- Hindi News
- National
- SC Asks Centre, States For Reply On Transgender Act Amendment In 6 Weeks
नई दिल्ली52 मिनट पहले
- कॉपी लिंक
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले पर छह सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। अब इस मामले की सुनवाई तीन जजों की बेंच करेगी।
NALSA जजमेंट के खिलाफ है नया संशोधन: अभिषेक मनु सिंघवी
सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने संशोधन पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से ‘सेल्फ आइडेंटिफिकेशन’ (अपनी पहचान खुद तय करने) का अधिकार छीनता है। सिंघवी ने तर्क दिया कि यह 2014 के ऐतिहासिक NALSA जजमेंट के खिलाफ है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने खुद की लैंगिक पहचान चुनने को मौलिक अधिकार घोषित किया था।

CJI ने पूछा- क्या लोग फर्जी पहचान बनाकर फायदा नहीं उठाएंगे?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने ‘सेल्फ आइडेंटिफिकेशन’ के अधिकार को लेकर कुछ चिंताएं जताईं। उन्होंने पूछा, “क्या इससे कोई खतरा पैदा नहीं होता? क्या ऐसे लोग नहीं हो सकते जो ट्रांसजेंडर होने का दिखावा करें ताकि उन्हें इस समुदाय के लिए तय आरक्षण या विशेषाधिकारों का लाभ मिल सके?”
इस पर सिंघवी ने जवाब दिया कि उनकी जानकारी के अनुसार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अभी कोई आरक्षण लागू नहीं है, इसलिए गलत इस्तेमाल की संभावना नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि अगर 0.01% मामलों में दुरुपयोग की गुंजाइश है भी, तो इसके आधार पर बहुसंख्यक समुदाय के आर्टिकल 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के अधिकार को सस्पेंड नहीं किया जा सकता।
मेडिकल बोर्ड की सिफारिश अब जरूरी होगी
जस्टिस बागची ने इस दौरान टिप्पणी की कि विधायिका किसी फैसले के आधार को बदल सकती है। नए संशोधन के बाद अब ट्रांसजेंडर पहचान के लिए व्यक्ति की अपनी इच्छा के बजाय ‘मेडिकल इवैल्यूएशन’ यानी डॉक्टरी जांच को आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अब मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के बाद ही पहचान पत्र जारी करेंगे, जो निजता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।
हार्मोनल थेरेपी रुकी, वकील बोले- यह क्रिमिनलाइजेशन जैसा है
वरिष्ठ वकील अरुंधति काटजू ने कोर्ट को बताया कि संशोधन के डर से कई लोगों की हार्मोनल थेरेपी अचानक रोक दी गई है। सिंघवी ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति थेरेपी ले रहा है, तो इस संशोधन के जरिए उसे एक तरह से अपराधी बनाने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दखल देते हुए कहा कि सरकार केवल जबरन लिंग परिवर्तन या बच्चों के साथ होने वाली जबरदस्ती (जैसे जबरन बधिया करना) को अपराध की श्रेणी में ला रही है। उन्होंने साफ किया कि कोई भी व्यक्ति जो पुरुष या महिला है, उसे बाहर नहीं किया जा रहा है।
अभी लागू नहीं हुआ है एक्ट, याचिकाएं समय से पहले: कैविएटर
एक पक्ष हर्ष असद ने बेंच को बताया कि यह एक्ट अभी लागू नहीं हुआ है क्योंकि केंद्र ने इसे नोटिफाई नहीं किया है। उन्होंने दलील दी कि याचिकाएं समय से पहले दाखिल की गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समुदाय के कुछ लोग सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं ताकि इस संशोधन को लागू न किया जाए, और कोर्ट का नोटिस उस प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है।
कोर्ट ने फिलहाल किसी भी तरह का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया क्योंकि कानून अभी प्रभावी नहीं हुआ है।
2014 का NALSA जजमेंट क्या था
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार आधिकारिक तौर पर यह माना कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति न तो पूरी तरह पुरुष हैं और न ही महिला। उन्हें संविधान के तहत ‘थर्ड जेंडर’ के रूप में अपनी पहचान बताने का कानूनी अधिकार दिया गया। कोर्ट ने कहा कि जेंडर का निर्धारण केवल शरीर के अंगों से नहीं, बल्कि व्यक्ति के मन और उसकी भावनाओं (Self-identification) से होना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को यह चुनने का अधिकार है कि वह खुद को किस जेंडर में देखता है। इसके लिए किसी मेडिकल सर्टिफिकेट या सर्जरी (जैसे लिंग परिवर्तन सर्जरी) की कानूनी अनिवार्यता को गलत बताया गया। इसे आर्टिकल 21 (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) का हिस्सा माना गया।
क्या बदला है 2026 के नए संशोधन में?
- परिभाषा बदली: पहले ट्रांसजेंडर की परिभाषा व्यक्ति के निजी अनुभव पर आधारित थी। अब इसमें मेडिकल और बायोलॉजिकल आधार जोड़ दिए गए हैं।
- अनिवार्य सर्टिफिकेट: अगर कोई व्यक्ति सर्जरी (जेंडर अफर्मिंग सर्जरी) कराता है, तो उसके लिए संशोधित सर्टिफिकेट लेना अब अनिवार्य होगा। पहले यह वैकल्पिक था।
- सजा में अंतर: याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ यौन शोषण पर सजा कम रखी गई है, जबकि तस्करी जैसे मामलों में सजा ज्यादा है, जो भेदभावपूर्ण है।




