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Currency: ‘100 प्रति डॉलर भी हुआ रुपया तो घबराने की जरूरत नहीं’, ऐसा क्यों कह रहे 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष


वैश्विक आपूर्ति संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को एक अहम सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि आरबीआई को ‘100 रुपये प्रति डॉलर’ के मनोवैज्ञानिक स्तर से घबराना नहीं चाहिए और वर्तमान परिस्थितियों में रुपये को स्वाभाविक रूप से कमजोर होने देना ही सबसे सही रणनीति है।

मनोवैज्ञानिक दबाव में न आए आरबीआई

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर आरबीआई को टैग करते हुए अपने एक संदेश में पनगढ़िया ने स्पष्ट किया कि 100 रुपये प्रति डॉलर का आंकड़ा 99 और 101 की तरह ही महज एक संख्या है। उन्होंने केंद्रीय बैंक को सलाह दी है कि तेल संकट चाहे थोड़े समय के लिए हो या लंबे समय के लिए, इस वक्त सबसे सही कदम रुपये को गिरने देना (मूल्यह्रास) ही है। वर्तमान में रुपया डॉलर के मुकाबले 96.19 के स्तर पर है, जो इसे 100 के आंकड़े के करीब लाता है।

संकट की अवधि और अर्थव्यवस्था पर असर

पनगढ़िया ने एक अर्थशास्त्री के नजरिए से बताया कि तेल झटके की अवधि (कमोडिटी शॉक) के आधार पर घरेलू अर्थव्यवस्था खुद को कैसे समायोजित करेगी:


  • अल्पकालिक संकट (3 महीने से 1 वर्ष): इस स्थिति में रुपया अभी गिरेगा, लेकिन तेल आयात का बिल कम होने के बाद यह काफी हद तक वापस उबर जाएगा। इसके अलावा, विदेशी पूंजी भी ‘सस्ते’ रुपये का फायदा उठाने के लिए भारतीय बाजारों का रुख करेगी।

  • दीर्घकालिक संकट (1 वर्ष से अधिक): अगर आपूर्ति की यह चुनौती लंबे समय तक बनी रहती है, तो रुपये को गिरने देने के अलावा कोई भी अन्य कदम नुकसानदायक साबित होगा। रुपये को कृत्रिम रूप से बचाने की कोशिश केवल तब तक विदेशी मुद्रा भंडार को खाली करेगी, जब तक कि वह पूरी तरह से समाप्त न हो जाए।

एनआरआई जमा और डॉलर बॉन्ड सिर्फ ‘बैंड-एड’

मुद्रा को स्थिर करने के लिए विदेशी निवेशकों या एनआरआई के लिए विशेष ऋण उपकरण लाने के विचार पर भी पनगढ़िया ने अपनी असहमति जताई है। उनका मानना है कि डॉलर-मूल्य वाले बॉन्ड या उच्च ब्याज वाले एनआरआई डॉलर जमा केवल ‘बैंड-एड’ की तरह काम करेंगे और अंततः 100 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार करना ही पड़ेगा। उन्होंने इन उपकरणों को बेहद महंगा बताया, क्योंकि इन पर भारत द्वारा अपने विदेशी मुद्रा भंडार पर कमाए जाने वाले ब्याज से कहीं अधिक ब्याज चुकाना पड़ता है, जो मुख्य रूप से अमीर एनआरआई को धन हस्तांतरित करने जैसा है। 

‘यह 2013 नहीं है, हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत है’

मैक्रो-इकोनॉमिक (वृहद-आर्थिक) चिंताओं को दूर करते हुए वित्त आयोग के प्रमुख ने जोर देकर कहा कि आज देश की आर्थिक बुनियाद पिछले संकटों के मुकाबले बहुत अधिक मजबूत है। उन्होंने याद दिलाया कि 2013 में महंगाई दहाई के आंकड़े (डबल डिजिट) में थी, लेकिन आरबीआई के विवेकपूर्ण मौद्रिक प्रबंधन के कारण आज स्थिति वैसी नहीं है। 



पनगढ़िया का आकलन बताता है कि रुपये को कृत्रिम रूप से थामे रखने के लिए डॉलर बेचना या महंगे बॉन्ड जारी करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गलत कदम होगा। मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण आज भारतीय अर्थव्यवस्था रुपये की गिरावट से उत्पन्न होने वाले कुछ महंगाई के दबाव को आसानी से झेलने की स्थिति में है।



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