बाजार जोखिम का मतलब ऐसे संभावित नुकसान से है जो शेयरों, बॉन्ड, ब्याज दरों, विदेशी मुद्रा या अन्य वित्तीय साधनों की कीमतों में बदलाव के कारण बैंक को हो सकता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी बैंक ने बड़ी मात्रा में सरकारी या कॉरपोरेट बॉन्ड रखे हैं और बाजार में ब्याज दरों में तेज बदलाव के कारण इन बॉन्ड की कीमत गिर जाती है, तो बैंक की निवेश पोर्टफोलियो की वैल्यू प्रभावित हो सकती है। इसी तरह विदेशी मुद्रा की दरों में अचानक बदलाव या शेयर बाजार में तेज गिरावट से भी बैंक की ट्रेडिंग पोजिशन को नुकसान हो सकता है। RBI के पूंजी नियमों में ऐसे जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग जोखिमों के लिए पूंजी आवश्यकता तय करने की व्यवस्था है।
नए ढांचे का मूल विचार यह है कि बैंक जितना अधिक बाजार जोखिम लेंगे, उन्हें संभावित नुकसान झेलने के लिए उतनी ही पर्याप्त पूंजी भी रखनी होगी। इससे किसी अचानक बाजार गिरावट की स्थिति में बैंक की वित्तीय स्थिति पर तत्काल दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। इसका असर मुख्य रूप से बैंकों की निवेश और ट्रेडिंग गतिविधियों तथा उनके पूंजी प्रबंधन पर पड़ेगा, न कि सीधे ग्राहकों के सेविंग्स अकाउंट, सैलरी अकाउंट या फिक्स्ड डिपॉजिट पर। यानी सामान्य ग्राहक के बैंक खाते पर इस नियम के कारण अपने आप कोई नया शुल्क लागू नहीं होता। बैंकिंग प्रणाली में पूंजी का उद्देश्य ही अप्रत्याशित नुकसान के खिलाफ सुरक्षा उपलब्ध कराना है।
इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि बैंक अपने ट्रेडिंग पोर्टफोलियो में रखी प्रतिभूतियों की कीमतों और उससे जुड़े जोखिमों की लगातार निगरानी करें। RBI के पुराने दिशानिर्देशों में भी ट्रेडिंग बुक में रखी प्रतिभूतियों के बाजार मूल्य के आधार पर बाजार जोखिम की गणना और पर्याप्त पूंजी बनाए रखने की आवश्यकता बताई गई है।
इस तरह नए नियमों को बैंकिंग क्षेत्र में जोखिम प्रबंधन और पूंजी अनुशासन को मजबूत करने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है। आम ग्राहकों के लिए इसका सीधा संदेश यह है कि नियमों का लक्ष्य उनके जमा पैसे पर शुल्क लगाना नहीं, बल्कि बैंक जिस तरह बाजार आधारित निवेश और ट्रेडिंग जोखिम लेते हैं, उसके मुकाबले पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा बनाए रखना है। हालांकि, बैंकों पर पूंजी की जरूरत बढ़ने से उनकी निवेश रणनीति और कुछ बाजार गतिविधियों की लागत पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। कुल मिलाकर, 1 अप्रैल 2027 से प्रस्तावित प्रभावी तिथि के बाद यह व्यवस्था बैंकों को बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव के लिए अधिक मजबूत पूंजी सुरक्षा रखने की दिशा में ले जाएगी।



