US Iran peace Talks: पश्चिम एशिया में शांति की बहाली के लिए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ इस्लामाबाद के लिए रवाना हो गए हैं। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरान के साथ बातचीत में शामिल होना है। सालों बाद अमेरिका और ईरान के बीच इस स्तर की कूटनीतिक हलचल देखी जा रही है।
रवानगी से पहले वेंस ने उम्मीद जताई कि यह बातचीत सकारात्मक रहेगी, लेकिन साथ ही उन्होंने ईरान को कड़ी चेतावनी भी दी है। यह मिशन न केवल संघर्षविराम को मजबूत करने के लिए है, बल्कि क्षेत्र में लंबी शांति स्थापित करने की एक बड़ी कोशिश है।
JD Vance Pakistan visit: ‘सीधे काम करो या नतीजा भुगतो’
विमान पर सवार होने से पहले जेडी वेंस ने बहुत ही नपे-तुले लेकिन सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने साफ कहा कि अगर ईरान नेक नीयती के साथ बातचीत की मेज पर आता है, तो अमेरिका हाथ मिलाने को तैयार है। लेकिन अगर उन्होंने किसी भी तरह की ‘चालबाजी’ या धोखा देने की कोशिश की, तो अमेरिकी दल बहुत सख्त रुख अपनाएगा। वेंस ने स्पष्ट कर दिया कि वे वहां सिर्फ बात करने नहीं, बल्कि ठोस नतीजे निकालने जा रहे हैं और वे किसी के दबाव में नहीं आएंगे।
भले ही दोनों पक्ष मेज पर आने को तैयार हैं, लेकिन शांति की इस कोशिश पर ग्रहण लगने का खतरा भी बरकरार है। दरअसल, संघर्षविराम की शर्तों को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच गहरी असहमति है। ईरान का मानना है कि लेबनान में इजरायली युद्ध को रोकना इस समझौते का हिस्सा है, जबकि ट्रंप और नेतन्याहू ने इससे साफ इनकार कर दिया है। इसके अलावा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने का मुद्दा भी आग में घी डालने का काम कर रहा है, जो वार्ता को पटरी से उतार सकता है।
इस्लामाबाद में कूटनीति का ‘महाकुंभ’
इस बातचीत के लिए अमेरिका ने अपनी सबसे मजबूत टीम उतारी है। जेडी वेंस के साथ जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ जैसे अनुभवी और राष्ट्रपति ट्रंप के करीबी लोग शामिल हैं। यह टीम दर्शाती है कि वाशिंगटन इस बार समझौते को लेकर कितना गंभीर है। इस्लामाबाद इस समय पूरी दुनिया की नजरों का केंद्र बन गया है, क्योंकि यहीं से तय होगा कि मध्य-पूर्व में युद्ध की आग ठंडी होगी या एक बार फिर तनाव का नया दौर शुरू होगा।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के लिए यह दौरा उनकी राजनीतिक क्षमताओं की सबसे बड़ी परीक्षा है। बहुत कम समय में राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर पहुंचे वेंस को एक ऐसे मुद्दे को सुलझाने की जिम्मेदारी मिली है, जहां दशकों से कूटनीति फेल होती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि वेंस का कम अनुभवी होना उनके लिए एक मौका भी है, क्योंकि वे पुरानी कड़वाहटों से हटकर नई सोच के साथ ईरान से बात कर सकते हैं। हालांकि, ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को निभाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा।
Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है, ‘सत्ता का रास्ता आंकड़ों की गलियों से होकर गुजरता है।’ लेकिन ये आंकड़े सिर्फ वोट नहीं, बल्कि एक ऐसा अभेद्य किला हैं जिसे ढहाना भाजपा के लिए अब भी एक पहेली बना हुआ है।
294 सीटों वाली विधानसभा में आखिर क्यों 112 सीटें ही तय कर देती हैं कि ‘दीदी’ की वापसी होगी या नहीं? आइए, 2021 और 2024 के नतीजों के जरिए समझते हैं उस मुस्लिम फैक्टर और जमीनी रणनीति का सच, जिसने बंगाल को भाजपा के लिए ‘टेढ़ी खीर’ बना दिया है।
बंगाल का चुनावी गणित: आंकड़े जो तय करते हैं रायटर्स बिल्डिंग का रास्ता
2016 से 2024 तक, बंगाल की राजनीति में भाजपा ने लंबी छलांग तो लगाई, लेकिन सवाल यह उठता है कि सत्ता की दहलीज तक पहुंचते-पहुंचते उनके कदम हर बार क्यों ठिठक जाते हैं? जवाब छिपा है बंगाल के सामाजिक समीकरणों में। जहां 30% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली 89 सीटों में से 87 पर TMC का कब्जा हो, वहां चुनाव की हार-जीत वोटिंग से पहले ही तय दिखने लगती है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दबदबा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि एक मजबूत सामाजिक और गणितीय समीकरण पर आधारित है। पिछले चुनावों के आंकड़े साफ बताते हैं कि यह समीकरण ही पार्टी को लगातार सत्ता तक पहुंचा रहा है।
मुस्लिम वोट: जीत की सबसे बड़ी चाबी
राज्य की 294 विधानसभा सीटों में सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। इनमें से 87 सीटें डायरेक्ट और 25 सीटें इनडायरेक्टली अर्थात 112, सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्नायक यानी कि 25% से अधिक हैं। 2021 के चुनाव में TMC ने इन 87 में 85 और 112 में से 106 सीटों पर कब्जा जमाया था। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 50% से ज्यादा है, जबकि दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में यह 35% से अधिक है। 30% से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली 89 सीटों में से 87 सीटें TMC के खाते में गईं। 2021 में TMC को मुस्लिम वोटों का करीब 75% समर्थन मिला, जो 2016 के 70% से अधिक था। इसके उलट भाजपा इन इलाकों में लगभग शून्य पर सिमट गई।
चुनावी ट्रेंड: आंकड़ों में TMC की बढ़त
पश्चिम बंगाल का चुनावी परिदृश्य पिछले एक दशक में तीव्र ध्रुवीकरण और रणनीतिक वोट-स्विंग का गवाह रहा है। आंकड़ों का विश्लेषण करें तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ताकत उसके निरंतर बढ़ते वोट शेयर में निहित है, जो 2016 के 44.91% से बढ़कर 2021 में 48.02% के शिखर पर पहुंच गया। इसके विपरीत, भाजपा का उत्थान 2019 के लोकसभा चुनावों में एक ‘ब्रेकथ्रू’ के रूप में दिखा, जहां पार्टी ने 40.6% वोट शेयर के साथ 18 सीटें जीतकर TMC को कड़ी चुनौती दी थी। 2016 से 2019 के बीच भाजपा का वोट शेयर 30% से ज्यादा बढ़ा, जिसका बड़ा कारण वाम और कांग्रेस के वोटों का ट्रांसफर था। CAA-NRC जैसे मुद्दों ने मटुआ और राजबंगशी समुदाय को भाजपा की ओर आकर्षित किया था।
हालांकि, हालिया रुझान बताते हैं कि भाजपा का ग्राफ 37-38% के दायरे में स्थिर हो गया है, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में TMC ने 2024 के लोकसभा चुनावों में 45% वोट शेयर के साथ 29 सीटें जीतकर अपने दुर्ग को पुनः अभेद्य बना लिया है। भाजपा के वोट शेयर में लगभग 3% की गिरावट छोटी लग सकती है, लेकिन फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम में इस 3% की कमी और TMC के 5% की बढ़त ने सीटों के अंतर को 138 (215 vs 77) तक पहुंचा दिया।
‘खेला होबे’ – 2021 में दीदी ने कैसे पलटा गेम?
