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HORMUZ से BAB-AL-MANDEB तक: समुद्री संकट में फंसा पाकिस्तान


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oi-Keshav Karna

होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर लाल सागर और बाब-अल-मंदेब तक फैला समुद्री क्षेत्र पाकिस्तान के लिए आर्थिक रूप से बेहद अहम है। तेल और ऊर्जा आपूर्ति, विदेशी व्यापार के साथ-साथ हजारों पाकिस्तानी नाविकों की रोजी-रोटी भी इन्हीं रास्तों से जुड़ी है। लेकिन इन जलमार्गों पर बढ़ते तनाव ने इस्लामाबाद के सामने एक कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस समुद्री क्षेत्र पर उसके इतने बड़े हित टिके हैं, वहां संकट की घड़ी में वह अपने नागरिकों की हिफाजत के लिए कितना कुछ खुद कर पाने की स्थिति में है।

ईरान और अमेरिका के बीच तनातनी ने होर्मुज से लेकर लाल सागर तक समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। शिपिंग कंपनियां सतर्क हो गई हैं, बीमे की दरें ऊपर जा रही हैं और क्षेत्र में तैनात नौसेनाएं हाई अलर्ट पर हैं। दक्षिणी लाल सागर और अदन की खाड़ी से गुजरने वाले व्यापारिक जहाज लगातार खतरे के साये में सफर कर रहे हैं।

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अगस्त में हुआ हमला इस लिहाज से किसी अकेली घटना जैसा नहीं है, बल्कि 2026 में ईरान-अमेरिका तनाव की उस बड़ी तस्वीर का हिस्सा है, जिसका असर अब होर्मुज जलडमरूमध्य तक पहुंच चुका है। इसी बीच हूती विद्रोहियों ने भी दक्षिणी लाल सागर और अदन की खाड़ी से गुजरने वाले कार्गो जहाजों को दोबारा निशाना बनाना शुरू कर दिया है। गाजा में अक्टूबर 2025 के युद्धविराम के दौरान हूती हमलों में कुछ राहत मिली थी, लेकिन क्षेत्र में ताजा सैन्य तनाव के बाद व्यापारिक जहाज एक बार फिर जद में आ गए हैं।

इसी दौर में तंजानिया के झंडे वाले कार्गो जहाज Tihamah पर हमला हुआ, जिस पर सवार पाकिस्तानी नाविक किसी जंग का हिस्सा नहीं थे, फिर भी एक ऐसे क्षेत्रीय टकराव की चपेट में आ गए जिससे उनका सीधा कोई वास्ता नहीं था।

इस घटना ने एक ऐसी हकीकत को भी उघाड़ दिया है, जिस पर आम तौर पर कम ही बात होती है। लाल सागर, अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था में पाकिस्तान की भागीदारी तो है, मगर वहां की पूरी सुरक्षा व्यवस्था उसके हाथ में नहीं है।

पाकिस्तान Combined Maritime Forces (CMF) का सदस्य है और उसके नौसैनिक अधिकारी कई बार अलग-अलग टास्क फोर्स की कमान भी संभाल चुके हैं। 2026 में भी पाकिस्तान को CMF की टास्क फोर्स CTF-150 की कमान सौंपी गई थी। इसके बावजूद इस पूरे सुरक्षा ढांचे में अमेरिका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों की नौसेनाओं की भूमिका कहीं ज्यादा अहम बनी हुई है। CMF का मुख्यालय बहरीन में है और क्षेत्र से जुड़े बड़े सुरक्षा फैसले पाकिस्तान अकेले नहीं लेता। अमेरिका का NAVCENT समुद्री सुरक्षा को लेकर जो अलर्ट और निर्देश जारी करता है, उनका सीधा असर जहाजों की आवाजाही पर पड़ता है। यानी पाकिस्तान इस व्यवस्था का हिस्सा तो है, लेकिन इसकी दिशा तय करने वाला देश नहीं है।

पाकिस्तानी नौसेना का ज्यादातर ध्यान अरब सागर और उसके आसपास के इलाकों पर ही केंद्रित रहता है। उसके पास इतनी बड़ी और स्थायी क्षमता नहीं है कि वह लाल सागर जैसे दूर के इलाके में लंबे समय तक अपने बलबूते बड़ा सुरक्षा अभियान चला सके। मार्च 2026 में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के बाद शुरू किया गया ऑपरेशन मुहाफिज-उल-बहर भी मुख्य रूप से पाकिस्तान से जुड़े व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा तक ही सीमित रहा। दूसरी तरफ हजारों पाकिस्तानी नाविक ऐसे अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों पर काम करते हैं जो अक्सर विदेशी झंडों के तहत चलते हैं और उन्हें लाल सागर व अदन की खाड़ी जैसे जोखिम भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है। ऐसे किसी जहाज पर हमला होने और उसमें पाकिस्तानी नागरिकों के फंसने की स्थिति में इस्लामाबाद के पास सीधी कार्रवाई के विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं।

Tihamah जैसी घटनाओं के बाद पाकिस्तान की भूमिका मोटे तौर पर कूटनीतिक और मानवीय मदद तक ही सिमट जाती है – सरकार विरोध दर्ज करा सकती है, पीड़ित परिवारों को सहायता दे सकती है और संबंधित देशों से संपर्क साध सकती है। लेकिन किसी हमले को रोकने या संकट के वक्त तुरंत अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उसे क्षेत्र में मौजूद दूसरी नौसेनाओं और बहुराष्ट्रीय सुरक्षा बलों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

यह मसला सिर्फ एक जहाज या तीन नाविकों की मौत तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था विदेशी व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर काफी हद तक निर्भर है, और विदेश में काम करने वाले पाकिस्तानी नागरिक भी देश की अर्थव्यवस्था में अच्छा-खासा योगदान देते हैं। कराची और ग्वादर से जुड़े व्यापारिक हित भी हिंद महासागर और उससे आगे लाल सागर के रास्तों से प्रभावित होते हैं, इसलिए होर्मुज में तनाव बढ़े या बाब-अल-मंदेब के आसपास कोई हमला हो, उसका असर घूम-फिरकर पाकिस्तान तक पहुंच ही जाता है।

पाकिस्तान अपनी नौसेना के आधुनिकीकरण, नए युद्धपोतों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री अभियानों में भागीदारी को अक्सर अपनी बढ़ती ताकत के तौर पर पेश करता रहा है। लेकिन किसी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का हिस्सा होना और अपने दम पर समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित कर पाना – ये दोनों बातें अलग हैं, और Tihamah पर हुए हमले ने इसी फर्क को एक बार फिर सामने ला दिया है।



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