अमेरिका द्वारा जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से जुड़े मुद्दों को आधार बनाकर भारत समेत 54 देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के प्रस्ताव पर सरकार ने प्रतिक्रिया दी है। भारत सरकार ने कहा है कि वह इस मामले में अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है। वाणिज्य मंत्रालय ने बुधवार को स्पष्ट किया कि भारत सेक्शन 301 की कार्यवाही को लेकर अमेरिका के साथ संवाद बनाए हुए है और साथ ही अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भी बातचीत जारी है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने सेक्शन 301 जांच के तहत भारत सहित 54 अर्थव्यवस्थाओं से आयात होने वाले उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव पर फिलहाल परामर्श प्रक्रिया चल रही है। लिखित सुझाव देने की अंतिम तिथि 6 जुलाई तय की गई है, जबकि 7 जुलाई को सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाएगी।
USTR के प्रस्ताव के अनुसार ये अतिरिक्त शुल्क फिलहाल लागू 10 प्रतिशत अस्थायी टैरिफ का स्थान ले सकते हैं या उसके साथ जोड़े जा सकते हैं। यह 10 प्रतिशत शुल्क अमेरिकी ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत लगाया गया था, जिसकी अवधि 24 जुलाई को समाप्त होने वाली है।
भारत को कानूनी चुनौती देनी चाहिए: विशेषज्ञ
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को अमेरिका के इस कदम की कानूनी वैधता को चुनौती देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह जांच पारंपरिक सेक्शन 301 मामलों से अलग है।
श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिका यह आरोप नहीं लगा रहा कि भारतीय उत्पाद जबरन श्रम से बनाए जाते हैं। बल्कि USTR का तर्क यह है कि भारत जैसे देश उन वस्तुओं के आयात पर पर्याप्त रोक नहीं लगाते, जो किसी तीसरे देश में जबरन श्रम से तैयार की गई हों।
उन्होंने कहा कि भारत को यह तर्क रखना चाहिए कि अमेरिका एकतरफा व्यापारिक उपायों के जरिए अपनी आयात नियंत्रण व्यवस्था दूसरे देशों पर थोपने की कोशिश कर रहा है। साथ ही यदि किसी विशेष उत्पाद या क्षेत्र को लेकर चिंता है तो पूरे देश पर टैरिफ लगाना अनुपातहीन कदम माना जाना चाहिए।
व्यापार वार्ता पर दबाव बनाने की कोशिश?
GTRI ने प्रस्तावित 12.5 प्रतिशत टैरिफ को भारत पर दबाव बढ़ाने की व्यापक अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बताया है। अजय श्रीवास्तव का कहना है कि वाशिंगटन सेक्शन 301 जांच और टैरिफ का इस्तेमाल भारत के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं में दबाव बनाने के लिए कर सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की बातचीत और सेक्शन 301 जांच को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखना चाहिए तथा किसी भी दंडात्मक कदम का विरोध करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अमेरिका मजबूत कानूनी आधार तलाश रहा है
EY इंडिया के ट्रेड पॉलिसी लीडर अग्नेश्वर सेन का मानना है कि USTR की यह कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिकी प्रशासन मौजूदा टैरिफ व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मजबूत कानूनी आधार खोज रहा है।
उन्होंने कहा कि ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत लगाया गया 10 प्रतिशत शुल्क अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहा है और इसे विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुरूप नहीं माना जा रहा। ऐसे में “फोर्स्ड लेबर” का आधार अमेरिका को समान या उससे अधिक टैरिफ बनाए रखने के लिए अपेक्षाकृत मजबूत कानूनी आधार उपलब्ध करा सकता है।
भारत के किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है असर?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि प्रस्तावित टैरिफ लागू होते हैं तो भारत के श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ सकता है। इनमें वस्त्र, परिधान, कालीन, चमड़ा उत्पाद और पीतल उद्योग जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
इन क्षेत्रों के उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगने से भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है और अमेरिकी बाजार में उनकी लागत बढ़ सकती है।