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतने के साथ-साथ, वोट-शेयर के मामले में भी टीएमसी के काफी करीब पहुंच गई थी। 2019 में CAA आने के बाद भाजपा मतुआ समुदाय के भरोसे बंगाल की सत्ता पर आसीन होने को उतावली हो रही थी। दूसरी तरफ, शारदा-नारदा के बाद तृणमूल एंटी-इकंबेंसी, भ्रष्टाचार और हिंसा के आरोपों से जूझ रही थी।
2021 में तृणमूल की वापसी का कारण केवल दीदी के चोट से उपजी सहानुभूति नहीं थी। 74 सीटिंग विधायकों का टिकट काट कर दीदी ने एंटी-इंकंबेंसी को लोकल लेवल पर ही कम कर दिया। मां, माटी, मानुष – बंगाली अस्मिता का सवाल उठाया, ‘जय श्री राम’ के नारे के बदले ‘जय मां दुर्गा’ का नारा दिया और बीजेपी के आक्रामक स्लोगनियरिंग को बंगाली संस्कृति के विरुद्ध बताया। बंगाली बनाम बाहरी अभियान के साथ ही लक्ष्मीर भंडार जैसी वेलफेयर स्कीम ने भी दीदी की वापसी में भूमिका निभाई। दुआरे सरकार जैसी योजना के माध्यम से प्रशासन को लोगों के दरवाजे तक पहुंचाकर TMC ने भाजपा के ‘भ्रष्टाचार’ वाले नैरेटिव को ‘सर्विस डिलीवरी’ से दबाने में कामयाब रही थी।
दूसरी तरफ अति-आत्मविश्वास की शिकार बीजेपी दीदी पर हमलावर रही जो बंगाली भद्रलोक को पसंद नहीं आया। ममता पर प्रधानमंत्री मोदी का ‘दीदी ओ दीदी’ तंज बैकफायर कर गया। न तो हिंदु वोटों का ध्रुवीकरण हुआ ना ही भगवा पार्टी बडे मतदाता समूह में अपना नियो-वोटर ग्रुप बना पाई। और तो और, टीएमसी से निकाले गए नेताओं को टिकट देकर भाजपा ने कार्यार्ताओं का भरोसा भी खो दिया। नतीजन ‘बंगाल-फतह’ का सपना तो टूटा ही, पार्टी का वोट-शेयर भी कम हो गया।
TMC की ताकत: सिर्फ वोट नहीं, पूरा इकोसिस्टम
तृणमूल कांग्रेस (TMC) की राजनीतिक सफलता का रहस्य केवल चुनावी गणित में नहीं, बल्कि उसके संगठनात्मक ढांचे और प्रशासनिक पकड़ के बीच गहरे तालमेल में छिपा है। न केवल अल्पसंख्यक वोट-बैंक या बोहिरागोतो बनाम बंगाल की बेटी नैरेटिव ही नहीं बल्कि पार्टी ने ‘लक्ष्मीर भंडार’ और ‘कन्याश्री’ जैसी लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के जरिए एक ऐसा वफादार महिला वोट बैंक तैयार किया है, जो सामाजिक सुरक्षा के लिए सीधे सरकार पर निर्भर है। इसके साथ ही, टीएमसी का संगठन राज्य के सुदूर गांवों तक Micro-level network की तरह फैला हुआ है, जहां बूथ स्तर के कार्यकर्ता और स्थानीय प्रशासन मिलकर पार्टी के ‘ग्राउंड गेम’ को अभेद्य बनाते हैं। यही कारण है कि भाजपा की राष्ट्रीय लहर और बड़े संसाधन भी बंगाल के इस जमीनी किले को भेदने में अक्सर नाकाम साबित होते हैं।
ममता की रणनीति: बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय
2021 चुनाव में टीएमसी का सबसे प्रसिद्ध नारा था, ‘बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय’ यानी कि बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है। इसने चुनाव को एक स्थानीय महिला (ममता) बनाम दिल्ली के शक्तिशाली पुरुषों (मोदी-शाह) की लड़ाई में बदल दिया। इसने महिला वोटरों के बीच एक रक्षात्मक भावना पैदा की, जिससे वे पार्टी लाइनों से ऊपर उठकर ममता के साथ खड़ी हो गईं। इस नैरेटिव ने उन बंगाली Elite और Middle Class वोटरों को भाजपा से दूर कर दिया, जो प्रशासन से नाराज तो थे, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने को तैयार नहीं थे। यही कारण था कि अल्पसंख्यक वोटों से इतर, भ्रष्टाचार (सारदा, नारदा), हिंसा और कोविड प्रबंधन पर सवालों के बावजूद TMC ने 2021 में 60% हिंदू बहुल सीटों (182 में 109) पर जीत हासिल की।
टीएमसी अपने इस टेस्टेड फॉर्मूले पर ही इस बार भी बढ रही है। 99 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट तो सुनिश्चित है ही जो करीब 100 सीटों पर पार्टी की जीत तय कर सकती है और बहुमत के लिए शेष सीटों के लिए ममता बनर्जी ने इस बार भी बंगाली अस्मिता, बोहिर्गोतो, कल्याण योजना के साथ-साथ दिल्ली बनाम कोलकाता की जंग का चक्रव्यूह बुन चुकी है।
भाजपा के हथियार से भाजपा को मात देने की तैय्यारी
