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Labour Crisis: क्या भारत में खत्म हो जाएंगे प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन? जानिए श्रम बाजार में चल क्या रहा?


दुनिया में इस वक्त एक बड़ा ढांचागत बदलाव हो रहा है, जहां ‘व्हाइट कॉलर’ (सफेदपोश) कर्मचारियों की अधिकता है, लेकिन ‘ब्लू कॉलर’ यानी प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई और नर्स जैसे पेशेवरों की भारी कमी देखी जा रही है। मैक्रो ट्रेंड्स रिसर्च फर्म पाइनट्री के संस्थापक रितेश जैन की एक हालिया भविष्यवाणी ने बाजार में चर्चा छेड़ दी है कि अगले पांच वर्षों में भारत में इंजीनियरों से पहले प्लंबरों और इलेक्ट्रीशियन की कमी हो सकती है। लेकिन क्या वाकई ऐसा होने वाला है? आइए इस बिजनेस एक्सप्लेनर के जरिए पूरे परिदृश्य को समझते हैं।

सवाल: क्या सच में भारत में कामगारों का अकाल पड़ने वाला है?

जवाब: यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे अमीर देश अपनी बढ़ती उम्र की आबादी और गिरती जन्म दर की वजह से भारी श्रम संकट से जूझ रहे हैं। अपनी अर्थव्यवस्था को सुचारू रखने के लिए वे भारत जैसे देशों से बड़े पैमाने पर कामगारों की भर्ती कर रहे हैं। भारत सरकार ने भी यूके समेत कई देशों के साथ कुशल श्रमिकों को भेजने के समझौते किए हैं। हालांकि, जानकारों का स्पष्ट कहना है कि भारत में कार्यबल (वर्कफोर्स) की कोई कमी नहीं है, बल्कि विदेशों की यह मांग केवल भारतीय श्रमिक ही पूरी कर सकते हैं। 

सवाल: अगर विदेशों में इतनी मांग है, तो क्या भारत स्किल कैपिटल बन पाएगा?

जवाब: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा कार्यबल है और भारत को दुनिया की ‘स्किल कैपिटल’ (कौशल राजधानी) के रूप में उभरना चाहिए। सरकार का लक्ष्य केवल घरेलू मांग पूरी करना नहीं है, बल्कि युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षित कर वैश्विक रोजगार के लिए तैयार करना है। मजबूत श्रम कानून और बेहतर कार्य संस्कृति के कारण भी भारतीय कामगार विदेशों का रुख कर रहे हैं। 

सवाल: तो क्या हमारे देश में बुनियादी काम करने वाले नहीं बचेंगे?

जवाब: नहीं, ऐसा नहीं है। हमारे देश में कामगारों की कोई कमी नहीं होगी, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ‘कौशल’ (स्किल) की है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में 85 प्रतिशत से अधिक लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और केवल 4.69 प्रतिशत लोगों ने ही औपचारिक प्रशिक्षण (डिग्री या कोर्स) प्राप्त किया है। हर साल 1.2 करोड़ लोग वर्कफोर्स में शामिल होते हैं, लेकिन हमारी वर्तमान ट्रेनिंग क्षमता सिर्फ 34 लाख प्रति वर्ष है। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले अधिकांश कामगार पारिवारिक रूप से काम सीखते हैं और वे खाड़ी देशों में असुरक्षा की भावना के कारण विदेश जाने से बचते हैं या जल्दी लौट आते हैं। 

सवाल: बाजार की इस चुनौती का सीधा समाधान क्या है?

जवाब: इस समस्या का सबसे बड़ा समाधान फॉर्मल स्टाफिंग इंडस्ट्री है। यह इंडस्ट्री असंगठित मजदूरों को औपचारिक सेक्टर में लाकर उन्हें ट्रेनिंग, स्किल डेवलपमेंट और बेहतर प्लेसमेंट दे सकती है। नारेडको महाराष्ट्र की वरिष्ठ उपाध्यक्ष मंजू याग्निक के अनुसार, रियल एस्टेट सहित हर क्षेत्र में कुशल श्रमिकों की कमी एक बड़ी चुनौती है, जिसे ट्रेनिंग के जरिए ही दूर किया जा सकता है। इसके अलावा, भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि भविष्य में श्रमिकों को विदेश जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि उन्हें अपने देश में ही प्रचुर और सुरक्षित काम मिल सकेगा। 

सवाल: तो अंतिम निष्कर्ष क्या?

जवाब: भारत के सामने कामगारों की संख्या का नहीं, बल्कि ‘कुशल कामगारों’ की कमी का संकट है। यदि स्टाफिंग कंपनियां और सरकार मिलकर ट्रेनिंग की रफ्तार बढ़ाते हैं, तो भारत न केवल अपनी घरेलू मांग (खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट) को पूरा करेगा, बल्कि मजबूती से दुनिया की स्किल कैपिटल भी बन सकेगा।



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