प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए लोगों से सोना न खरीदने की अपील के बाद घरेलू आभूषण उद्योग ने अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (एआईजेजीएफ) ने इस मुद्दे पर सरकार को नए संरचनात्मक विकल्प सुझाए हैं। आइए सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और ज्वैलर्स ने विदेशी मुद्रा संकट से निपटने के लिए क्या ब्लूप्रिंट पेश किया है।
सवाल: पूरा मामला क्या है और पीएम मोदी ने क्या अपील की थी?
जवाब: पश्चिम एशिया युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आई बाधाओं को देखते हुए, प्रधानमंत्री ने रविवार को नागरिकों से अपील की थी कि वे देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सोने की खरीदारी को कुछ समय के लिए टाल दें।
सवाल: इस अपील पर ज्वैलर्स एसोसिएशन की क्या प्रतिक्रिया है?
जवाब: एआईजेजीएफ ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को लिखे एक पत्र में कहा है कि सरकार की चिंताएं और बढ़ता आयात बिल समझ में आता है, लेकिन खरीदारी को हतोत्साहित करने से आभूषण उद्योग का पूरा ढांचा तबाह हो सकता है। फेडरेशन का मानना है कि मांग को खत्म करने के बजाय घरेलू स्तर पर पड़े सोने को मुख्यधारा में लाना और उसकी रीसाइक्लिंग करना बेहतर समाधान है।
सवाल: अगर लोग सोना खरीदना टालते हैं तो उद्योग पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंकज अरोड़ा के अनुसार, ग्राहकों की धारणा में अचानक आए नकारात्मक बदलाव से दुकानों पर आवाजाही घटेगी और निर्माण के ऑर्डर धीमे हो जाएंगे। इसका सीधा असर इस क्षेत्र से जुड़े 3.5 करोड़ लोगों की आजीविका पर पड़ेगा, जिनमें मुख्य रूप से छोटे ज्वैलर्स और कारीगर शामिल हैं। अरोड़ा ने स्पष्ट किया कि, “यह केवल सोने के व्यापार का नहीं, बल्कि आजीविका का मुद्दा है”।
सवाल: भारत में सोने की खरीदारी को लेकर क्या धारणा है?
जवाब: भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल एक लग्जरी नहीं है, बल्कि यह शादियों की संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा और ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी का अहम साधन है। फेडरेशन के अनुसार, लाखों भारतीय परिवारों के लिए आभूषण कोई सट्टेबाजी नहीं है, बल्कि यह पहनने योग्य रूप में बचत है।
सवाल: विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एआईजेजीएफ ने क्या समाधान दिए हैं?
जवाब: उद्योग की आजीविका बचाते हुए आयात कम करने के लिए फेडरेशन ने सरकार को कई अहम सुझाव दिए हैं:
- GIFT-IFSC या इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज इकोसिस्टम के तहत एक ‘समर्पित बुलियन बैंक’ की स्थापना की जाए, जो घरेलू सोने को जुटाने, मानकीकृत करने और उधार देने का काम करे।
- गोल्ड ईटीएफ को इस बुलियन बैंक ढांचे के माध्यम से अपनी भौतिक होल्डिंग का 20-30 प्रतिशत हिस्सा उधार देने की अनुमति मिले।
- 2015 की ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’ में सुधार किया जाए, जो संरचनात्मक कमियों के कारण अब तक बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो पाई है।
- सोने के इंट्रा-सिस्टम ट्रांसफर के लिए टैक्स और जीएसटीको न्यूट्रल रखा जाए।
सवाल: इन सुझावों से अर्थव्यवस्था को क्या फायदा होगा?
जवाब: भारत के पास निजी तौर पर रखे गए सोने का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है। फेडरेशन का अनुमान है कि अगर एक सही बुलियन बैंक ढांचा तैयार होता है, तो इससे समय के साथ सोने के आयात पर देश की निर्भरता सालाना 200 से 300 टन तक कम हो सकती है। इससे रोजगार भी बचेगा और विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी। विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन घरेलू सोने को मुख्यधारा में लाकर इसे बिना आजीविका को नुकसान पहुंचाए हासिल किया जा सकता है। एआईजेजीएफ ने अब सरकार से इस दिशा में एक अंतर-मंत्रालयी बैठक बुलाने का आग्रह किया है।