जैसे भाजपा ने 2019 और 2024 में नारा दिया था कि उम्मीदवार नहीं प्रधानमंत्री मोदी को देखिए, ठीक उसी तरह दीदी भी इस बार बीजेपी के हथियार से ही बीजेपी के शिकार करने की योजना बना रही है। तृणमूल ने इस बार नारा दिया है, ‘हर सीट से ममता दीदी’। यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ‘मास्टरस्ट्रोक पलटवार’ की तरह देखा जा रहा है। टीएमसी ने भाजपा के ‘चेहरा-आधारित चुनाव’ (Presidential-style campaign) के हथियार को ही भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है।
जब चुनाव ‘उम्मीदवार’ के बजाय ‘सर्वोच्च नेता’ पर केंद्रित हो जाता है, तो स्थानीय विधायकों या सांसदों के प्रति जनता की नाराजगी गौण हो जाती है। ममता बनर्जी की छवि आज भी बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में untainted मानी जाती है, जबकि उनके कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। ‘हर सीट पर दीदी’ बोलकर पार्टी स्थानीय नेताओं की गलतियों को ममता के व्यक्तित्व के पीछे छिपाने की कोशिश कर रही है।
2026 में भागवा दल की चुनौतियां
भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में ‘सत्ता की राह’ केवल ध्रुवीकरण पर नहीं, बल्कि संगठनात्मक गहराई और नेतृत्व की स्वीकार्यता पर टिकी है। 2021 के आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा हिंदू-बहुल क्षेत्रों में भी तब तक बहुमत नहीं पा सकती, जब तक वह ममता बनर्जी के व्यक्तिगत ‘ब्रांड’ और ग्रामीण नेटवर्क की काट नहीं ढूंढ लेती। बंगाल में भाजपा की चुनौतियों को तीन प्वाइंट्स में समझ सकते हैं:
स्थानीय चेहरे का अभाव – बंगाल में चुनाव अक्सर ‘ममता बनाम कौन?’ पर टिक जाता है। मोदी-शाह के चेहरे वोट तो दिलाते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए एक बंगाली चेहरे की कमी भाजपा को ‘बाहरी’ साबित करने में TMC की मदद करती है।
आंतरिक असंतोष – पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं (Old Guard) और TMC से आए नए नेताओं के बीच तालमेल की कमी ने पार्टी के जमीनी काम को प्रभावित किया है। टिकट बंटवारे में ‘आयातित’ नेताओं को प्राथमिकता देना कैडर को निराश करता है। हालांकि भाजपा इस बार काफी फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है और टिकट बंटवारे में भाजपा कार्यकर्त्ताओं के साथ-साथ क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान रखा है।
संगठनात्मक शून्य – भाजपा का ‘बूथ प्रबंधन’ अभी भी TMC के दशकों पुराने नेटवर्क के सामने कमजोर है। चुनाव के दिन मतदाताओं को बूथ तक लाने और सुरक्षा सुनिश्चित करने में पार्टी को संघर्ष करना पड़ता है। खासकर, सुदूर ग्रामीण अंचल में भगवा दल की यह कमजोरी अंततः तृणमूल का मार्ग प्रशस्त करती है।
भाजपा ने 182 हिंदू-बहुल सीटों में से केवल 72 जीतीं। इसका मतलब है कि 60% हिंदू-बहुल सीटों पर भी ममता बनर्जी की पकड़ मजबूत है। भाजपा की असल चुनौती मुस्लिम वोट नहीं, बल्कि उस ‘सेक्युलर हिंदू’ और ‘महिला’ वोटर को जीतना है जो भाजपा की आक्रामकता से डरता है।
बीजेपी के लिए उम्मीद की किरण
1. मटुआ और राजबंगशी कार्ड (CAA का क्रियान्वयन) उत्तर बंगाल और दक्षिण के कुछ हिस्सों में मटुआ समुदाय निर्णायक है। CAA के नियमों को लागू करना भाजपा के लिए अपनी साख बचाने जैसा है। यदि पार्टी इस समुदाय का पूर्ण विश्वास जीत लेती है, तो वह 30-40 सीटों पर अपनी बढ़त पक्की कर सकती है।
2. महिला वोट बैंक में सेंध TMC का सबसे बड़ा हथियार ‘लक्ष्मीर भंडार’ है। भाजपा को इसके मुकाबले न केवल एक बड़ा आर्थिक वादा करना होगा, बल्कि महिला सुरक्षा (संदेशखाली जैसे मुद्दे) को बंगाली अस्मिता से जोड़कर महिलाओं के बीच ‘डर’ को ‘बदलाव की इच्छा’ में बदलना होगा।
3. सुवेंदु अधिकारी और ‘माटी का लाल’ रणनीति सुवेंदु अधिकारी आज भाजपा के सबसे मुखर बंगाली चेहरे हैं। भाजपा को उन्हें एक ‘क्षेत्रीय सेनापति’ के रूप में और अधिक स्वायत्तता देनी होगी ताकि वे ‘बोहिरागोतो’ (बाहरी) वाले नैरेटिव को खत्म कर सकें। सुवेंदु के साथ ही इस बार दिलीप घोष भी मैदान में डटे हैं और कोई ‘मुकुल रॉय’ नहीं है।
4. संदेशखाली की घटना 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ बनकर उभरी थी। भाजपा ने इसे ‘महिला सुरक्षा’ और ‘ममता बनर्जी की विफल कानून व्यवस्था’ के प्रतीक के रूप में पेश किया और इसका आंशिक लाभ भी बीजेपी को मिला था। इस चुनाव में भाजपा आरजीकर पीडिता की मां को टिकट देकर तृणमूल के खाते से कुछ महिला वोट खिसकाने की उम्मीद कर रही है।
क्या 2026 में बदलेगा बंगाल समीकरण?
