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Economy: ‘वैश्विक तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत’, आरबीआई गवर्नर ने चेताया बढ़ सकते हैं कर्ज और महंगाई


भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत की मैक्रोइकोनॉमिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और रक्षा खर्च वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

नीदरलैंड्स के एम्स्टर्डम में आयोजित FIMMDA‑PDAI के 25वें वार्षिक सम्मेलन में बोलते हुए मल्होत्रा ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत घरेलू खपत और लगातार सार्वजनिक निवेश का सहारा मिल रहा है। उन्होंने बताया कि सरकार के पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पर जोर से निजी निवेश को बढ़ावा मिला है और उत्पादन क्षमता का विस्तार हुआ है।

गवर्नर ने क्यों जताई चिंता?


  • गवर्नर ने वैश्विक स्तर पर जारी वित्तीय विस्तार और बढ़ते रक्षा खर्च को लेकर चिंता जताई।

  • उनके मुताबिक, इससे कई देशों की राजकोषीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।

  • साथ ही, उन्होंने तकनीकी क्षेत्र समेत कुछ परिसंपत्ति वर्गों में ऊंचे मूल्यांकन को भी बाजार के लिए संभावित खतरा बताया।

  • मल्होत्रा ने कहा कि सप्लाई चेन में व्यवधान और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर पहले ही आर्थिक गतिविधियों पर दिख रहा है।

  • उन्होंने चेताया कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है और सेकेंड-ऑर्डर महंगाई दबाव पैदा हो सकता है।

 

सेकेंड-ऑर्डर महंगाई क्या है?

सेकेंड-ऑर्डर महंगाई वह स्थिति है, जब किसी शुरुआती झटके जैसे ईंधन, खाद्य पदार्थ या कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था में फैलने लगता है। शुरुआत में महंगाई कुछ चुनिंदा वस्तुओं तक सीमित रहती है, लेकिन समय के साथ इसका प्रभाव अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ने लगता है।

उदाहरण के तौर पर, अगर पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, तो परिवहन लागत बढ़ जाती है। इससे कंपनियों के लिए उत्पादन और सप्लाई करना महंगा हो जाता है। नतीजतन, वे अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा देती हैं। इसी तरह, कर्मचारी भी बढ़ती महंगाई के कारण ज्यादा वेतन की मांग करते हैं, जिससे कंपनियों की लागत और बढ़ती है और फिर कीमतें और ऊपर चली जाती हैं।

 

भारतीय वित्तीय बाजारों की क्या है स्थिति?

मल्होत्रा ने यह भी कहा कि भारतीय वित्तीय बाजारों में पिछले वर्षों में नीतिगत सुधारों के कारण परिपक्वता आई है, लेकिन अभी और सुधार की जरूरत है। आरबीआई वित्तीय बाजारों को और गहरा करने, भागीदारी बढ़ाने और संस्थागत ढांचे को मजबूत करने के प्रयास जारी रखेगा।



नीतिगत फैसलों में डेटा की भूमिका पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि ट्रेड रिपॉजिटरी को डेटा की गुणवत्ता और उपलब्धता बेहतर करनी होगी ताकि जोखिमों का बेहतर आकलन किया जा सके।

आर्थिक वृद्धि का क्या है अनुमान?

भारत की आर्थिक वृद्धि पर बात करते हुए गवर्नर ने बताया कि 2021-25 के दौरान देश की औसत विकास दर 8.2% रही है। 2025-26 में 7.6% और 2026-27 में 6.9% की वृद्धि का अनुमान है। उन्होंने यह भी कहा कि कॉरपोरेट बैलेंस शीट्स मजबूत हुई हैं और पिछले दो वर्षों में पूंजी बाजारों के जरिए फंड जुटाने में भी तेजी आई है, जो अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त समर्थन दे रही है।





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