णों में यहां मैथिल ब्राह्मण सबसे ज्यादा करीब 12% हैं। उसके बाद यादव करीब 9% से ज्यादा हैं। वर्तमान भाजपा सांसद अशोक कुमार यादव (हुकुमदेव नारायण यादव के पुत्र) स्वयं इसी समुदाय से आते हैं, जिससे यहां का यादव वोट बैंक NDA और महागठबंधन के बीच बंट जाता है।



Source link

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img

Most Popular

Recent Comments