बंगाल का चुनावी गणित फिलहाल TMC के पाले में नज़र आता है। भ्रष्टाचार के आरोप, हिंसा की खबरें और जबरदस्त एंटी-इनकंबेंसी; इसके बावजूद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) का ग्राफ नीचे गिरने के बजाय ऊपर बढ रहा है? अभी तक भाजपा का ‘ध्रुवीकरण’ का दांव बंगाल की माटी पर बेअसर साबित हो रहा है। हमायूं कबीर के स्टिंग में बीजेपी से पैसे लेने वाली वीडियो वायरल होने और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का उनसे गठबंधन तोडने के बाद मुस्लिम वोट-बैंक के बंटने का कोई डर नहीं रह गया है।
उधर, भाजपा के लिए चुनौती साफ है – अगर हिंदू वोट 80% से ज्यादा एकजुट नहीं होते और लोकल स्ट्रक्चर मजबूत नहीं होता, तो सत्ता परिवर्तन मुश्किल बना रहेगा। मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के बाद बीजेपी की कुछ उम्मीदे जरूर बढी होंगी लेकिन आंकड़े बताते हैं कि बंगाल में चुनाव सिर्फ मुद्दों से नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण और वोट मैनेजमेंट से जीते जाते हैं।
IPL 2026, LSG vs KKR: ईडन गार्डन्स के मैदान पर गुरुवार को मुकुल चौधरी नाम का ऐसा तूफान आया, जिसने कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) के अरमानों पर पानी फेर दिया। लखनऊ सुपर जायंट्स (LSG) के इस युवा फिनिशर ने 200 की स्ट्राइक रेट से बल्लेबाजी करते हुए हारी हुई बाजी पलट दी। इस धमाकेदार प्रदर्शन के बाद मुकुल ने दुनिया को बताया कि आखिर वो किस खिलाड़ी के वीडियो देखकर मैच फिनिश करना सीख रहे हैं।
मुकुल चौधरी ने जियोहॉटस्टार (JioHotstar) पर एमएस धोनी के प्रति अपनी दीवानगी जाहिर की। उन्होंने साफ़ कहा कि उनका लक्ष्य टीम इंडिया के सबसे सफल कप्तान की तरह मैदान पर ‘कूल’ रहकर मैच खत्म करना है।
‘मैं भी उनकी तरह बनना चाहता हूं’
मुकुल चौधरी ने कहा, ‘मैं हमेशा एमएस धोनी को अपना आदर्श मानता हूं क्योंकि मैं भी एक फिनिशर हूं। मैं हमेशा उनसे प्रेरणा लेता हूं। उनका ‘हेलीकॉप्टर शॉट’, जो कि बहुत मशहूर है, मेरा पसंदीदा है। जिस तरह से उन्होंने 2011 वर्ल्ड कप में भारत की कप्तानी की थी, वह हर किसी को याद है। मैं भी उनकी तरह बनना चाहता हूं, मैचों को फिनिश करना चाहता हूं और अपनी टीम को जीत दिलाने में मदद करना चाहता हूं।’
मुकुल की कामयाबी के पीछे उनके पिता का वो बलिदान है, जिसे सुनकर हर कोई भावुक हो जाए। एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले मुकुल के पिता खुद क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन आर्थिक तंगी ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने ठान लिया था कि जो वो नहीं कर सके, वो उनका बेटा करेगा।
मुकुल ने बताया कि उनके पिता राजस्थान एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (RAS) की तैयारी कर रहे थे, लेकिन बेटे के करियर के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई और सरकारी अफसर बनने का सपना बीच में ही छोड़ दिया। उन्होंने प्रॉपर्टी का काम शुरू किया ताकि मुकुल की एकेडमी की फीस भरी जा सके। साल 2015 में मुकुल के जन्मदिन पर उनके पिता उन्हें लेकर सीकर, चूरू और झुंझुनू की खाक छानते रहे, तब जाकर उन्हें सही एकेडमी मिली और मुकुल का प्रोफेशनल सफर शुरू हुआ।
आंकड़ों में मुकुल का ‘विस्फोट’
पारी: 54 रन, 27 गेंद (स्ट्राइक रेट 200)
बाउंड्री: 7 गगनचुंबी छक्के और 2 चौके।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड मुकुल और आवेश खान के बीच हुई नाबाद 54 रनों की पार्टनरशिप IPL इतिहास में 8वें विकेट या उससे नीचे के लिए सफल रन चेज की सबसे बड़ी साझेदारी बन गई है। खास बात यह रही कि इस साझेदारी के 52 रन अकेले मुकुल के बल्ले से निकले।
मुकुल चौधरी: घरेलू क्रिकेट से IPL 2026 के ‘करोड़पति’ बनने तक का सफर
लखनऊ सुपर जायंट्स के नए मैच विनर मुकुल चौधरी ने बहुत कम समय में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। उनके करियर के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
घरेलू पहचान: मुकुल राजस्थान की ओर से घरेलू क्रिकेट खेलते हैं और एक बेहतरीन विकेटकीपर-बल्लेबाज के रूप में जाने जाते हैं।
अंडर-23 में जलवा: उन्होंने अंडर-23 लेवल पर अपने प्रदर्शन से सबको प्रभावित किया, जिसके बाद उनके लिए सीनियर टीम के दरवाजे खुले।
सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी का तूफान: साल 2025-26 की सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में मुकुल ने महज 5 पारियों में198.85 के स्ट्राइक रेट से 173 रन बनाकर तहलका मचा दिया था।
IPL ऑक्शन में लगी लॉटरी: उनके इसी विस्फोटक अंदाज को देखते हुए IPL 2026 की नीलामी में लखनऊ सुपर जायंट्स (LSG) ने उन पर बड़ा दांव लगाया और 2.60 करोड़ रुपये में अपनी टीम का हिस्सा बनाया।
T20 के स्पेशलिस्ट: मुकुल का टी20 रिकॉर्ड शानदार है; उन्होंने 10 मैचों में 164.70 की स्ट्राइक रेट और 46.66 की औसत से 280 रन बनाए हैं, जिसमें 21 छक्के शामिल हैं।
IPL 2026 में धमाकेदार डेब्यू: अब तक खेले 3 मैचों में उन्होंने 162.79 की स्ट्राइक रेट से 70 रन बनाए हैं, जिसमें KKR के खिलाफ उनकी मैच जिताऊ फिफ्टी (54* रन) सबसे यादगार रही है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को कहा कि सरकार महिला आरक्षण संशोधन और लोकसभा में सीटें बढ़ाने की बिल जल्दबाजी में ला रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान संसद सत्र बुलाना अचार संहिता का उल्लंघन है। सरकार बिल को जल्द से जल्द पास कराना चाहती है, ताकि आने वाले विधानसभा चुनावों में इसका फायदा मिल सके। आज दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की इस मुद्दे पर बैठक हुई। इसमें खड़गे ने कहा कि अब तक सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला है। जानकारी सिर्फ प्रधानमंत्री के लेटर के जरिए सामने आई है। लंबे समय तक चुप रहने के बाद अब अचानक इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाई जा रही है। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का सत्र बुलाया बुलाया है। इस दौरान संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी है। सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देने के साथ लोकसभा और विधानसभा सीटों में 50% तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव ला सकती है। इसके तहत लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 816 हो जाएगी। बैठक की चार मुख्य बातें… इसी बीच राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कांग्रेस महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध है। CWC की बैठक में महिला आरक्षण, परिसीमन और पश्चिम एशिया के हालात पर भी चर्चा हुई। एक दिन पहले सरकार ने ड्राफ्ट को मंजूरी दी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को कैबिनेट मीटिंग में नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के ड्राफ्ट बिल को मंजूरी दे दी थी। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 की जाएंगी, जिनमें 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। परिसीमन कानून में संशोधन के लिए अलग बिल लाएगी सरकार राज्यों की विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में सीटों का आरक्षण होगा। सरकार एक संशोधन बिल के एक संविधान साथ-साथ परिसीमन कानून में संशोधन के लिए अलग साधारण बिल भी लाएगी। ताकि नए सिरे से सीटों का निर्धारण हो सके। नई सीटों का निर्धारण 2027 की जनगणना के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर किया जा सकता है। यह कानून राज्यों की विधानसभाओं और दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया जाएगा। महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 सीटें बढ़ेंगी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है। 1931 में पहली बार महिला आरक्षण का मुद्दा उठा था 1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिला आरक्षण पर पहली बार चर्चा हुई, लेकिन प्रस्ताव अंततः खारिज कर दिया गया। बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया। 1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया। इसके कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया। 1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इसमें पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की सिफारिश की 1988: राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी। 1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है। ————————– ये खबर भी पढ़ें… 2029 चुनाव से पहले लागू होगा 33% महिला आरक्षण:लोकसभा सीटें बढ़कर 816 होंगी, महिला सांसदों की संख्या 273 तक पहुंचेगी केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने की तैयारी में है। इसके लिए संसद के मौजूदा सत्र में दो बिल लाए जा सकते हैं। इसके जरिए महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्त में बदलाव किया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…
Delhi Transplanted Trees: दिल्ली में पेड़ों के ट्रांसप्लांटेशन को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों के बीच अब सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। कम सर्वाइवल रेट की शिकायतों के बाद दिल्ली सरकार ने वैज्ञानिक तरीके से पूरे प्रोसेस की जांच कराने का फैसला किया है। इसके साथ ही विदेशों से नई और आधुनिक मशीनें लाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है, ताकि पेड़ों को शिफ्ट करने की प्रक्रिया को ज्यादा सुरक्षित और असरदार बनाया जा सके।
वैज्ञानिक स्टडी से खुलेगा पूरा सच
सरकार ने देहरादून स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (Forest Research Institute) को इस पूरे मामले पर विस्तृत अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी है। इस स्टडी को तीन महीने के भीतर पूरा करने के लिए कहा गया है, ताकि जल्द से जल्द रिपोर्ट के आधार पर नीतियों में बदलाव किए जा सकें।
असल में पहले की रिपोर्ट में यह सामने आया था कि ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ों का औसत सर्वाइवल रेट सिर्फ 35.45 प्रतिशत रहा है। वहीं 2019 से 2022 के बीच ट्रांसप्लांट किए गए 1357 पेड़ों में से केवल 578 ही जीवित रह पाए, यानी करीब 42.5 प्रतिशत सफलता दर।
क्यों मर रहे हैं ट्रांसप्लांटेड पेड़?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा तकनीक इस समस्या की बड़ी वजह है। अभी ज्यादातर मामलों में बैकहो लोडर जैसी मशीनों का इस्तेमाल होता है, जिससे पेड़ों की जड़ों को नुकसान पहुंचता है और ‘ट्रांसप्लांट शॉक’ के कारण पेड़ सूख जाते हैं।
इसके अलावा यह भी पाया गया कि कई एजेंसियां तय नियमों और टाइमलाइन का पालन नहीं कर रही हैं। ट्री प्रिजर्वेशन प्लान का सही तरीके से पालन न करना भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आया है।
अब आएंगी नई हाईटेक मशीनें
दिल्ली सरकार अब इस समस्या का हल तकनीक में देख रही है। इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया गया है, जिससे विदेशों से अत्याधुनिक ट्री ट्रांसप्लांटर मशीनें लाई जाएंगी।
इन मशीनों का इस्तेमाल पहले गुजरात में किया जा चुका है और ये मध्यम आकार के पेड़ों को बिना ज्यादा नुकसान पहुंचाए उखाड़ने में सक्षम हैं। अब यह देखा जाएगा कि दिल्ली की परिस्थितियों में ये मशीनें कितनी प्रभावी साबित होती हैं।
कौन से पेड़ बचते हैं ज्यादा, कौन से नहीं?
अध्ययन में यह भी सामने आया कि हर पेड़ ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त नहीं होता। पीपल, बरगद, गूलर, अर्जुन, अमलतास, सहजन, गुलमोहर और अल्स्टोनिया जैसे पेड़ों का सर्वाइवल रेट बेहतर पाया गया है और इन्हें 350 सेमी तक के आकार में भी ट्रांसप्लांट किया जा सकता है।
वहीं आम, जामुन, इमली, नीम और कटहल जैसे पेड़ों का सर्वाइवल रेट कम रहा है, खासकर जब उनका आकार बड़ा होता है। कुछ पेड़ जैसे शीशम, कीकर, खेजड़ी और अशोक 200 सेमी से ज्यादा आकार में ट्रांसप्लांट करने पर बहुत कम बच पाते हैं, इसलिए इन्हें आमतौर पर ट्रांसप्लांट से बचाने की सलाह दी गई है।
नियमों में बदलाव की तैयारी
दिल्ली सरकार अब ट्री ट्रांसप्लांटेशन पॉलिसी 2020 में बदलाव की तैयारी कर रही है। इस पॉलिसी के तहत विकास परियोजनाओं में पेड़ों को काटने के बजाय ट्रांसप्लांट करना जरूरी होता है।
फिलहाल नियम है कि कम से कम 80 प्रतिशत पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया जाए, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि जमीनी परिस्थितियों में यह लक्ष्य हर बार संभव नहीं होता। इसके अलावा एजेंसियों को अब 2 से 3 साल तक पेड़ों की देखभाल की जिम्मेदारी देने की बात भी सामने आई है, ताकि सर्वाइवल रेट बेहतर हो सके।
डेटा और निगरानी पर जोर
बैठक में यह भी तय किया गया कि हर ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ का पूरा डेटा तैयार किया जाएगा, जिसमें उसकी प्रजाति, आकार और सर्वाइवल रेट शामिल होगा। इसके साथ ही ट्री ऑफिसर्स द्वारा साइट का नियमित निरीक्षण और सख्त निगरानी भी सुनिश्चित की जाएगी।
दिल्ली में पेड़ों के ट्रांसप्लांटेशन को लेकर अब तक जो सवाल उठते रहे हैं, उनका जवाब अब वैज्ञानिक अध्ययन और नई तकनीक के जरिए खोजा जाएगा। अगर सरकार की यह पहल सफल रहती है, तो आने वाले समय में विकास और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि नई मशीनें और बदले हुए नियम दिल्ली की हरियाली को बचाने में कितनी कारगर साबित होते हैं।
MS Dhoni: आईपीएल 2026 में चेन्नई सुपर किंग्स के फैंस के लिए सबसे बड़ी खबर महेंद्र सिंह धोनी की फिटनेस को लेकर सामने आ रही है। टीम के दिग्गज खिलाड़ी इस सीजन की शुरुआत से ही चोट के कारण मैदान से दूर हैं, जिससे CSK की परफॉर्मेंस पर भी असर पड़ा है।
अब सभी की नजरें 14 अप्रैल को होने वाले अहम मुकाबले पर टिकी हैं, जहां उनकी वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि इससे पहले चेन्नई सुपर किंग्स को 11 अप्रैल के दिन भी एक मुकाबला खेलना है, जो दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ होना है।
आईपीएल शेड्यूल के अनुसार 14 अप्रैल को चेन्नई सुपर किंग्स और केकेआर के बीच मुकाबला खेला जाना है। यही मैच अब धोनी की वापसी का संभावित मंच बन सकता है। टीम मैनेजमेंट और फैंस दोनों को उम्मीद है कि इस बड़े मैच में धोनी मैदान पर उतर सकते हैं, लेकिन उनकी फिटनेस को लेकर अभी पूरी तरह स्पष्टता नहीं है।
धोनी वापसी के लिए कर रहे मेहनत
धोनी फिलहाल पिंडली की चोट से जूझ रहे हैं। इसी वजह से वह आईपीएल 2026 के शुरुआती मुकाबलों में हिस्सा नहीं ले पाए। टीम उन्हें पूरी तरह फिट होने का समय देना चाहती है, ताकि आगे के मैचों में उनका योगदान प्रभावी रहे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह लगातार रिहैब और ट्रेनिंग सेशन में लगे हुए हैं और धीरे-धीरे फिटनेस हासिल कर रहे हैं।
CSK के लिए क्यों अहम है धोनी की वापसी?
धोनी सिर्फ एक खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि टीम के सबसे अनुभवी और भरोसेमंद लीडर भी हैं। उनकी गैरमौजूदगी में टीम को कई अहम मौकों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। दबाव में फैसले लेने की उनकी अद्भुत क्षमता टीम के काम आएगी, इसके अलावा वह विकेट के पीछे से गेंदबाजों को गाइड करते रहते हैं। एक और अहम बात उनकी फिनिशिंग क्षमता भी है। चेन्नई सुपर किंग्स के लिए माही की वापसी इसलिए भी जरूरी हो गई है क्योंकि टीम ने इस सीजन अभी तक एक भी मुकाबला नहीं जीता है।
गगनयान मिशन के तहत क्रू मॉड्यूल को हवा में छोड़ा गया। पैराशूट की मदद ये यह नीचे आया।
भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान की तैयारी में बड़ी कामयाबी मिली है। ISRO ने गुरुवार को दूसरा इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT-1) सफलतापूर्वक पूरा किया। यह टेस्ट गगनयान मिशन के लिए तैयार किए गए पैराशूट सिस्टम की असली परिस्थितियों की जांच करने के लिए किया गया।
इसका मकसद गगनयान मिशन से पहले पैराशूट खुलने के प्रोसेस को चेक करना था। ये प्रोसेस मिशन के समय अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी तय करेगी। टेस्ट के दौरान लगभग 5.7 टन वजनी डमी क्रू कैप्सूल को वायुसेना के चिनूक हेलिकॉप्टर से 3 किमी की ऊंचाई से छोड़ा गया। कैप्सूल ने समुद्र में सेफ लैंडिंग की।
पिछले 8 महीनों में क्रू कैप्सूल का यह दूसरा एयर ड्रॉप टेस्ट है। पहला टेस्ट 24 अगस्त 2025 को किया गया था।
गगनशन मिशन: 2027 में शुभांशु सहित 3 पायलट अंतरिक्ष जाएंगे
गगनयान ISRO का ह्यूमन स्पेस मिशन है। इसके तहत 2027 में स्पेसक्राफ्ट से वायुसेना के तीन पायलट्स को स्पेस में भेजा जाएगा। ये पायलट 400 किमी के ऑर्बिट पर 3 दिन रहेंगे, जिसके बाद हिंद महासागर में स्पेसक्राफ्ट की लैंडिंग कराई जाएगी। मिशन की लागत करीब 20,193 करोड़ रुपए है।
गगनयान मिशन के लिए अभी वायुसेना के चार पायलट्स को चुना गया है, जिनमें से एक ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला हैं। शुभांशु इसीलिए एक्सियम मिशन के तहत इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन गए थे।
गगनयान के जरिए पायलट्स को स्पेस में भेजने से पहले इसरो दो खाली टेस्ट फ्लाइट भेजेगा। तीसरी फ्लाइट में रोबोट को भेजा जाएगा। इसकी सफलता के बाद चौथी फ्लाइट में इंसान स्पेस पर जा सकेंगे। पहली टेस्ट फ्लाइट इस साल के अंत तक भेजी जा सकती है।
शुभांशु शुक्ला 18 दिनों तक ISS में रह चुके हैं
शुभांशु शुक्ला Axiom‑4 मिशन के तहत 18 दिनों तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर रहने के बाद 15 जुलाई 2025 को धरती पर सुरक्षित लौटे थे। इसके बाद, 17 अगस्त को भारत पहुंचे थे। 18 अगस्त को PM मोदी ने उनसे मुलाकात की थी। यह मुलाकात करीब 20 मिनट चली थी।
शुभांशु ने PM मोदी को Axiom-4 मिशन का मिशन पैच और तिरंगा भेंट किया, जिसे वे अपने साथ अंतरिक्ष स्टेशन ले गए थे।
ISRO ने ‘गगनयान मिशन’ की क्या-क्या तैयारी कर ली है और क्या बाकी है
गगनयान मिशन का रॉकेट तैयार है और एस्ट्रोनॉट्स की ट्रेनिंग जारी है…
1. लॉन्च व्हीकल तैयार: इंसान को अंतरिक्ष में ले जाने लायक लॉन्च व्हीकल HLVM3 रॉकेट तैयार कर लिया गया है। इसकी सिक्योरिटी टेस्टिंग पूरी हो चुकी है। इस रॉकेट को पहले GSLV Mk III के नाम से जाना जाता था, जिसे अपग्रेड किया गया है।
2. एस्ट्रोनॉट्स सिलेक्शन और ट्रेनिंग: गगनयान मिशन के तहत 3 एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस में ले जाया जाएगा। इसके लिए एयरफोर्स के 4 पायलटों को चुना गया। भारत और रूस में इनकी ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है। इन्हें सिम्युलेटर के जरिए ट्रेनिंग दी गई है। स्पेस और मेडिकल से जुड़ी अन्य ट्रेनिंग दी जा रही हैं।
3. क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल: एस्ट्रोनॉट्स के बैठने वाली जगह क्रू मॉड्यूल और पावर, प्रप्लशन, लाइफ सपोर्ट सिस्टम वाली जगह सर्विस मॉड्यूल अपने फाइनल स्टेज में है। इसकी टेस्टिंग और इंटीग्रेशन बाकी है।
4. क्रू एस्केप सिस्टम (CES): लॉन्चिंग के दौरान किसी अनहोनी की स्थिति में क्रू मॉड्यूल को रॉकेट से तुरंत अलग करने के लिए क्रू एस्केप सिस्टम तैयार किया जा चुका है। पांच तरह के क्रू एस्केप सिस्टम सॉलिड मोटर्स बनाए गए हैं, जिनका सफल परीक्षण भी हो चुका है।
5. रिकवरी टेस्टिंग: ISRO और नेवी ने अरब सागर में स्पलैशडाउन के बाद क्रू मॉड्यूल की सुरक्षित वापसी के लिए टेस्टिंग की है। बैकअप रिकवरी के लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ भी समझौता हुआ है।
6. मानव-रहित मिशन के लिए रोबोट: जनवरी 2020 में ISRO ने बताया कि गगनयान के मानव रहित मिशन के लिए एक ह्यूमोनोइड बनाया जा चुका है, जिसका नाम व्योममित्र है। व्योममित्र को माइक्रोग्रैविटी में एक्सपेरिमेंट्स करने और मॉड्यूल की टेस्टिंग के लिए तैयार किया गया है।
41 साल बाद कोई भारतीय अंतरिक्ष में गया
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा और भारतीय एजेंसी इसरो के बीच हुए एग्रीमेंट के तहत भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को एक्सियम मिशन-4 के लिए चुना गया था। शुभांशु इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर जाने वाले पहले और स्पेस में जाने वाले दूसरे भारतीय हैं। इससे 41 साल पहले राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत यूनियन के स्पेसक्राफ्ट से अंतरिक्ष यात्रा की थी।
Supreme Court Denies Divorce To Husband Separated 16 Years | Maintenance
नई दिल्ली2 घंटे पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल से पत्नी से अलग रह रहे 54 साल के एक व्यक्ति को तलाक देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह अपनी पत्नी को ₹15,000 मासिक गुजारा भत्ता देता रहे और अगर तलाक चाहिए तो स्थायी गुजारा भत्ते का ठोस प्रस्ताव दे।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि ₹15,000 आज के समय में बहुत कम राशि है। कोर्ट ने साफ कहा, “शांति से ₹15,000 देते रहो, खुश रहो।” इससे पहले हाईकोर्ट ने भी इस व्यक्ति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। पति-पत्नी के बारे में ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है।
सुप्रीम कोर्ट बोला- पत्नी को साथ रखो, कोर्ट रूम LIVE
पति के वकील: ‘मैं पिछले 16 साल से पत्नी से अलग रह रहा हूं। हर महीने ₹15,000 दे रहा हूं। मेरी सैलरी ₹65,000 है, इससे ज्यादा देने की स्थिति में नहीं हूं।’
सुप्रीम कोर्ट: ‘अगर आप स्थायी गुजारा भत्ते के लिए कोई उचित रकम प्रस्तावित करते हैं, तो तलाक पर विचार किया जा सकता था।’
सुप्रीम कोर्ट: ‘आप अपनी पत्नी को साथ क्यों नहीं रख सकते। अपनी पत्नी को साथ रखो, इसमें दिक्कत क्या है।
पति के वकील: ‘दोनों के बीच स्वभाव में मतभेद हैं और वे करीब 16 साल से अलग रह रहे हैं। कई बार मध्यस्थता की कोशिश भी हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।’
कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करने के लिए समय दिया
कोर्ट ने यह भी कहा कि पति ने क्रूरता का जो आधार बताया है, वह सिर्फ इतना है कि पत्नी चाहती थी कि वह जहां भी पोस्टेड हो, उसके साथ रहे। इस पर कोर्ट ने सवाल किया, इसमें दिक्कत क्या है।
वहीं, पत्नी के वकील ने कोर्ट को बताया कि वह स्थायी गुजारा भत्ता नहीं चाहती और अपने पति के साथ रहना चाहती है। उन्होंने कहा कि दोनों की कोई संतान नहीं है और फिलहाल पत्नी अपनी मां के साथ रह रही है।
अंत में कोर्ट ने मामले को खारिज नहीं किया, बल्कि दोनों पक्षों को समय दिया कि वे स्थायी गुजारा भत्ते की राशि पर निर्देश लेकर आएं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।
कोर्ट इन आधारों पर तय करता है गुजारा भत्ता
पति की आय: यहां पति की सैलरी ₹65,000 है, इसलिए ₹15,000 (करीब 23%) कम माना गया।
पत्नी की जरूरतें: रहने, खाने, इलाज, रोजमर्रा खर्च-सब शामिल होते हैं।
लाइफस्टाइल: शादी के दौरान जैसा जीवनस्तर था, उसे ध्यान में रखा जाता है।
निर्भरता: पत्नी कमाती है या नहीं, यह भी अहम फैक्टर है।
अन्य जिम्मेदारियां: बच्चों, माता-पिता की जिम्मेदारी भी देखी जाती है।
कानून क्या कहता है
CrPC की धारा 125: पत्नी खुद का खर्च नहीं उठा सकती तो पति से भत्ता दिलाया जा सकता है।
हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 24/25: केस के दौरान और बाद में स्थायी गुजारा भत्ता तय होता है।
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केवल हिंदू-बौद्ध-सिख ही अनुसूचित जाति का दावा कर सकते हैं:सुप्रीम कोर्ट का फैसला- धर्म बदला तो अनुसूचित जाति का दर्जा भी खत्म हो जाता है
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोग ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। अगर कोई ईसाई या किसी और धर्म में धर्मांतरण करता है तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देगा। पढ़ें पूरी खबर…
Banke Bihari Temple New Rules 2026: मथुरा के सुप्रसिद्ध ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में दर्शन व्यवस्था को और अधिक सुगम और मर्यादित बनाने के लिए मैनेजमेंट कमेटी ने कड़े कदम उठाए हैं। अब मंदिर के भीतर वीआईपी (VIP) श्रद्धालुओं के साथ आने वाले निजी सुरक्षाकर्मियों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। यह निर्णय हाल ही में हुई एक हाई लेवल मीटिंग में लिया गया है, जिसका उद्देश्य मंदिर की पवित्रता और सामान्य भक्तों की सुविधा को बनाए रखना है। आइए जानतें हैं अन्य महत्वपूर्ण बदलावों के बारे में।
बांके बिहारी मंदिर में अक्सर वीआईपी अपने साथ निजी गनर्स या सुरक्षाकर्मी लेकर प्रवेश करते थे, जिससे आम श्रद्धालुओं को असुविधा होती थी। हाल ही में मध्य प्रदेश के एक विशिष्ट अतिथि के सुरक्षाकर्मी द्वारा जूते पहनकर मंदिर में प्रवेश करने की घटना के बाद यह विवाद गहरा गया था। इस घटना का सेवायतों और भक्तों ने कड़ा विरोध किया था।
समिति के अध्यक्ष अशोक कुमार पूर्व जिला न्यायाधीश मुकेश मिश्रा, जिला न्यायाधीश विकास कुमार, जिलाधिकारी एवं सचिव चन्द्र प्रकाश सिंह, नगर आयुक्त मथुरा-वृन्दावन नगर निगम जगप्रवेश आदि पदेन सदस्यों और सेवायत समूहों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में लिए गए निर्णय के मुताबिक मंदिर में निजी सुरक्षाकर्मियों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए मंदिर के प्रबंधक को निर्देश दिए गए और तय किया गया कि जल्द ही इस संबंध में नए नियम लागू किए जाएंगे।
फूल बंगला सजाने के शुल्क में भारी कटौती
गर्मियों के दौरान ठाकुरजी को शीतलता प्रदान करने के लिए मंदिर में ‘फूल बंगला’ सजाने की परंपरा है। भक्तों के लिए एक राहत भरी खबर यह है कि अब इसके लिए तय राशि में 50 हजार रुपये की कटौती की गई है। पहले जहां इसके लिए 1.51 लाख रुपये जमा करने पड़ते थे, वहीं अब श्रद्धालु मात्र 1.01 लाख रुपये में फूल बंगला सजवा सकेंगे।
मिलावटी प्रसाद पर सख्त कार्रवाई के निर्देश
मंदिर के आसपास बिकने वाले प्रसाद और खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी समिति ने सख्त रुख अपनाया है। विशेष रूप से मिलावटी पेड़ों की बिक्री पर नाराजगी जताते हुए खाद्य सुरक्षा विभाग को निरंतर छापेमारी और कठोर कानूनी कार्रवाई करने के आदेश दिए गए हैं।
हाईटेक होगा मंदिर परिसर: AI कैमरों से होगी निगरानी
सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए मंदिर और उसके आसपास के सीसीटीवी (CCTV) कैमरों को HD और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) तकनीक से अपडेट किया जाएगा। इसके अलावा बैठक में निम्नलिखित बिंदुओं पर भी सहमति बनी:
मंदिर के चबूतरे से अतिक्रमण हटाना।
बांकेबिहारी कॉरिडोर योजना के लिए रजिस्ट्री प्रक्रिया में तेजी लाना।
निधिवन की सेवा व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसी के नए अनुबंधों पर चर्चा।